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नए जिलों के लिए आयोग गठित करना चुनावी शगूफा : राजेंद्र राणा
Sat, 17 Oct 2026 01:45 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
Updated Sat, 17 Oct 2026 01:45 AM IST
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हमीरपुर। प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक राजेंद्र राणा ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू द्वारा नए जिले बनाने के लिए आयोग गठित करने को चुनावी शगूफा करार दिया है।
जारी प्रेस विज्ञप्ति में उन्होंने कहा कि प्रदेश में दो-अढ़ाई दशक से नए जिले बनाने की मांग उठती रही है, लेकिन वित्तीय स्थिति को देखते हुए हर सरकार ने इस दिशा में कदम पीछे खींचे हैं।
राजेंद्र राणा ने कहा कि वर्ष 2002 में प्रेम कुमार धूमल सरकार ने नए जिलों का खाका तैयार किया था। वर्ष 2011 में भी इस पर चर्चा हुई, लेकिन वित्तीय बोझ को देखते हुए मामला स्थगित कर दिया गया।
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वर्ष 2013 में वीरभद्र सिंह सरकार ने भी आयोग गठित करने की बात कही थी, लेकिन बाद में इसे प्राथमिकता न बताते हुए खजाने पर बोझ पड़ने की बात कही गई।
उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों ने प्रदेश की वित्तीय स्थिति का आकलन कर प्रदेशहित में इस फैसले को टाल दिया था। इसके बावजूद सुक्खू सरकार ने असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह मुद्दा उठाया है। राणा ने कहा कि पिछले शीतकालीन सत्र में मुख्यमंत्री ने सदन में स्वयं कहा था कि नए जिलों का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
इसके बाद मई 2026 में मंत्रिमंडल से मंजूरी और अक्तूबर में आयोग का गठन, वह भी चुनाव से कुछ महीने पहले, सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने इसे प्रशासनिक सुधार के बजाय ध्यान भटकाने की राजनीति बताया।
राणा ने स्पष्ट किया कि भाजपा नए जिले बनाने के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि हिमाचल जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में प्रशासनिक विकेंद्रीकरण जरूरी है। भाजपा न तो इसका विरोध कर रही है और न ही उसे इस पर कोई आपत्ति है, लेकिन सवाल सरकार की नीयत और फैसले के समय का है।
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जारी प्रेस विज्ञप्ति में उन्होंने कहा कि प्रदेश में दो-अढ़ाई दशक से नए जिले बनाने की मांग उठती रही है, लेकिन वित्तीय स्थिति को देखते हुए हर सरकार ने इस दिशा में कदम पीछे खींचे हैं।
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राजेंद्र राणा ने कहा कि वर्ष 2002 में प्रेम कुमार धूमल सरकार ने नए जिलों का खाका तैयार किया था। वर्ष 2011 में भी इस पर चर्चा हुई, लेकिन वित्तीय बोझ को देखते हुए मामला स्थगित कर दिया गया।
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वर्ष 2013 में वीरभद्र सिंह सरकार ने भी आयोग गठित करने की बात कही थी, लेकिन बाद में इसे प्राथमिकता न बताते हुए खजाने पर बोझ पड़ने की बात कही गई।
उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों ने प्रदेश की वित्तीय स्थिति का आकलन कर प्रदेशहित में इस फैसले को टाल दिया था। इसके बावजूद सुक्खू सरकार ने असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह मुद्दा उठाया है। राणा ने कहा कि पिछले शीतकालीन सत्र में मुख्यमंत्री ने सदन में स्वयं कहा था कि नए जिलों का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
इसके बाद मई 2026 में मंत्रिमंडल से मंजूरी और अक्तूबर में आयोग का गठन, वह भी चुनाव से कुछ महीने पहले, सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने इसे प्रशासनिक सुधार के बजाय ध्यान भटकाने की राजनीति बताया।
राणा ने स्पष्ट किया कि भाजपा नए जिले बनाने के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि हिमाचल जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में प्रशासनिक विकेंद्रीकरण जरूरी है। भाजपा न तो इसका विरोध कर रही है और न ही उसे इस पर कोई आपत्ति है, लेकिन सवाल सरकार की नीयत और फैसले के समय का है।