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Chamba News: विरासत का समझा मोल... स्वर्णा के हाथ लगते ही घोड़े के बाल भी बने अनमोल
Tue, 30 Jun 2026 10:55 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Tue, 30 Jun 2026 10:55 AM IST
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चंबा स्वर्णा की ओर से घोड़े के बालों से बनाए गए कड़े ओर अंगूठिया। संवाद
चंबा। घोड़े के बालों से कड़े और अंगूठियां तैयार करना बेहद धैर्य और कौशल का काम है। चंबा शहर के खरुड़ा मोहल्ले की रहने वाली 52 वर्षीय स्वर्णा चार दशक से इस दुर्लभ पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं।
यह हुनर उन्हें अपनी दादी और मां से विरासत में मिला। तीन पीढ़ियों से चली आ रही इस कला को स्वर्णा आज भी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रही हैं। स्वर्णा ने शादी नहीं की। माता-पिता के निधन के बाद उन्होंने इस पारंपरिक शिल्प को ही अपना जीवन बना लिया।
परिवार में उनका एक भाई है और भतीजा रोहित भी इस काम में उनका हाथ बंटाता है। वह बताती हैं कि पिछले 40 वर्षों से यही काम उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है। पहले चंबा के ऐतिहासिक रंग महल में इस पारंपरिक शिल्प का प्रशिक्षण केंद्र संचालित होता था, जहां कई लोगों को इस कला का प्रशिक्षण दिया जाता था।
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इससे न केवल इस शिल्प को बढ़ावा मिला बल्कि कई परिवारों को रोजगार भी मिला। समय के साथ करीब 20 साल पहले प्रशिक्षण केंद्र बंद हो गया और इस कला से जुड़े कारीगरों की संख्या भी लगातार घटती चली गई।
स्वर्णा घोड़ों के बालों और बांस के पतले छिलकों की मदद से कड़े और अंगूठियां तैयार करती हैं। वह एक दिन में करीब दो कड़े और चार अंगूठियां ही बना लेती हैं। उनके बनाए उत्पादों की मांग दिल्ली, मुंबई और चंडीगढ़ सहित कई शहरों में है। उनके पास नियमित रूप से ऑनलाइन ऑर्डर आते हैं।
एक जोड़ी कड़ा 500 रुपये में बिक रहा
एक जोड़ी कड़े की कीमत करीब 500 रुपये होती है, जबकि अंगूठियां 100 से 150 रुपये प्रति नग के हिसाब से बिकती हैं।
कच्चा माल मिलना चुनौती
इस पारंपरिक शिल्प के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल की उपलब्धता है। स्वर्णा बताती हैं कि पहले घोड़ों के बाल आसानी से मिल जाते थे लेकिन अब इन्हें जुटाना बेहद कठिन हो गया है। उन्हें आसपास के क्षेत्रों से काफी प्रयास के बाद कच्चा माल इकट्ठा करना पड़ता है। कई बार पर्याप्त सामग्री नहीं मिलने पर काम भी रुक जाता है।
सरकार से मांगा सहयोग
स्वर्णा का कहना है कि यदि सरकार इस शिल्प के संरक्षण, कच्चे माल की उपलब्धता और विपणन में सहयोग करे तो इस विलुप्त होती कला को नई पहचान मिल सकती है। इससे न केवल चंबा की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहेगी बल्कि अधिक लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।
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यह हुनर उन्हें अपनी दादी और मां से विरासत में मिला। तीन पीढ़ियों से चली आ रही इस कला को स्वर्णा आज भी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रही हैं। स्वर्णा ने शादी नहीं की। माता-पिता के निधन के बाद उन्होंने इस पारंपरिक शिल्प को ही अपना जीवन बना लिया।
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परिवार में उनका एक भाई है और भतीजा रोहित भी इस काम में उनका हाथ बंटाता है। वह बताती हैं कि पिछले 40 वर्षों से यही काम उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है। पहले चंबा के ऐतिहासिक रंग महल में इस पारंपरिक शिल्प का प्रशिक्षण केंद्र संचालित होता था, जहां कई लोगों को इस कला का प्रशिक्षण दिया जाता था।
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इससे न केवल इस शिल्प को बढ़ावा मिला बल्कि कई परिवारों को रोजगार भी मिला। समय के साथ करीब 20 साल पहले प्रशिक्षण केंद्र बंद हो गया और इस कला से जुड़े कारीगरों की संख्या भी लगातार घटती चली गई।
स्वर्णा घोड़ों के बालों और बांस के पतले छिलकों की मदद से कड़े और अंगूठियां तैयार करती हैं। वह एक दिन में करीब दो कड़े और चार अंगूठियां ही बना लेती हैं। उनके बनाए उत्पादों की मांग दिल्ली, मुंबई और चंडीगढ़ सहित कई शहरों में है। उनके पास नियमित रूप से ऑनलाइन ऑर्डर आते हैं।
एक जोड़ी कड़ा 500 रुपये में बिक रहा
एक जोड़ी कड़े की कीमत करीब 500 रुपये होती है, जबकि अंगूठियां 100 से 150 रुपये प्रति नग के हिसाब से बिकती हैं।
कच्चा माल मिलना चुनौती
इस पारंपरिक शिल्प के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल की उपलब्धता है। स्वर्णा बताती हैं कि पहले घोड़ों के बाल आसानी से मिल जाते थे लेकिन अब इन्हें जुटाना बेहद कठिन हो गया है। उन्हें आसपास के क्षेत्रों से काफी प्रयास के बाद कच्चा माल इकट्ठा करना पड़ता है। कई बार पर्याप्त सामग्री नहीं मिलने पर काम भी रुक जाता है।
सरकार से मांगा सहयोग
स्वर्णा का कहना है कि यदि सरकार इस शिल्प के संरक्षण, कच्चे माल की उपलब्धता और विपणन में सहयोग करे तो इस विलुप्त होती कला को नई पहचान मिल सकती है। इससे न केवल चंबा की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहेगी बल्कि अधिक लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।

चंबा स्वर्णा की ओर से घोड़े के बालों से बनाए गए कड़े ओर अंगूठिया। संवाद