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Bilaspur News: क्षेत्रीय अस्पताल के पास नहीं रीजेंट खरीदने का बजट, सरकारी लैब में जांचे ठप

Wed, 04 Jun 2025 11:56 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर Updated Wed, 04 Jun 2025 11:56 PM IST
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Regional hospital does not have budget to buy reagents, tests in government labs are stalled
सरकार से नहीं मिल रहा एनएचएम का पैसा, 3.50 करोड़ रुपये हो चुका है बकाया
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मरीजों और तीमारदारों ने क्रस्ना लैब में करना पड़ रहा लंबा इंतजार
दूर दराज के कई मरीजों को मजबूरन निजी लैब का करना पड़ रहा रुख

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जिला मुख्यालय स्थित क्षेत्रीय अस्पताल के पास रीजेंट खरीदने के लिए बजट नहीं है। रीजेंट नहीं होने के कारण अस्पताल की सरकारी लैब में करीब तीन माह से अधिकतर टेस्ट की जांचे ठप हैं।

लैब में लीवर, आरए फैक्टर, डेंगू समेत प्रमुख जांचे नहीं हो रही है, जिससे जांच कराने के लिए मरीज भटक रहे हैं। मजबूरी में मरीज और तीमारदार या तो क्रस्ना लैब की लंबी लाइन में धक्के खा रहे हैं या फिर निजी लैब में जेब ढीली कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार अस्पताल प्रबंधन की ओर से रोगी कल्याण समिति के माध्यम से रीजेंट की खरीद की जाती है। बाद में यह पैसा अस्पताल को एनएचएम के तहत वापस मिलता है, लेकिन करीब 3.50 करोड़ रुपये की बकाया राशि सरकार से लेने को हो गई है। इस कारण अब अस्पताल प्रबंधन के पास रीजेंट खरीदने के लिए बजट नहीं है। सरकारी लैब में शुगर के अलावा अन्य किसी बीमारी के टेस्ट नहीं हो रहे। जबकि लैब के बाहर 56 प्रकार के टेस्ट की सूची लगाई गई है। अब इन टेस्ट को कराने के लिए मरीजों को भटकना पड़ रहा है। सरकार की इस लापरवाही का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। अस्पताल में रोजाना 200 से 400 मरीजों को विभिन्न प्रकार की जांच कराने को कहा जाता है। यह सब बोझ अब क्रस्ना लैब पर आ गया है। लैब की पर्ची काउंटर के बाहर सुबह से ही लंबी लाइन लग जाती हैं। जबकि यह भीड़ पहले दोपहर 12:00 बजे केे बाद देखी जाती थी। सरकारी लैब में 12:00 बजे तक ब्लड सैंपल लिए जाते हैं, लेकिन अब इस लैब में जाने वाले अधिकतर मरीजों को निराश होकर लौटना पड़ रहा है। वहीं, क्रस्ना लैब पर पड़ रहे दबाव के कारण लोगों को टेस्ट कराने से लेकर रिपोर्ट लेने तक शाम हो जाती है। दूर दराज क्षेत्रों से आने वाले कई मरीज देरी होने के डर से निजी लैब का रुख कर लेते हैं, जहां हजारों रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। उधर, इस मामले पर पक्ष लेने के लिए अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक को कॉल की गई, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया।
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