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‘मैं दरिया हूं फिर भी प्यासा रहता हूं’ पेशकर बटोरीं तालियां
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बिलासपुर के संस्कृति भवन में मासिक साहित्य सम्मेलन में मौजूद कवि।
- फोटो : BILASPUR
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बिलासपुर। भाषा एवं संस्कृति विभाग कार्यालय बिलासपुर की ओर से बुधवार को संस्कृति भवन बिलासपुर के बैठक कक्ष में 11 बजे जिला स्तरीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता जिला भाषा अधिकारी नीलम चंदेल ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ साहित्यकारों की ओर से मां सरस्वती का दीप प्रज्वलित कर किया गया।
इस मौके पर जीतराम सुमन की ओर से मां सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की। उसके उपरांत प्रदीप गुप्ता ने हास्य रचना ‘पत्नी बोली पति से, तुम रोज पीकर आते हो’ प्रस्तुत की। हुसैन अली ने ‘मैं दरिया हूं फिर भी प्यासा रहता हूं’। रविंद्र शर्मा ने ‘मशीना रे पितिरे आटे रा मजा नी औंदा, मजा औंदा जे पितिरा होए घराटा’। प्रोमिला भारद्वाज ने असंभव कर संभव, सूक्ष्म को बनाए भव्य। जीतराम सुमन ने मजहब की महफिलें सजने लगी हैं, शीर्षक से रचना प्रस्तुत की जिसकी पंक्तियां थीं ‘जाने ये मानव हैवानियत का पुजारी क्यों हो रहा है’।
तृप्ता देवी ने मेला शीर्षक से रचना प्रस्तुत की जिसमें कहाकि ‘रंग लगणा नलवाड़िया रे मेले, ताली जे सांडु सुकी जाणा’। डॉ. एआर सांख्यान की रचना की पंक्तियां थीं ‘डरते-डरते वो अब यूं डराने लगे’। जावेद इकबाल की पंक्तियां थीं ‘मेरे सीने पे लरजती लाठियां उखड़ती सांसों की दास्तां हूं’। जीवन बिलासपुरी ने गजल प्रस्तुत की जिसकी पंक्तियां थीं ‘जिंदगी का सफर और आसां बनें ।
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सुधा हंस ने क्यों राह में खड़े हो। प्रतिभा शर्मा नेे पहाड़ी गीत प्रस्तुत किया ‘ओ सतलुज माए, मठे-मठे बगेयां’। सत्या शर्मा ने ‘पुलवामा के शहीदो, सहस्त्रनमन है तुम्हें हमारा, प्राणों की आहुति देकर, तिरंगा ऊंचा रखा हमारा’। शीला सिंह ने दर्पण की विवशता शीर्षक से रचना प्रस्तुत की पंक्तियां थी ‘हे दर्पण अब तो सत्य बोल दे’।
अंत में जिला भाषा अधिकारी ने सभी साहित्यकारों का इस कार्यक्रम में रचनाएं प्रस्तुत करने के लिए आभार व्यक्त किया और विभागीय परियोजनाओं की जानकारी भी दी तथा नलवाड़ी मेला 2020 की स्मारिका हेतु दिनांक 29-02-2020 तक साहित्यकारों से लेख उपलब्ध करवाने को कहा।
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इस मौके पर जीतराम सुमन की ओर से मां सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की। उसके उपरांत प्रदीप गुप्ता ने हास्य रचना ‘पत्नी बोली पति से, तुम रोज पीकर आते हो’ प्रस्तुत की। हुसैन अली ने ‘मैं दरिया हूं फिर भी प्यासा रहता हूं’। रविंद्र शर्मा ने ‘मशीना रे पितिरे आटे रा मजा नी औंदा, मजा औंदा जे पितिरा होए घराटा’। प्रोमिला भारद्वाज ने असंभव कर संभव, सूक्ष्म को बनाए भव्य। जीतराम सुमन ने मजहब की महफिलें सजने लगी हैं, शीर्षक से रचना प्रस्तुत की जिसकी पंक्तियां थीं ‘जाने ये मानव हैवानियत का पुजारी क्यों हो रहा है’।
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तृप्ता देवी ने मेला शीर्षक से रचना प्रस्तुत की जिसमें कहाकि ‘रंग लगणा नलवाड़िया रे मेले, ताली जे सांडु सुकी जाणा’। डॉ. एआर सांख्यान की रचना की पंक्तियां थीं ‘डरते-डरते वो अब यूं डराने लगे’। जावेद इकबाल की पंक्तियां थीं ‘मेरे सीने पे लरजती लाठियां उखड़ती सांसों की दास्तां हूं’। जीवन बिलासपुरी ने गजल प्रस्तुत की जिसकी पंक्तियां थीं ‘जिंदगी का सफर और आसां बनें ।
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सुधा हंस ने क्यों राह में खड़े हो। प्रतिभा शर्मा नेे पहाड़ी गीत प्रस्तुत किया ‘ओ सतलुज माए, मठे-मठे बगेयां’। सत्या शर्मा ने ‘पुलवामा के शहीदो, सहस्त्रनमन है तुम्हें हमारा, प्राणों की आहुति देकर, तिरंगा ऊंचा रखा हमारा’। शीला सिंह ने दर्पण की विवशता शीर्षक से रचना प्रस्तुत की पंक्तियां थी ‘हे दर्पण अब तो सत्य बोल दे’।
अंत में जिला भाषा अधिकारी ने सभी साहित्यकारों का इस कार्यक्रम में रचनाएं प्रस्तुत करने के लिए आभार व्यक्त किया और विभागीय परियोजनाओं की जानकारी भी दी तथा नलवाड़ी मेला 2020 की स्मारिका हेतु दिनांक 29-02-2020 तक साहित्यकारों से लेख उपलब्ध करवाने को कहा।