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Sonipat News: समय के साथ बदला लोहड़ी पर्व, बदल गई परंपराएं

Fri, 12 Jan 2024 11:30 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Fri, 12 Jan 2024 11:30 PM IST
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Lohri festival changed with time, traditions changed
शर्मिला बधवार, सहायक प्रोफेसर, भूगोल
समय के साथ बदला लोहड़ी पर्व, बदल गई परंपराएं
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-गांवों में परिवार और मनोरंजन के साधन तक सिमटा पर्व
सोनीपत। उत्तर भारत विशेषकर पंजाब और हरियाणा में मनाये जाने वाले लोहड़ी पर्व में समय के साथ बदलाव आया है। वहीं इस प्रसिद्ध पर्व को मनाने की परंपरा समय के साथ बदली हैं। हालांकि पर्व को लेकर युवाओं में आज भी जोश है। पंजाबी समुदाय व कई स्थानों पर आज भी इस पर्व को बड़े जोश व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। समय के बाद बदली पर्व की परंपराओं को लेकर प्राध्यापिकाओं से बातचीत की गई। सभी ने इस बारे में अपने विचार व्यक्त किए।
लोहड़ी पर्व को लेकर पहले हर आयुवर्ग के लोगों, महिलाओं व बच्चों में गजब का उत्साह होता था। यही कारण था कि एक सप्ताह पहले ही पर्व को मनाने के लिए तैयारियां शुरू कर दी जाती थीं। पहले लोहड़ी पर्व पर ढोल की थाप के साथ गिद्दा व भंगड़ा करते हुए जश्न मनाते थे। दिन ढलने के साथ ही यह उत्सव शुरू हो जाता था जो देर रात तक चलता था। आज परंपराएं बदल गई हैं और यह त्योहार एक दिन तक सिमटकर रह गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व परिवार और मनोरंजन के साधन तक सिमट गया है।
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इंसेट
यह है परंपरा
लोहड़ी पर्व फसल और मौसम से जुड़ा त्योहार है। पंजाब में ऐसे मौसम में किसानों के खेत लहलहाने लगते हैं। नई फसल की खुशी और अगली बुवाई की तैयारी से पहले इस त्योहार को धूमधाम से मनाया जाता है। लोहड़ी के समय ठंड का मौसम होता है। इसलिए इसमें आग जलाने की परंपरा है। लोहड़ी पर्व सूर्यदेव व अग्नि को समर्पित है। इसमें लोग फसल की बालियां डाल अग्नि देव को समर्पित कर पूजा करते हैं। इसके साथ ही इसके चारों तरफ चक्कर लगाते हुए तिल, मूंगफली और रेवड़ी डालते हैं और प्रसाद के रूप में बांटते हैं।
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लोहड़ी पर्व नई फसल की खुशी में मनाते हैं। तैयार हुई फसल की बालियों को अग्नि में समर्पित करते हुए परिवार व समाज की कुशलता के लिए मंगल कामना की जाती थी। बच्चे के जन्म के बाद और विवाह होने के बाद पहली लोहड़ी विशेष रूप से मनाते थे। अब परंपराएं बदल गई हैं और पर्व भी परिवार तक सिमट गया है।-वंदना नासा, एसोसिएट प्रोफेसर, वाणिज्य
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-लोहड़ी पर्व को पहले सभी समुदाय के लोग मिलकर एक जगह एकत्रित होकर धूमधाम से मनाते थे। नई फसल के नए दाने, तिल, मूंगफली को अग्नि को अर्पित करते थे। इससे समाज में एकता व अखंडता की भावना विकसित होती है। अब ऐसा नहीं रहा।-डॉ. शर्मिला बधवार, सहायक प्रोफेसर, भूगोल
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-पहले लोहड़ी पर्व की करीब एक सप्ताह पहले तैयारियां शुरू कर दी जाती थी और सभी लोग मिलकर इसे धूमधाम से मनाते थे। अब यह पर्व एक दिन तक सिमट गया है। यही नहीं पर्व को मनाने के तरीकों में भी बदलाव आया है। अब पहले जैसा उल्लास भी नजर नहीं आता।- पायल, संस्कृत प्रवक्ता, रोहट


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पहले लोहड़ी का पर्व परिवार के सभी सदस्य मिलकर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेकर मनाते थे। अब काफी स्थानों पर बड़े-बुजुर्ग नजर ही नहीं आते। या यूं कहें कि साथ रहते ही नहीं तो एक साथ मिलकर त्योहार कैसे मना सकते हैं।- रुचि, अंग्रेजी शिक्षिका
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