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सूनी आंखों में दीयों से टिमटिमाती है उम्मीद की रोशनी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 03 Nov 2021 12:00 AM IST
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The light of hope twinkles in the deserted eyes
सिरसा। जब हम छोटे होते हैं तो मां-बाप हमारा सहारा होते हैं और जब मां-बाप बुजुर्ग हो जाते हैं तो तब तक हम बड़े होकर उनका सहारा बनते हैं। यही भारतीय संस्कृति और समाज का सार है। बचपन में भी यही सिखाया जाता है कि हमें अपने बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए। लेकिन आधुनिकता की दौड़ और आपसी समझ में कमी आने से रिश्तों की डोर कमजोर हो रही है।
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राष्ट्रीय पर्व दीपावली पर अपनों की तलाशती निगाहें बेचैन हो जाती है जब सुनी दीवारों से बाहर उनकी आवाज अपनों तक नहीं पहुंच पाती। शहर के वृद्धा आश्रम में रह रही 71 वर्षीय जीवनी की भी यही कहानी है। सिरसा से 40 किलोमीटर दूर गांधी, राजस्थान की रहने वाली जीवनी देवी ने बताया कि ने उसका एक ही बेटा है। जब से बहू आई है तब से उसका बर्ताव बदल गया है। शादी के बाद धीरे-धीरे वो बदल गया। अच्छे से बात करना बंद कर दिया और मेरा ध्यान रखना भी बंद कर दिया। पति की बहुत पहले ही मौत हो चुकी। बेटा निजी कंपनी में अच्छी नौकरी करता है और पैसे भी अच्छे कमा लेता है। उसकी परवरिश इसी उम्मीद से की थी कि बुढ़ापे का सहारा बनेगा मगर शादी के बाद बहु नहीं चाहती थी कि मैं उनके साथ रहूं। वहीं मायके में भाईयों पर भी बोझ नहीं बनना चाहती थी। इसलिए यहां आश्रम में रह रही हूं।
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चार पोतों के बाद भी अकेली
जब कोई त्योहार आता है तो घर की याद और भी अधिक आती है। दिवाली जैसे बड़े त्योहार पारंपरिक तौर-तरीकों के साथ मनाते थे। मेरे चार पोते है उनके साथ बाजार जाती थी। खरीदारी करती थी, सब मिलके पूजा करते थे। लेकिन अब तो यह आश्रम ही मेरा घर-परिवार है। घर से न तो बेटा बहू का फोन आता है, और न ही पोतों का फोन आता है।
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डेढ़ साल पहले ली थी वृद्धाश्रम की शरण
जीवनी देवी ने बताया कि वृद्धाश्रम में वह पिछले करीब डेढ़ साल से है। एकलौते बेटे व बहू से परेशान होकर उसने अपने भाई से संपर्क किया। उसका भाई भी फतेहाबाद के वृद्ध आश्रम में रहता है। भाई ने ही उसे सिरसा आश्रम के बारे में बताया। जिसके बाद जीवनी देवी ने किसी पर भी बोझ न बनते हुए आश्रम में संपर्क किया और यहां पर रहने के लिए आ गई।
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