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समस्याएं बेशुमार.....कैसे समृद्ध होगी थिएटर कला
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रोहतक में करीब दस थिएटर ग्रुप एक्टिव हैं जो कि सिटी का मनोरंजन करने से लेकर युवाओं को थिएटर के माध्यम से युवा महोत्सव जैसे सशक्त मंच पर पहुंचाने का काम भी करते हैं। ऑडियन्स का मनोरंजन करने वाले ये थिएटर ग्रुप समस्याओं से जूझ रहे हैं। किसी की समस्या है फंडिंग तो किसी की समस्या है रिहर्सल के लिए जगह। चाहे कलर गैलरी फिल्म ऐंड थिएटर सोसायटी, मुखौटा नाट्य मंडली हो या मास्क थिएटर इन ग्रुपों को फंडिंग मिलती भी है तो छोटी सी। इसमें उनका स्टेज और कलाकारों का खर्च निकालना भी मुश्किल है। ऐसे में पॉकेट मनी से ये ग्रुप अपना खर्च चला रहे हैं।
खेल नर्सरियों की तरह हो कला नर्सरियां
खेल नर्सरियों की जैसे हरियाणा में कला नर्सरियां भी होनी चाहिए, खेलों में जैसे खिलाड़ी गोल्ड लेकर आते हैं ठीक उसी तरह कलाकार भी विदेशों में नाम चमका सकते हैं। हरियाणा में इतने रंगकर्मी है, फिर भी कला समृद्घ नहीं हो पा रही। इसका एक कारण फं डिंग और रिहर्सल के लिए जगह न मिलना है। राजनीति के फेर में आज हर जगह मठाधीश बैठे हैं। कलाकार हैं कि पार्टियों के नुमाइंदे बनकर रह गए हैं। आलम ये कि शहरवासी तो थिएटर देखना चाहते हैं, कलाकार प्रस्तुति देना चाहते हैं, लेकिन हरियाणा सरकार कला को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दे रही। इसी वजह से कला के क्षेत्र में आने से युवा पीढ़ी कदम आगे नहीं बढ़ा पाती। उन्हें डर है कि उनका भविष्य क्या होगा....? रंगशाला में पहले कलाकारों को 1100 रुपये चार्ज देना पड़ता था। लेकिन जब से नई रंगशाला बनी है कलाकारों के लिए यह मील का पत्थर साबित हो रही है। यह सिर्फ सरकारी कामों के इस्तेमाल मात्र की जगह रह गई है। क्योंकि इसका किराया 22 हजार रुपये है, जिसे कलाकार वहन नहीं कर पाते। कृष्ण ने बताया कि वह शहर में रंग गली थिएटर फेस्टिवल करना चाहते हैं। इसके लिए युवा कलाकार घर की छत पर ही रिहर्सल कर रहे हैं। नाटक तैयार हो जाएगा, लेकिन प्रस्तुति के लिए कहीं जगह नहीं मिल पा रही। सरकार को इतना तो सहयोग करना ही चाहिए कि रिहर्सल और नाटक प्रस्तुति के लिए जगह निशुल्क उपलब्ध करानी चाहिए।
- कृष्ण नाटक, कलर गैलरी फिल्म ऐंड थिएटर
कलाकार देखते हैं घर फूंक कर तमाशा....
कांग्रेस की सरकार में बीबी बत्रा रंगशाला के लिए ग्रांट लेकर आए थे, इसे कलाकारों के लिए बनाया गया था। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा, कलाकारों को यहां कोई जगह नहीं मिल पाती। ऐसे में कौन कलाकार घर फूंक तमाशा देखेगा...? रंगशाला सिर्फ गीता जयंती के सरकारी कार्यक्रमों के लिए नहीं बल्कि कलाकारों के थिएटर और म्यूजिक्ल प्रोग्राम के लिए होती है। सरकार की तरफ से न फंडिंग मिलती है और न रिहर्सल और प्रस्तुति के लिए जगह मिल पाती। हरियाणा कला परिषद ने सिर्फ नाम के लिए सेंटर बनाए हैं, कोई काम नहीं कराया। इनका मकसद तो आर्ट ऐंड कल्चर होना चाहिए, जहां कलाकारों और कला को बढ़ावा मिले, लेकिन हो बिल्कुल उल्टा रहा है। कला कोई राजनीति का अड्डा नहीं होती, कलाकार किसी पार्टी के नहीं होते। रंगशाला को कलाकरों के हाथ में देना चाहिए, इसके लिए एक कमेटी बनानी चाहिए। इसके बाद ही रोहतक में कला को बढ़ावा मिल सकेगा।
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- विश्वदीपक त्रिखा, सप्तक कल्चरल सोसायटी
नाटक के लिए नहीं मिलती फंडिंग
रंगमंच कोई बेचने वाली विद्या नहीं हैै। इसलिए थिएटर फंडिंग पर ही जीवित रह सकती है। लेकिन हरियाणा में फंडिंग नहीं है और कलाकारों को अपनी पॉकेट मनी से ही सर्वाइव करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि कला के लिए हरियाणा सरकार के पास बजट नहीं है, सरकार बजट देती है लेकिन, हरियाणा कला परिषद और मल्टी आर्ट कल्चर जैसे सेंटरों की तरफ से थिएटर ग्रुप्स को कोई जवाब नहीं मिल पाता। आलम ये है कि किसी भी थिएटर ग्रुप को साल में सरकारी सेंटरों से पांच शो की फंडिंग मिल पाना भी मुमकिन नहीं। राजनीति के फेर में उलझे यहां कुछ लोग ऐसे बैठे हुए हैं, जो थिएटर ग्रुप्स तक फंडिंग आने ही नहीं देते। यही वजह है कि कोई भी व्यक्ति लगातार थिएटर पर सक्रिय नहीं रह पाता और उसे आय का दूसरा साधन खोजना पड़ता है। इसलिए नए लोग और युवा बच्चे भी थिएटर में आने से घबराते हैं क्योंकि उन्हें कोई भविष्य नजर नहीं आता...। कला को प्रोत्साहित करने के लिए रंगशाला जैसे मंचों पर हर हफ्ते में एक नाटक तो होना ही चाहिए। इससे शहर में संस्कृति भी डेवलप होगी और कला को प्रोत्साहन भी मिलेगा। इसके अलावा थिएटर को एजूकेशन में भी जोड़ा जाए तो कायापलट होने में देर नहीं लगेगी। थिएटर आपको एक नजरिया देता है और गहराई से सोचने की शक्ति देता है।
- सतेंद्र सहरावत, मुखौटा नाट्य मंडली
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खेल नर्सरियों की तरह हो कला नर्सरियां
खेल नर्सरियों की जैसे हरियाणा में कला नर्सरियां भी होनी चाहिए, खेलों में जैसे खिलाड़ी गोल्ड लेकर आते हैं ठीक उसी तरह कलाकार भी विदेशों में नाम चमका सकते हैं। हरियाणा में इतने रंगकर्मी है, फिर भी कला समृद्घ नहीं हो पा रही। इसका एक कारण फं डिंग और रिहर्सल के लिए जगह न मिलना है। राजनीति के फेर में आज हर जगह मठाधीश बैठे हैं। कलाकार हैं कि पार्टियों के नुमाइंदे बनकर रह गए हैं। आलम ये कि शहरवासी तो थिएटर देखना चाहते हैं, कलाकार प्रस्तुति देना चाहते हैं, लेकिन हरियाणा सरकार कला को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दे रही। इसी वजह से कला के क्षेत्र में आने से युवा पीढ़ी कदम आगे नहीं बढ़ा पाती। उन्हें डर है कि उनका भविष्य क्या होगा....? रंगशाला में पहले कलाकारों को 1100 रुपये चार्ज देना पड़ता था। लेकिन जब से नई रंगशाला बनी है कलाकारों के लिए यह मील का पत्थर साबित हो रही है। यह सिर्फ सरकारी कामों के इस्तेमाल मात्र की जगह रह गई है। क्योंकि इसका किराया 22 हजार रुपये है, जिसे कलाकार वहन नहीं कर पाते। कृष्ण ने बताया कि वह शहर में रंग गली थिएटर फेस्टिवल करना चाहते हैं। इसके लिए युवा कलाकार घर की छत पर ही रिहर्सल कर रहे हैं। नाटक तैयार हो जाएगा, लेकिन प्रस्तुति के लिए कहीं जगह नहीं मिल पा रही। सरकार को इतना तो सहयोग करना ही चाहिए कि रिहर्सल और नाटक प्रस्तुति के लिए जगह निशुल्क उपलब्ध करानी चाहिए।
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- कृष्ण नाटक, कलर गैलरी फिल्म ऐंड थिएटर
कलाकार देखते हैं घर फूंक कर तमाशा....
कांग्रेस की सरकार में बीबी बत्रा रंगशाला के लिए ग्रांट लेकर आए थे, इसे कलाकारों के लिए बनाया गया था। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा, कलाकारों को यहां कोई जगह नहीं मिल पाती। ऐसे में कौन कलाकार घर फूंक तमाशा देखेगा...? रंगशाला सिर्फ गीता जयंती के सरकारी कार्यक्रमों के लिए नहीं बल्कि कलाकारों के थिएटर और म्यूजिक्ल प्रोग्राम के लिए होती है। सरकार की तरफ से न फंडिंग मिलती है और न रिहर्सल और प्रस्तुति के लिए जगह मिल पाती। हरियाणा कला परिषद ने सिर्फ नाम के लिए सेंटर बनाए हैं, कोई काम नहीं कराया। इनका मकसद तो आर्ट ऐंड कल्चर होना चाहिए, जहां कलाकारों और कला को बढ़ावा मिले, लेकिन हो बिल्कुल उल्टा रहा है। कला कोई राजनीति का अड्डा नहीं होती, कलाकार किसी पार्टी के नहीं होते। रंगशाला को कलाकरों के हाथ में देना चाहिए, इसके लिए एक कमेटी बनानी चाहिए। इसके बाद ही रोहतक में कला को बढ़ावा मिल सकेगा।
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- विश्वदीपक त्रिखा, सप्तक कल्चरल सोसायटी
नाटक के लिए नहीं मिलती फंडिंग
रंगमंच कोई बेचने वाली विद्या नहीं हैै। इसलिए थिएटर फंडिंग पर ही जीवित रह सकती है। लेकिन हरियाणा में फंडिंग नहीं है और कलाकारों को अपनी पॉकेट मनी से ही सर्वाइव करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि कला के लिए हरियाणा सरकार के पास बजट नहीं है, सरकार बजट देती है लेकिन, हरियाणा कला परिषद और मल्टी आर्ट कल्चर जैसे सेंटरों की तरफ से थिएटर ग्रुप्स को कोई जवाब नहीं मिल पाता। आलम ये है कि किसी भी थिएटर ग्रुप को साल में सरकारी सेंटरों से पांच शो की फंडिंग मिल पाना भी मुमकिन नहीं। राजनीति के फेर में उलझे यहां कुछ लोग ऐसे बैठे हुए हैं, जो थिएटर ग्रुप्स तक फंडिंग आने ही नहीं देते। यही वजह है कि कोई भी व्यक्ति लगातार थिएटर पर सक्रिय नहीं रह पाता और उसे आय का दूसरा साधन खोजना पड़ता है। इसलिए नए लोग और युवा बच्चे भी थिएटर में आने से घबराते हैं क्योंकि उन्हें कोई भविष्य नजर नहीं आता...। कला को प्रोत्साहित करने के लिए रंगशाला जैसे मंचों पर हर हफ्ते में एक नाटक तो होना ही चाहिए। इससे शहर में संस्कृति भी डेवलप होगी और कला को प्रोत्साहन भी मिलेगा। इसके अलावा थिएटर को एजूकेशन में भी जोड़ा जाए तो कायापलट होने में देर नहीं लगेगी। थिएटर आपको एक नजरिया देता है और गहराई से सोचने की शक्ति देता है।
- सतेंद्र सहरावत, मुखौटा नाट्य मंडली