{"_id":"610599868ebc3e0ff04a5ad7","slug":"the-figure-of-hepatitis-b-is-increasing-in-comparison-to-hepatitis-c-rohtak-news-rtk6195847152","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘हेपेटाइटिस-सी’ की तुलना में बढ़ रहा ‘हेपेटाइटिस-बी’ का आंकड़ा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘हेपेटाइटिस-सी’ की तुलना में बढ़ रहा ‘हेपेटाइटिस-बी’ का आंकड़ा
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
रोहतक। ‘हेपेटाइटिस-सी’ की तुलना में ‘हेपेटाइटिस-बी’ के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। हेपेटाइटिस-सी के मरीज पूरा उपचार कराकर ठीक हो जाते हैं, जबकि ‘हेपेटाइटिस-बी’ के मरीजों का उपचार जीवन भर चलता है। इसके चलते इनकी सूची लंबी होती जा रही है। वहीं सरकार संक्रमण के घातक प्रभावों से मरीजों को बचाने के लिए सूक्ष्म स्तर पर जांच करवा रही है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 6600 से अधिक हेपेटाइटिस-बी के संक्रमित मरीज हैं। इसमें से अकेले 5500 मरीज पीजीआईएमएस रोहतक में पंजीकृत हैं। जिला अस्पताल में हर जच्चा की जांच अनिवार्य होने के साथ रक्तदान शिविरों में भी यह जांच अनिवार्य है। इसके चलते नए संक्रमितों की पहचान हो रही है। सरकार का प्रयास है कि मरीज की गंभीर स्थिति होने से पहले ही संक्रमण का पता लगाया जा सके। सबसे अधिक प्रयास है कि जच्चा की जांच के दौरान ही पुष्टि की जाए कि वह वायरस से संक्रमित है या नहीं। यदि गर्भवती को हेपेटाइटिस-बी संक्रमण मिलता है तो उसे फॉलोअप पर रख दिया जाता है। गर्भवती महिला के प्रसव के बाद बच्चे की जांच की जाती है और फिर पांच से छह माह बाद उसकी जांच दोबारा की जाती है। एक्सपर्ट बताते हैं कि संक्रमित मां से जन्म लेने वाले बच्चे को पांच माह बाद भी संक्रमण मिल सकता है। इसलिए नवजात की जांच समय-समय पर करवाना आवश्यक है। यदि नवजात में वायरल लोड अधिक मिलता है तो उसे दवा दी जाती है। सबसे अहम है कि जच्चा की डिलीवरी अस्पताल में कराई जाए तभी समय पर संक्रमण को पकड़ा जा सकता है। संक्रमित मां से पैदा होेने वाले बच्चे को जन्म लेते ही अस्पताल में इम्यूनोग्लोबिन की दवा पिलाने के साथ हेपेटाइटिस-बी की वैक्सीन लगाई जाती है। एक साल का बच्चा होने पर उसकी जांच दोबारा की जाती है।
संक्रमित मां अपने बच्चों को पिला सकती है दूध
चिकित्सकों के अनुसार हेपेटाइटिस-बी से संक्रमित मां अपने बच्चों को दूध पिला सकती है। उसका दूध बच्चे के लिए पोषित और शक्तिशाली होता है।
सांसद भी कर चुके हैं तारीफ
प्रदेश में हेपेटाइटिस-बी और बी को लेकर चल रही सरकार की योजनाओं की तारीफ भी सांसद डॉ. अरविंद शर्मा कर चुके हैं। प्रदेश सरकार की सफलता के बाद यह योजना देश में लागू हुई है। इसके तहत हर मरीज को देश में नि:शुल्क उपचार व जांच सुविधा मिलती है।
विज्ञापन
कोट
हेपेटाइटिस-बी मिलना अधिक खतरनाक नहीं है, क्योंकि इसका उपचार है। समस्या वहां है, जहां लोग जांच ही नहीं करवाते और बीमारी को छिपाते हैं। देसी दवाओं व झाड़फूंक के चक्कर में मरीज अपना लीवर खराब कर लेते हैं। जब वे डॉक्टर के पास जाते हैं तो देर हो जाती है। 80 प्रतिशत मरीजों को तो दवा की ही जरूरत नहीं होती, बस अलर्ट रहने की जरूरत होती है। सभी को चाहिए कि वह जांच करवाएं और अपने डॉक्टर के संपर्क में रहें।
- डॉ. एचके अग्रवाल, रजिस्ट्रार एवं सीनियर फिजिशियन, पीजीआईएमएस
विज्ञापन
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 6600 से अधिक हेपेटाइटिस-बी के संक्रमित मरीज हैं। इसमें से अकेले 5500 मरीज पीजीआईएमएस रोहतक में पंजीकृत हैं। जिला अस्पताल में हर जच्चा की जांच अनिवार्य होने के साथ रक्तदान शिविरों में भी यह जांच अनिवार्य है। इसके चलते नए संक्रमितों की पहचान हो रही है। सरकार का प्रयास है कि मरीज की गंभीर स्थिति होने से पहले ही संक्रमण का पता लगाया जा सके। सबसे अधिक प्रयास है कि जच्चा की जांच के दौरान ही पुष्टि की जाए कि वह वायरस से संक्रमित है या नहीं। यदि गर्भवती को हेपेटाइटिस-बी संक्रमण मिलता है तो उसे फॉलोअप पर रख दिया जाता है। गर्भवती महिला के प्रसव के बाद बच्चे की जांच की जाती है और फिर पांच से छह माह बाद उसकी जांच दोबारा की जाती है। एक्सपर्ट बताते हैं कि संक्रमित मां से जन्म लेने वाले बच्चे को पांच माह बाद भी संक्रमण मिल सकता है। इसलिए नवजात की जांच समय-समय पर करवाना आवश्यक है। यदि नवजात में वायरल लोड अधिक मिलता है तो उसे दवा दी जाती है। सबसे अहम है कि जच्चा की डिलीवरी अस्पताल में कराई जाए तभी समय पर संक्रमण को पकड़ा जा सकता है। संक्रमित मां से पैदा होेने वाले बच्चे को जन्म लेते ही अस्पताल में इम्यूनोग्लोबिन की दवा पिलाने के साथ हेपेटाइटिस-बी की वैक्सीन लगाई जाती है। एक साल का बच्चा होने पर उसकी जांच दोबारा की जाती है।
विज्ञापन
संक्रमित मां अपने बच्चों को पिला सकती है दूध
चिकित्सकों के अनुसार हेपेटाइटिस-बी से संक्रमित मां अपने बच्चों को दूध पिला सकती है। उसका दूध बच्चे के लिए पोषित और शक्तिशाली होता है।
सांसद भी कर चुके हैं तारीफ
प्रदेश में हेपेटाइटिस-बी और बी को लेकर चल रही सरकार की योजनाओं की तारीफ भी सांसद डॉ. अरविंद शर्मा कर चुके हैं। प्रदेश सरकार की सफलता के बाद यह योजना देश में लागू हुई है। इसके तहत हर मरीज को देश में नि:शुल्क उपचार व जांच सुविधा मिलती है।
विज्ञापन
कोट
हेपेटाइटिस-बी मिलना अधिक खतरनाक नहीं है, क्योंकि इसका उपचार है। समस्या वहां है, जहां लोग जांच ही नहीं करवाते और बीमारी को छिपाते हैं। देसी दवाओं व झाड़फूंक के चक्कर में मरीज अपना लीवर खराब कर लेते हैं। जब वे डॉक्टर के पास जाते हैं तो देर हो जाती है। 80 प्रतिशत मरीजों को तो दवा की ही जरूरत नहीं होती, बस अलर्ट रहने की जरूरत होती है। सभी को चाहिए कि वह जांच करवाएं और अपने डॉक्टर के संपर्क में रहें।
- डॉ. एचके अग्रवाल, रजिस्ट्रार एवं सीनियर फिजिशियन, पीजीआईएमएस