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स्कूलों में बच्चों को नहीं मिल रहा मिड-डे-मील में दूध

Mon, 22 Jan 2018 01:37 AM IST
Updated Mon, 22 Jan 2018 01:37 AM IST
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स्कूलों में बच्चों को नहीं मिल रहा मिड-डे-मील में दूध
मिड-डे-मील: स्कूलों में बच्चों को नहीं मिल रहा फ्लेवर्ड मिल्क
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चरखी दादरी।
पिछले करीब छह माह पहले सरकार व शिक्षा विभाग ने दोपहर के भोजन में दूध को शामिल करने की बात कही थी। विभाग अधिकारियों का तर्क था कि बच्चों को पौष्टिक भोजन मिले ऐसे में दूध को शामिल करना जरूरी है। इसलिए विभाग ने प्रति बालक 200 मिलीग्राम दूध दिए जाने की योजना बनाई है। इस संबंध में विभाग की ओर से मिड-डे-मील प्रभारियों को ट्रेनिंग भी दी जा चुकी है और बच्चों को दिए जाने वाले दूध के फ्लेवर भी फाइनल हो गए हैं। इसके बाद भी अब तक स्कूलों में बच्चों को मिड-डे-मील के रूप में दूध मिलना शुरू नहीं हुआ है। शिक्षा विभाग की ओर से स्कूलों में दूध के ये पांच फ्लेवर सूखे पाउडर के रूप में उपलब्ध कराए जाने हैं।
जानकारी के अनुसार जिले के स्कूलों में पढ़ने वाले करीब बीस हजार विद्यार्थियों को दोपहर के भोजन के रूप में मिड-डे मील दिया जाता है। इस समय बच्चों को चार दिन चावल व दो दिन गेहूं से बने व्यंजन खिलाए जा रहे हैं। इन व्यंजनों से बालकों को शरीर के लिए आवश्यक सभी पौष्टिक तत्व नहीं मिल पा रहे हैं। वैसे ही देश का हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार बना हुआ है। इसलिए करीब छह माह पहले सरकार व विभाग ने दोपहर के भोजन में दूध को शामिल करने की बात कही थी। विभाग अधिकारियों का तर्क था कि बच्चों को दिए जाने वाले पौष्टिक भोजन में दूध को शामिल करना जरूरी है। दूध में व्याप्त पोषक तत्वों से बच्चे का शारीरिक व मानसिक विकास जल्द होता है। कुषोषण से बचाने में दूध काफी गुणकारी साबित होता है। दूध में प्रोटीन के अलावा, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, वसा, विटामिन के अन्य स्रोत प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं। विभाग की प्लान के अनुसार प्रत्येक बच्चे को 200 मिलीग्राम दूध दिया जाना है ताकि उसका शारीरिक व मानसिक विकास हो सके। दूध के वितरण एवं तैयार करने की विधि भी करीब दो माह पहले शिक्षकों को समझाई जा चुकी है। बच्चों की संख्या चार माह पहले भेजी जा चुकी है लेकिन आज तक सरकारी स्कूलों में दूध नहीं पहुंचा है। इसे लेकर मिड-डे-मिल इंचार्ज व स्कूल मुखिया भी दुविधा की स्थिति में हैं। मौलिक शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के तहत कक्षा छह से आठवीं तक बच्चों को फ्री व अनिवार्य रूप से शिक्षा प्रदान करने का प्रावधान है। पुस्तकें ,वर्दी व दोपहर का भोजन फ्री में दिए जाने की व्यवस्था है। विभाग ने कक्षा आठवीं तक बच्चों को दो वर्गों में बांट रखा है। एक प्राइमरी वर्ग व दूसरा अपर प्राइमरी वर्ग है इन दोनों वर्गों की श्रेणियों के बच्चों के लिए दोपहर के भोजन का खर्च सरकार की ओर से वहन किया जाता है। प्राइमरी व अपर प्राइमरी के बच्चों के लिए प्रति बालक अलग-अलग खर्च करने का प्रावधान है।
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सप्ताह में दिए जा रहे हैं चार दिन चावल व दो दिन गेहूं से बने व्यंजन
-- इस समय स्कूलों में दोपहर के भोजन में चार दिन चावल व दो दिन गेहूं से बने व्यंजन ज्यादा इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इस दोपहर के भोजन में कुल 16 प्रकार के व्यंजन शामिल हैं जो प्रत्येक दिन के लिए अलग-अलग रूप में हैं। शरीर की पौष्टिकता के लिहाज से यह व्यंजन निर्धारित कर रखे हैं ताकि बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़े व कुपोषण का शिकार होने से बच सके।
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जिले के दादरी ब्लॉक, बौंद कलां ब्लॉक व बाढड़ा ब्लॉक में कक्षा पहली से आठवीं तक के कुल 20 हजार छात्रों को यह दूध मिलना है। प्रत्येक ब्लॉक में करीब छह से सात हजार छात्र संख्या है। सरकार की ओर से स्कूलों में सूखा पाउडर भेजा जाना है । इस सूखे दूध में इलायची, स्ट्राबेरी, चॉकलेट, रोज फ्लोर व पाइन एप्पल शामिल होंगे। इस पाउडर को गुनगुने पानी में मिलाकर इसका दूध तैयार करना है।

प्रत्येक बालक पर 4.13 रूपये खर्च
इस समय प्राइमरी स्कूल के प्रत्येक बच्चे पर दोपहर के भोजन पर 4.13 रुपये खर्च किया जा रहा है जबकि अपर प्राइमरी यानी कक्षा छह से आठवीं तक के बच्चे पर 6.18 रुपये खर्च किया जा रहा है। चावल, दाल व गेहूं इस खर्च राशि में शामिल नहीं हैं। सरकार इस खर्च राशि में हर साल सात प्रतिशत बढ़ोतरी करती है। यह बढ़ोतरी हर साल जुलाई में की जाती है लेकिन समय- समय पर बजट में यह बढ़ोतरी नहीं होने से मिड-डे-मील इंचार्ज व स्कूल मुखियों को काफी आर्थिक परेशानियां झेलनी पड़ती हैं।

- :चिकित्सक की राय-
सूखे पाउडर का दूध बच्चों में शारीरिक विकास के साथ-साथ ब्रेन का तीव्र गति से विकास करता है। सूखा पाउडर का दूध पूरी तरह से वैज्ञानिक विधि से उपचारित होता है जिसमें डीएचईए ऐसा तत्व होता है जो बच्चे के मस्तिष्क का विकास करता है। इस दूध में माइक्रोन्यूट्रेंस जैसे जिंक, आयरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम आदि कई प्रकार के पोषक तत्व बच्चे का शारीरिक विकास करते हैं। बच्चे को कम से कम प्रतिदिन 200 मिलीग्राम तो अवश्य पीना चाहिए। बच्चे आज कुपोषण का शिकार हो रहे हैं।

एमबीबीएस डॉ. मेजर योगेंद्र देशवाल
=वर्सन-
विभाग की ओर से मिड-डे मील में बच्चों को दूध देने का प्रावधान है। हमने इस संबंध में डिमांड उच्चाधिकारियों को भेज रखी है। उच्चाधिकारियों ने इस बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं की है कि बच्चों को दूध कब से मिलना शुरू होगा।
कुलदीप फौगाट, बीईईओ, बौंदकलां खंड
बीईईओ कुलदीप सिंह
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