{"_id":"6ab2e90c84e1da41760bb148","slug":"special-on-martyrs-day-rao-tularam-left-his-princely-state-rewari-news-c-198-1-fth1001-245908-2026-09-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"शहीदी दिवस पर विशेष : रिसायत छोड़ आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे राव तुलाराम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शहीदी दिवस पर विशेष : रिसायत छोड़ आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे राव तुलाराम
विज्ञापन
राजा राव तुला राम की प्रतिमा। संवाद
- फोटो : Archive
रेवाड़ी। 23 सितंबर को हरियाणा में वीर एवं शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन अहीरवाल के वीर सपूत और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नायकों में शामिल राव राजा तुला राम की शौर्यगाथा को याद करने का अवसर है। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपनी रियासत, राजसत्ता और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक का त्याग कर दिया। उनका जीवन आज भी स्वाभिमान, साहस और राष्ट्र के प्रति समर्पण की मिसाल माना जाता है।
शिक्षाविद एवं साहित्यकार मनोज वशिष्ठ ने बताया कि राव तुला राम का जन्म 9 दिसंबर 1825 को रेवाड़ी के रामपुरा में हुआ था। अपने पिता राव पूरन सिंह के निधन के बाद उन्हें कम उम्र में ही रियासत की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। उन्होंने प्रशासन को व्यवस्थित करने के साथ-साथ किसानों और आम लोगों के हितों पर भी ध्यान दिया। राव तुला राम दूरदर्शी शासक थे। वे समझ चुके थे कि अंग्रेजी सत्ता का मुकाबला केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं किया जा सकता। इसी सोच के चलते रेवाड़ी में सैन्य तैयारी और हथियारों की व्यवस्था को मजबूत किया गया।
1857 में रेवाड़ी से उठी अंग्रेजों के खिलाफ हुंकार
1857 की क्रांति के दौरान राव तुला राम ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाला। उनके साथ राव गोपाल देव और स्थानीय योद्धाओं ने भी संघर्ष किया। रेवाड़ी क्षेत्र में अंग्रेजी प्रशासन को चुनौती देते हुए उन्होंने स्वतंत्र शासन व्यवस्था कायम करने का प्रयास किया। दिल्ली में बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में चल रहे विद्रोह को उन्होंने आर्थिक और सैन्य सहयोग भी दिया।
विज्ञापन
16 नवंबर 1857 को नारनौल के समीप नसीबपुर के मैदान में अंग्रेजी सेना और क्रांतिकारियों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस संघर्ष में अहीरवाल के अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। युद्ध के बाद भी राव तुला राम ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया।
देश की आजादी के लिए विदेश तक पहुंचे
मनोज वशिष्ठ ने बताया कि नसीबपुर के युद्ध के बाद राव तुला राम का संघर्ष भारत की सीमाओं से बाहर तक पहुंचा। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ समर्थन जुटाने के लिए अफगानिस्तान और अन्य क्षेत्रों में संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। उस समय परिवहन और संचार के सीमित साधनों के बावजूद विदेश जाकर सहयोग जुटाने की उनकी कोशिश उनके दूरदर्शी व्यक्तित्व को दर्शाती है। 23 सितंबर 1863 को काबुल में उनका निधन हो गया। जन्मभूमि से दूर अंतिम सांस लेने वाले राव तुला राम की लड़ाई व्यक्तिगत सत्ता के लिए नहीं, बल्कि विदेशी शासन से मुक्ति के उद्देश्य से थी।
विज्ञापन
शिक्षाविद एवं साहित्यकार मनोज वशिष्ठ ने बताया कि राव तुला राम का जन्म 9 दिसंबर 1825 को रेवाड़ी के रामपुरा में हुआ था। अपने पिता राव पूरन सिंह के निधन के बाद उन्हें कम उम्र में ही रियासत की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। उन्होंने प्रशासन को व्यवस्थित करने के साथ-साथ किसानों और आम लोगों के हितों पर भी ध्यान दिया। राव तुला राम दूरदर्शी शासक थे। वे समझ चुके थे कि अंग्रेजी सत्ता का मुकाबला केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं किया जा सकता। इसी सोच के चलते रेवाड़ी में सैन्य तैयारी और हथियारों की व्यवस्था को मजबूत किया गया।
विज्ञापन
1857 में रेवाड़ी से उठी अंग्रेजों के खिलाफ हुंकार
1857 की क्रांति के दौरान राव तुला राम ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाला। उनके साथ राव गोपाल देव और स्थानीय योद्धाओं ने भी संघर्ष किया। रेवाड़ी क्षेत्र में अंग्रेजी प्रशासन को चुनौती देते हुए उन्होंने स्वतंत्र शासन व्यवस्था कायम करने का प्रयास किया। दिल्ली में बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में चल रहे विद्रोह को उन्होंने आर्थिक और सैन्य सहयोग भी दिया।
विज्ञापन
16 नवंबर 1857 को नारनौल के समीप नसीबपुर के मैदान में अंग्रेजी सेना और क्रांतिकारियों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस संघर्ष में अहीरवाल के अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। युद्ध के बाद भी राव तुला राम ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया।
देश की आजादी के लिए विदेश तक पहुंचे
मनोज वशिष्ठ ने बताया कि नसीबपुर के युद्ध के बाद राव तुला राम का संघर्ष भारत की सीमाओं से बाहर तक पहुंचा। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ समर्थन जुटाने के लिए अफगानिस्तान और अन्य क्षेत्रों में संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। उस समय परिवहन और संचार के सीमित साधनों के बावजूद विदेश जाकर सहयोग जुटाने की उनकी कोशिश उनके दूरदर्शी व्यक्तित्व को दर्शाती है। 23 सितंबर 1863 को काबुल में उनका निधन हो गया। जन्मभूमि से दूर अंतिम सांस लेने वाले राव तुला राम की लड़ाई व्यक्तिगत सत्ता के लिए नहीं, बल्कि विदेशी शासन से मुक्ति के उद्देश्य से थी।