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दस साल से बिना छत के पड़े हैं सरकारी स्कूलों के कमरे
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मतलौडा। राजकीय स्कूलों में पिछले दस साल पहले सर्व शिक्षा अभियान के तहत बनए गए कमरे आज भी अधूरे पड़े हैं। सरकार ग्रांट की पहली किस्त देकर भूल गई। परिणामस्वरूप बिना छत के खड़े इन कमरो में घास उग गई है। क्षेत्र के दरियापुर, मतलौडा समेत कई स्कूलों में आधे अधूरे पड़े इन कमरो के कारण बच्चों को बड़ी परेशानी हो रही है।
दरियापुर वासी रामफल, सतीश कुमार व मतलौडा निवासी बलवान व जसबीर ने बताया कि स्कूलों में आधे अधूरे पड़े कमरो सांप, बिच्छु जैसे जहरीले कीट पनप रहे हैं। जो स्कूली बच्चों के लिए खतरा बने हुए हैं। बार-बार डिमांड करने के बाद भी सरकार की ओर से इन कमरों का निर्माण कार्य पूरा नहीं करवाया जा रहा ।
स्कूल मुख्याध्यापकों को ही सरकार ने बनाया ठेकेदार : इन अधूरे पड़े कमरों का दो कारण बताए गए हैं। अध्यापकों ने बताया कि इन कमरों के लिए ग्रांट तीन किस्तों में आती थी। पहली 50 प्रतिशत, दूसरी 45 प्रतिशत और तीसरी 5 प्रतिशत राशि की ग्रांट सीधे स्कूल के मुख्याध्यापक के खाते में भेजी जाती थी। स्कूल के मुख्याध्यापक को ही इन कमरों का निर्माण करवाया जाना था। लेकिन बीच में ही मुख्याध्यापक का तबादला हो जाता था। बकाया राशि व मटेरियल को लेकर अध्यापकों में चार्ज लेने व देने में पेंच फंसा रहता था। दूसरा कारण सरकार ने कुल लागत की 50 प्रतिशत की पहली किस्त तो जारी कर दी थी, लेकिन दूसरी किस्त दो साल बाद जारी की गई। तब तक मटेरियल के रेट बढ़ गए और किसी ने भी इन अधूरे कमरों के निर्माण को पूरा करने में रुचि नहीं दिखाई। रिवाइज एस्टीमेट बनवाने के चक्कर में इनके निर्माण का कार्य लटक कर रह गया।
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इस संबंध में ब्लाक शिक्षा मनीष गुप्ता ने कहा कि स्कूल में एसएसए के कमरे वर्ष 2011 से अधूरे पड़े हैं। विभाग को बार-बार डिमांड भेजी जा रही है, लेकिन अब तक इनका समाधान नहीं हो रहा।
सरकार ने ग्रांट नहीं की जारी : सिंह
इस संबंध में सर्व शिक्षा अभियान के जिला परियोजना संयोजक सतपाल सिंह ने बताया कि एसएसए के तहत बनने वाले कमरे पिछले दस साल से प्रदेशभर के हर जिले में अधूरे पड़े हैं। हमारी ओर से बार-बार डिमांड भेजी जा चुकी है। रिवाइज एस्टीमेट भी भेजे गए हैं, लेकिन अब तक कोई ग्रांट सरकार की ओर से जारी नहीं की गई है।
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दरियापुर वासी रामफल, सतीश कुमार व मतलौडा निवासी बलवान व जसबीर ने बताया कि स्कूलों में आधे अधूरे पड़े कमरो सांप, बिच्छु जैसे जहरीले कीट पनप रहे हैं। जो स्कूली बच्चों के लिए खतरा बने हुए हैं। बार-बार डिमांड करने के बाद भी सरकार की ओर से इन कमरों का निर्माण कार्य पूरा नहीं करवाया जा रहा ।
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स्कूल मुख्याध्यापकों को ही सरकार ने बनाया ठेकेदार : इन अधूरे पड़े कमरों का दो कारण बताए गए हैं। अध्यापकों ने बताया कि इन कमरों के लिए ग्रांट तीन किस्तों में आती थी। पहली 50 प्रतिशत, दूसरी 45 प्रतिशत और तीसरी 5 प्रतिशत राशि की ग्रांट सीधे स्कूल के मुख्याध्यापक के खाते में भेजी जाती थी। स्कूल के मुख्याध्यापक को ही इन कमरों का निर्माण करवाया जाना था। लेकिन बीच में ही मुख्याध्यापक का तबादला हो जाता था। बकाया राशि व मटेरियल को लेकर अध्यापकों में चार्ज लेने व देने में पेंच फंसा रहता था। दूसरा कारण सरकार ने कुल लागत की 50 प्रतिशत की पहली किस्त तो जारी कर दी थी, लेकिन दूसरी किस्त दो साल बाद जारी की गई। तब तक मटेरियल के रेट बढ़ गए और किसी ने भी इन अधूरे कमरों के निर्माण को पूरा करने में रुचि नहीं दिखाई। रिवाइज एस्टीमेट बनवाने के चक्कर में इनके निर्माण का कार्य लटक कर रह गया।
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इस संबंध में ब्लाक शिक्षा मनीष गुप्ता ने कहा कि स्कूल में एसएसए के कमरे वर्ष 2011 से अधूरे पड़े हैं। विभाग को बार-बार डिमांड भेजी जा रही है, लेकिन अब तक इनका समाधान नहीं हो रहा।
सरकार ने ग्रांट नहीं की जारी : सिंह
इस संबंध में सर्व शिक्षा अभियान के जिला परियोजना संयोजक सतपाल सिंह ने बताया कि एसएसए के तहत बनने वाले कमरे पिछले दस साल से प्रदेशभर के हर जिले में अधूरे पड़े हैं। हमारी ओर से बार-बार डिमांड भेजी जा चुकी है। रिवाइज एस्टीमेट भी भेजे गए हैं, लेकिन अब तक कोई ग्रांट सरकार की ओर से जारी नहीं की गई है।