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पीजीआई की इमरजेंसी में तोड़-फोड, गुस्साए डाक् टरों ने जताया राष
Updated Sat, 24 Mar 2018 01:48 AM IST
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पीजीआई इमरजेंसी में तोड़फोड़, गुस्साए डॉक्टरों ने जताया रोष
21 मार्च की रात को मरीज की हुई थी मौत, डायलिसिस की मशीन तोड़ी
रेजिडेंट डॉक्टरों ने काले रिबन बांधकर जताया रोष, डायरेक्टर से की मुलाकात
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़।
पेशेंट की मौत के बाद गुस्साए परिजनों ने पीजीआई की इमरजेंसी में तोड़फोड़ की और करीब 22 लाख रुपये की डायलिसिस मशीन को चकनाचूर कर दिया। परिजनों ने जूनियर डॉक्टरों से भी गाली-गलौच की और उन्हें धमकी दी। इससे पीजीआई के जूनियर डॉक्टरों में काफी रोष है। शुक्रवार को उन्होंने काली पट्टी बांधकर अपना गुस्सा जाहिर किया। बाद में डायरेक्टर प्रो. जगतराम से मुलाकात कर अपनी मांगें रखीं। डॉक्टरों का कहना था कि ऐसे माहौल में पीजीआई इमरजेंसी में काम करना मुश्किल है। इमरजेंसी के हालात को सुधारा जाए। डॉक्टरों को सुरक्षा भी मुहैया करवाई जाए। डायरेक्टर ने आश्वासन दिया कि वे उनकी मांगों पर गौर करेंगे। एक कमेटी बनाएंगे और कमेटी देखेगी कि सुधार की क्या गुंजाइश है। डायरेक्टर के इस जवाब से डॉक्टर संतुष्ट नहीं हुए। उनका कहना है कि दो साल पहले भी इमरजेंसी के मुद्दे को लेकर हड़ताल हुई थी, लेकिन उसके बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ।
पंजाब के सुखमनप्रीत को पीजीआई इमरजेंसी में 16 मार्च को दाखिल कराया गया था। उसके ब्लड सेल खराब हो चुके थे। काफी गंभीर था। डॉक्टरों ने दावा किया कि परिजनों को पहले ही बता दिया गया था कि मरीज की हालत गंभीर है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट के अलावा इलाज का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। बोनमैरो ट्रांसप्लांट के खर्च के बारे में भी जानकारी दी गई थी। 21 मार्च की शाम मरीज की मौत हो गई। दावा किया गया कि इलाज में कोई कोताही नहीं बरती गई थी। वहीं परिजनों का आरोप था कि उनके मरीज के इलाज में लापरवाही बरती गई है। मौत की सूचना से परिजन आपा खो गए और इमरजेंसी में रखी डायलिसिस की मशीन को तोड़ दिया। बताया गया कि पोर्टेबल डायलिसिस मशीन की कीमत करीब 22 लाख रुपये है।
डॉक्टरों का आरोप है कि उसके बाद परिजन उन्हें मारने के लिए आगे बढ़े तो डॉक्टरों ने रूम को बंद कर खुद को बचाया। सिक्योरिटी गार्ड के आने के बाद स्थिति कुछ संभली तब जाकर डॉक्टरों के सांस में सांस आई। डॉक्टरों ने कहा कि यदि दरवाजा बंद नहीं करते तो उनसे मारपीट भी होती। वहां पर महिला डॉक्टर भी मौजूद थीं।
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काला रिबन बांधकर डॉक्टरों ने किया काम
इस घटना से पीजीआई के रेजिडेंट डॉक्टरों में जबरदस्त रोष है। उनका कहना है कि इमरजेंसी का जो हाल है, उसमें काम करना मुश्किल हो गया है। पीजीआई की तरफ से सुरक्षा का दावा किया जाता है, मगर आए दिन मरीज के परिजन झगड़ा करते हैं। मरीजों की भीड़ बढ़ती जा रही है, जबकि डॉक्टरों की संख्या में इजाफा नहीं हुआ है। 18 घंटे से ज्यादा डॉक्टर काम कर रहे हैं, मगर उनकी सुध नहीं ली जा रही है। हर दिन मारपीट का खतरा रहता है। इस बारे में पीजीआई प्रशासन उनकी कोई सुध नहीं लेता है। इससे गुस्साए डॉक्टरों ने शुक्रवार को काला रिबन बांधकर काम किया।
क्या है डॉक्टरों की मांगें
1. डॉक्टरों को सुरक्षा मुहैया करवाई जाए।
2. इमरजेंसी का माहौल सुधारा जाए।
3. मरीजों की भीड़ कंट्रोल की जाए।
4. डॉक्टरों की संख्या में इजाफा किया जाए।
कोट
डॉक्टरों की मांग पर गौर किया जा रहा है। इसके लिए पीजीआई पूरी तरह से गंभीर है। कई बार मरीज के परिजन आपा खो देते हैं। मरीज के परिजनों को समझना चाहिए कि कोई भी डॉक्टर जानबूझकर लापरवाही नहीं करता है। पीजीआई में हद से ज्यादा मरीजों का बोझ है। फिर भी पीजीआई मैनेज कर रहा है।
- प्रो. जगतराम, डायरेक्टर पीजीआई।
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21 मार्च की रात को मरीज की हुई थी मौत, डायलिसिस की मशीन तोड़ी
रेजिडेंट डॉक्टरों ने काले रिबन बांधकर जताया रोष, डायरेक्टर से की मुलाकात
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़।
पेशेंट की मौत के बाद गुस्साए परिजनों ने पीजीआई की इमरजेंसी में तोड़फोड़ की और करीब 22 लाख रुपये की डायलिसिस मशीन को चकनाचूर कर दिया। परिजनों ने जूनियर डॉक्टरों से भी गाली-गलौच की और उन्हें धमकी दी। इससे पीजीआई के जूनियर डॉक्टरों में काफी रोष है। शुक्रवार को उन्होंने काली पट्टी बांधकर अपना गुस्सा जाहिर किया। बाद में डायरेक्टर प्रो. जगतराम से मुलाकात कर अपनी मांगें रखीं। डॉक्टरों का कहना था कि ऐसे माहौल में पीजीआई इमरजेंसी में काम करना मुश्किल है। इमरजेंसी के हालात को सुधारा जाए। डॉक्टरों को सुरक्षा भी मुहैया करवाई जाए। डायरेक्टर ने आश्वासन दिया कि वे उनकी मांगों पर गौर करेंगे। एक कमेटी बनाएंगे और कमेटी देखेगी कि सुधार की क्या गुंजाइश है। डायरेक्टर के इस जवाब से डॉक्टर संतुष्ट नहीं हुए। उनका कहना है कि दो साल पहले भी इमरजेंसी के मुद्दे को लेकर हड़ताल हुई थी, लेकिन उसके बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ।
पंजाब के सुखमनप्रीत को पीजीआई इमरजेंसी में 16 मार्च को दाखिल कराया गया था। उसके ब्लड सेल खराब हो चुके थे। काफी गंभीर था। डॉक्टरों ने दावा किया कि परिजनों को पहले ही बता दिया गया था कि मरीज की हालत गंभीर है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट के अलावा इलाज का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। बोनमैरो ट्रांसप्लांट के खर्च के बारे में भी जानकारी दी गई थी। 21 मार्च की शाम मरीज की मौत हो गई। दावा किया गया कि इलाज में कोई कोताही नहीं बरती गई थी। वहीं परिजनों का आरोप था कि उनके मरीज के इलाज में लापरवाही बरती गई है। मौत की सूचना से परिजन आपा खो गए और इमरजेंसी में रखी डायलिसिस की मशीन को तोड़ दिया। बताया गया कि पोर्टेबल डायलिसिस मशीन की कीमत करीब 22 लाख रुपये है।
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डॉक्टरों का आरोप है कि उसके बाद परिजन उन्हें मारने के लिए आगे बढ़े तो डॉक्टरों ने रूम को बंद कर खुद को बचाया। सिक्योरिटी गार्ड के आने के बाद स्थिति कुछ संभली तब जाकर डॉक्टरों के सांस में सांस आई। डॉक्टरों ने कहा कि यदि दरवाजा बंद नहीं करते तो उनसे मारपीट भी होती। वहां पर महिला डॉक्टर भी मौजूद थीं।
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काला रिबन बांधकर डॉक्टरों ने किया काम
इस घटना से पीजीआई के रेजिडेंट डॉक्टरों में जबरदस्त रोष है। उनका कहना है कि इमरजेंसी का जो हाल है, उसमें काम करना मुश्किल हो गया है। पीजीआई की तरफ से सुरक्षा का दावा किया जाता है, मगर आए दिन मरीज के परिजन झगड़ा करते हैं। मरीजों की भीड़ बढ़ती जा रही है, जबकि डॉक्टरों की संख्या में इजाफा नहीं हुआ है। 18 घंटे से ज्यादा डॉक्टर काम कर रहे हैं, मगर उनकी सुध नहीं ली जा रही है। हर दिन मारपीट का खतरा रहता है। इस बारे में पीजीआई प्रशासन उनकी कोई सुध नहीं लेता है। इससे गुस्साए डॉक्टरों ने शुक्रवार को काला रिबन बांधकर काम किया।
क्या है डॉक्टरों की मांगें
1. डॉक्टरों को सुरक्षा मुहैया करवाई जाए।
2. इमरजेंसी का माहौल सुधारा जाए।
3. मरीजों की भीड़ कंट्रोल की जाए।
4. डॉक्टरों की संख्या में इजाफा किया जाए।
कोट
डॉक्टरों की मांग पर गौर किया जा रहा है। इसके लिए पीजीआई पूरी तरह से गंभीर है। कई बार मरीज के परिजन आपा खो देते हैं। मरीज के परिजनों को समझना चाहिए कि कोई भी डॉक्टर जानबूझकर लापरवाही नहीं करता है। पीजीआई में हद से ज्यादा मरीजों का बोझ है। फिर भी पीजीआई मैनेज कर रहा है।
- प्रो. जगतराम, डायरेक्टर पीजीआई।