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औरंगाबाद-मितरौल में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर हुआ यज्ञानुष्ठान
Updated Mon, 03 Sep 2018 11:32 PM IST
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औरंगाबाद-मितरौल में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर हुआ यज्ञानुष्ठान
अमर उजाला ब्यूरो
पलवल। आर्य समाज औरंगाबाद मितरौल के तत्वावधान में सोमवार को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में वैदिक सत्संग व यज्ञानुष्ठान किया गया। यज्ञ में गजेंद्र सिंह चौहान ने यजमान की भूमिका निभाई। राजदेव नैष्ठिक व दयालुमुनी ने यज्ञ संपन्न कराया। इस अवसर पर महात्मा श्रद्धानंद सरस्वती ने कहा कि योगेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र का सम्पूर्ण जीवन निष्कलंक रहा। उन्होंने हमेशा गौ संवर्धन, धर्मरक्षा और सज्जनों की रक्षा के लिए कार्य किया। उन्होंने अपने गरीब मित्र सुदामा के साथ मित्रधर्म का परिपालन किया।
श्रद्धानंद ने कहा कि आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने श्रीकृष्ण के बारे में कहा है कि उनका जीवन आप्त पुरुषों के सदृश था उन्होंने अपने जीवन में कोई पाप नहीं किया। योगेश्वर श्रीकृष्ण दोनों समय संध्या और हवन किया करते थे, वे ईश्वर के उपासक थे। उन्होंने अर्जुन को आत्मा की अमरता का उपदेश किया। महात्मा श्रद्धानन्द ने कहा श्रीकृष्ण ईश्वर के अवतार नहीं थे। वेद में ईश्वर को अकायम बताया गया है तो ईश्वर के अवतार लेने की अवधारणा वैसे भी निराधर सिद्ध होती है। श्रीकृष्ण के जीवन का लक्ष्य था सज्जनों की रक्षा, दुष्टों का नाश और धर्म की रक्षा करना था।
उन्होंने मनुष्यमात्र के लिए एक संदेश दिया यज्ञ करना चाहिए, दान देना चाहिए और तप करना चाहिए। यज्ञ, दान और तप करने से अंतकरण पवित्र होता है। वे जुआ और मद्यपान के खोर विरोधी थे। उन्हें माखन चोर कहना योगेश्वर का अपमान है। इस अवसर ठाकुरलाल आर्य, राजवीर आर्य, शिवसिंह आर्य, कवि रूपचंद, मा.हरी सिंह, आचार्य बलवीरसिंह शास्त्री, वीरेन्द्र सिंह आर्य, चंद्रभान आर्य, करण सिंह आर्य, चरण पहलवान, महाशय श्रीचन्द, कर्ण सिंह एडवोकेट, जगन फौजी, शिवकुमार आर्य, जगवीर सिंह आर्य, बलदेव डाक्टर, सोहनलाल चौहान, अजय सिंह चौहान आदि मौजूद रहे।
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अमर उजाला ब्यूरो
पलवल। आर्य समाज औरंगाबाद मितरौल के तत्वावधान में सोमवार को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में वैदिक सत्संग व यज्ञानुष्ठान किया गया। यज्ञ में गजेंद्र सिंह चौहान ने यजमान की भूमिका निभाई। राजदेव नैष्ठिक व दयालुमुनी ने यज्ञ संपन्न कराया। इस अवसर पर महात्मा श्रद्धानंद सरस्वती ने कहा कि योगेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र का सम्पूर्ण जीवन निष्कलंक रहा। उन्होंने हमेशा गौ संवर्धन, धर्मरक्षा और सज्जनों की रक्षा के लिए कार्य किया। उन्होंने अपने गरीब मित्र सुदामा के साथ मित्रधर्म का परिपालन किया।
श्रद्धानंद ने कहा कि आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने श्रीकृष्ण के बारे में कहा है कि उनका जीवन आप्त पुरुषों के सदृश था उन्होंने अपने जीवन में कोई पाप नहीं किया। योगेश्वर श्रीकृष्ण दोनों समय संध्या और हवन किया करते थे, वे ईश्वर के उपासक थे। उन्होंने अर्जुन को आत्मा की अमरता का उपदेश किया। महात्मा श्रद्धानन्द ने कहा श्रीकृष्ण ईश्वर के अवतार नहीं थे। वेद में ईश्वर को अकायम बताया गया है तो ईश्वर के अवतार लेने की अवधारणा वैसे भी निराधर सिद्ध होती है। श्रीकृष्ण के जीवन का लक्ष्य था सज्जनों की रक्षा, दुष्टों का नाश और धर्म की रक्षा करना था।
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उन्होंने मनुष्यमात्र के लिए एक संदेश दिया यज्ञ करना चाहिए, दान देना चाहिए और तप करना चाहिए। यज्ञ, दान और तप करने से अंतकरण पवित्र होता है। वे जुआ और मद्यपान के खोर विरोधी थे। उन्हें माखन चोर कहना योगेश्वर का अपमान है। इस अवसर ठाकुरलाल आर्य, राजवीर आर्य, शिवसिंह आर्य, कवि रूपचंद, मा.हरी सिंह, आचार्य बलवीरसिंह शास्त्री, वीरेन्द्र सिंह आर्य, चंद्रभान आर्य, करण सिंह आर्य, चरण पहलवान, महाशय श्रीचन्द, कर्ण सिंह एडवोकेट, जगन फौजी, शिवकुमार आर्य, जगवीर सिंह आर्य, बलदेव डाक्टर, सोहनलाल चौहान, अजय सिंह चौहान आदि मौजूद रहे।
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