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मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां चढ़ाते हैं मिट्टी के घोड़े
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नवरात्र पर फूलों से सजा मां भद्रकाली का दरबार। संवाद
- फोटो : Kurukshetra
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। हरियाणा का एकमात्र शक्तिपीठ श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर धर्मनगरी कुरुक्षेत्र के झांसा रोड पर स्थित है। इस ऐतिहासिक शक्तिपीठ में मां भद्रकाली शक्ति रूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। इतना ही नहीं मन्नत पूरी होने पर यहां सोने-चांदी व मिट्टी के घोड़े चढ़ाए जाते हैं।
श्री देवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ का इतिहास दक्ष कुमारी सती से जुड़ा हुआ है। शिव पुराण में इसका वर्णन मिलता है कि एक बार सती के पिता दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया। इस अवसर पर सती व उसके पति शिव के अतिरिक्त सभी देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों को बुलाया गया, जब सती को इस बात का पता चला तो वह अनुचरों के साथ पिता के घर पहुंचीं। वहां भी दक्ष ने उनका किसी प्रकार से आदर नहीं किया और क्रोध में आ कर शिव की निंदा करने लगे।
सती अपने पति का अपमान सहन न कर पाई और स्वयं को हवन कुंड में होम कर डाला। भगवान शिव जब सती की मृत देह को लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे तो भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 52 हिस्सों में बांट दिया, जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां-वहां पर शक्ति पीठ स्थापित हुए। कुरुक्षेत्र में सती का दायां गुल्फ अर्थात घुटने से नीचे का भाग गिरा और यहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई। यहां मां भद्रकाली की सुंदर प्रतिमा शांत मुद्रा में विराजमान है।
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युद्ध जीतने के बाद पांडवों ने यहां चढ़ाए थे घोड़े : सतपाल शर्मा
मंदिर के पीठाध्यक्ष सतपाल शर्मा ने बताया कि महाभारत के युद्ध से पूर्व अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से मां भद्रकाली की पूजा की और कहा था कि महादेवी मैंने सच्चे मन से पूजा की है। आपकी कृपा से मेरी विजय हो और युद्ध के बाद मैं यहां पर घोड़े चढ़ाने आऊंगा। शक्तिपीठ की सेवा के लिए श्रेष्ठ घोड़े अर्पित करूंगा। श्रीकृष्ण व पांडवों ने युद्ध जीतने पर ऐसा किया था, तभी से मान्यता पूर्ण होने पर यहां श्रद्धालु सोने, चांदी व मिट्टी के घोड़े चढ़ाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के हुए थे मुंडन संस्कार
पुराणों में कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण व बलराम का मुंडन संस्कार यहां पर हुए था। रक्षाबंधन के दिन श्रद्धालु अपनी रक्षा का भार माता को सौंप कर रक्षा सूत्र बांधते हैं। मान्यता है कि इससे उसकी सुरक्षा होती है। महाशक्ति पीठ में विशेष उत्सव के रूप में चैत्र व अश्विन के नवरात्र बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं।
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कुरुक्षेत्र। हरियाणा का एकमात्र शक्तिपीठ श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर धर्मनगरी कुरुक्षेत्र के झांसा रोड पर स्थित है। इस ऐतिहासिक शक्तिपीठ में मां भद्रकाली शक्ति रूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। इतना ही नहीं मन्नत पूरी होने पर यहां सोने-चांदी व मिट्टी के घोड़े चढ़ाए जाते हैं।
श्री देवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ का इतिहास दक्ष कुमारी सती से जुड़ा हुआ है। शिव पुराण में इसका वर्णन मिलता है कि एक बार सती के पिता दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया। इस अवसर पर सती व उसके पति शिव के अतिरिक्त सभी देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों को बुलाया गया, जब सती को इस बात का पता चला तो वह अनुचरों के साथ पिता के घर पहुंचीं। वहां भी दक्ष ने उनका किसी प्रकार से आदर नहीं किया और क्रोध में आ कर शिव की निंदा करने लगे।
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सती अपने पति का अपमान सहन न कर पाई और स्वयं को हवन कुंड में होम कर डाला। भगवान शिव जब सती की मृत देह को लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे तो भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 52 हिस्सों में बांट दिया, जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां-वहां पर शक्ति पीठ स्थापित हुए। कुरुक्षेत्र में सती का दायां गुल्फ अर्थात घुटने से नीचे का भाग गिरा और यहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई। यहां मां भद्रकाली की सुंदर प्रतिमा शांत मुद्रा में विराजमान है।
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युद्ध जीतने के बाद पांडवों ने यहां चढ़ाए थे घोड़े : सतपाल शर्मा
मंदिर के पीठाध्यक्ष सतपाल शर्मा ने बताया कि महाभारत के युद्ध से पूर्व अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से मां भद्रकाली की पूजा की और कहा था कि महादेवी मैंने सच्चे मन से पूजा की है। आपकी कृपा से मेरी विजय हो और युद्ध के बाद मैं यहां पर घोड़े चढ़ाने आऊंगा। शक्तिपीठ की सेवा के लिए श्रेष्ठ घोड़े अर्पित करूंगा। श्रीकृष्ण व पांडवों ने युद्ध जीतने पर ऐसा किया था, तभी से मान्यता पूर्ण होने पर यहां श्रद्धालु सोने, चांदी व मिट्टी के घोड़े चढ़ाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के हुए थे मुंडन संस्कार
पुराणों में कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण व बलराम का मुंडन संस्कार यहां पर हुए था। रक्षाबंधन के दिन श्रद्धालु अपनी रक्षा का भार माता को सौंप कर रक्षा सूत्र बांधते हैं। मान्यता है कि इससे उसकी सुरक्षा होती है। महाशक्ति पीठ में विशेष उत्सव के रूप में चैत्र व अश्विन के नवरात्र बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं।