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रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, जीवन जीने की कला सिखाता है : मधुरेश दास
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03जेएनडी08: रामायण पाठ करते हुए श्रद्धालुगण। स्रोत: आयोजक
सफीदों। गुरुद्वारा गली स्थित श्री शिव शक्ति कृपा मंदिर में वेदाचार्य दंडी स्वामी डॉ. निगमबोध तीर्थ महाराज के परम सानिध्य में चल रहे सामूहिक संगीतमय श्री रामायण पाठ महोत्सव में श्रद्धालु भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों का श्रवण कर भावविभोर हो रहे हैं। अयोध्या से पहुंचें कथा व्यास मधुरेश दास महाराज ने संगीतमय शैली में रामायण के प्रसंग सुनाते हुए धर्म, कर्तव्य, त्याग और पारिवारिक संस्कारों का संदेश दिया।
कथा के दौरान उन्होंने राजा दशरथ के निधन और भरत के ननिहाल से अयोध्या लौटने का मार्मिक प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि श्रीराम के वनवास जाने के बाद राजा दशरथ पुत्र-वियोग में अत्यंत व्यथित हो गए और राम का नाम लेते हुए उन्होंने प्राण त्याग दिए। उनके निधन से पूरी अयोध्या नगरी शोक में डूब गई।
उन्होंने बताया कि उस समय भरत और शत्रुघ्न ननिहाल में थे। अयोध्या लौटने पर भरत ने नगर का बदला माहौल देखा तो उन्हें अनहोनी की आशंका हुई। पिता के निधन और श्रीराम के वनवास की जानकारी मिलने पर वे दुखी हुए। भरत ने माता कैकेयी के निर्णय पर दुख जताते हुए राजपाट को अपना अधिकार नहीं माना और श्रीराम के प्रति निष्काम प्रेम का परिचय दिया।
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मधुरेश दास महाराज ने कहा कि रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला ग्रंथ है। इसमें माता-पिता के सम्मान, भाईचारे, त्याग, सत्य, वचन पालन और कर्तव्यनिष्ठा जैसे जीवन मूल्यों का संदेश मिलता है। भगवान श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा के लिए राजसुख त्यागकर वनवास स्वीकार किया जबकि भरत ने भाई के प्रति प्रेम और त्याग की मिसाल कायम की।
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कथा के दौरान उन्होंने राजा दशरथ के निधन और भरत के ननिहाल से अयोध्या लौटने का मार्मिक प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि श्रीराम के वनवास जाने के बाद राजा दशरथ पुत्र-वियोग में अत्यंत व्यथित हो गए और राम का नाम लेते हुए उन्होंने प्राण त्याग दिए। उनके निधन से पूरी अयोध्या नगरी शोक में डूब गई।
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उन्होंने बताया कि उस समय भरत और शत्रुघ्न ननिहाल में थे। अयोध्या लौटने पर भरत ने नगर का बदला माहौल देखा तो उन्हें अनहोनी की आशंका हुई। पिता के निधन और श्रीराम के वनवास की जानकारी मिलने पर वे दुखी हुए। भरत ने माता कैकेयी के निर्णय पर दुख जताते हुए राजपाट को अपना अधिकार नहीं माना और श्रीराम के प्रति निष्काम प्रेम का परिचय दिया।
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मधुरेश दास महाराज ने कहा कि रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला ग्रंथ है। इसमें माता-पिता के सम्मान, भाईचारे, त्याग, सत्य, वचन पालन और कर्तव्यनिष्ठा जैसे जीवन मूल्यों का संदेश मिलता है। भगवान श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा के लिए राजसुख त्यागकर वनवास स्वीकार किया जबकि भरत ने भाई के प्रति प्रेम और त्याग की मिसाल कायम की।