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Jind News: देवरड़ गांव का महाभारत कालीन श्याम मंदिर है आस्था का केंद्र
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01जेएनडी08: मंदिर का फोटो। संवाद
कर्मवीर
जुलाना। देवरड़ गांव स्थित श्याम मंदिर आस्था का केंद्र बना हुआ है। लोगों की आस्था इतनी ज्यादा है कि फाल्गुन मास की द्वादशी को लगने वाले मेले में लोगों की भारी भीड़ जुटती है। गांव में महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के कुल गुरु द्रोणाचार्य ने तपस्या की थी। उन्हीं के नाम से गांव का प्रारंभिक नाम द्रोणागढ़ पड़ा था।
इसके बाद गांव का नाम देवरड़ कर दिया गया। गांव लगभग 700 साल पहले बसाया गया था। गांव बसने से पहले ही मंदिर बना हुआ था। मंदिर के पास एक तालाब बना हुआ था जो आज भी मौजूद है। समय के बदलाव के चलते तालाब की जगह कुंड बना दिया गया। कुंड के पानी को गंगा जल के समान महत्व दिया जाता है।
मंदिर में मौजूद चित्रकारी और नक्कासी महाभारत कालीन राजा परीक्षित के समय की चित्रकारी से मिलती जुलती है। चित्रकारी का रंग वर्तमान समय में भी नया व ताजा दिखता है। मंदिर में कुछ लिखावट थी, उस लिपि को पढ़ा नहीं गया। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए मंदिर को 25 साल पहले जीर्णोद्धार करके नया रूप दे दिया गया है।
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मंदिर की वर्तमान वास्तुकला देखने में अद्भुत है और मंदिर स्थित हरे भरे पार्क और फूल मंदिर की शोभा को चार चांद लगाते हैं। मंदिर में हर द्वादशी को भंडारे का आयोजन किया जाता है। हर वर्ष जेष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी को जागरण का आयोजन किया जाता है। इसमें सैंकड़ों गांवों के श्रद्धालु बाबा की महिमा का गुणगान सुनते हैं। ऐसी मान्यता है कि मंदिर में आकर जो भी मन्नत मांगी जाती हैं वह जरूर पूरी होती हैं।
बाक्स
बैरागी समाज के पूर्वज करते थे मंदिर की देखभाल
गांव जब से बसा तभी से बैरागी समाज के पूर्वज मंदिर की देखभाल करते थे। वर्तमान समय में मंदिर की देखरेख कमेटी के सदस्यों द्वारा की जाती है। मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का भी हर समय प्रबंध रहता है। दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की धर्मशाला में ठहरने की विशेष सुविधा कमेटी द्वारा की गई है। मंदिर में सैकड़ों श्रद्धालु मन्नतें मांगने आते हैं।
-मास्टर राममेहर, प्रधान, मंदिर कमेटी।
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जुलाना। देवरड़ गांव स्थित श्याम मंदिर आस्था का केंद्र बना हुआ है। लोगों की आस्था इतनी ज्यादा है कि फाल्गुन मास की द्वादशी को लगने वाले मेले में लोगों की भारी भीड़ जुटती है। गांव में महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के कुल गुरु द्रोणाचार्य ने तपस्या की थी। उन्हीं के नाम से गांव का प्रारंभिक नाम द्रोणागढ़ पड़ा था।
इसके बाद गांव का नाम देवरड़ कर दिया गया। गांव लगभग 700 साल पहले बसाया गया था। गांव बसने से पहले ही मंदिर बना हुआ था। मंदिर के पास एक तालाब बना हुआ था जो आज भी मौजूद है। समय के बदलाव के चलते तालाब की जगह कुंड बना दिया गया। कुंड के पानी को गंगा जल के समान महत्व दिया जाता है।
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मंदिर में मौजूद चित्रकारी और नक्कासी महाभारत कालीन राजा परीक्षित के समय की चित्रकारी से मिलती जुलती है। चित्रकारी का रंग वर्तमान समय में भी नया व ताजा दिखता है। मंदिर में कुछ लिखावट थी, उस लिपि को पढ़ा नहीं गया। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए मंदिर को 25 साल पहले जीर्णोद्धार करके नया रूप दे दिया गया है।
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मंदिर की वर्तमान वास्तुकला देखने में अद्भुत है और मंदिर स्थित हरे भरे पार्क और फूल मंदिर की शोभा को चार चांद लगाते हैं। मंदिर में हर द्वादशी को भंडारे का आयोजन किया जाता है। हर वर्ष जेष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी को जागरण का आयोजन किया जाता है। इसमें सैंकड़ों गांवों के श्रद्धालु बाबा की महिमा का गुणगान सुनते हैं। ऐसी मान्यता है कि मंदिर में आकर जो भी मन्नत मांगी जाती हैं वह जरूर पूरी होती हैं।
बाक्स
बैरागी समाज के पूर्वज करते थे मंदिर की देखभाल
गांव जब से बसा तभी से बैरागी समाज के पूर्वज मंदिर की देखभाल करते थे। वर्तमान समय में मंदिर की देखरेख कमेटी के सदस्यों द्वारा की जाती है। मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का भी हर समय प्रबंध रहता है। दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की धर्मशाला में ठहरने की विशेष सुविधा कमेटी द्वारा की गई है। मंदिर में सैकड़ों श्रद्धालु मन्नतें मांगने आते हैं।
-मास्टर राममेहर, प्रधान, मंदिर कमेटी।

01जेएनडी08: मंदिर का फोटो। संवाद