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कामचोरी की समस्या पर तीखा प्रहार
ब्यूरो/अमर उजाला,रोहतक
Updated Thu, 31 Mar 2016 01:29 AM IST
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दीवान बाल कृष्ण रंगशाला में नाटक मंचन करते कलाकार
- फोटो : file photo
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दीवान बाल कृष्ण रंगशाला में मंगलवार रात को मुंशी प्रेमचंद कहानी कफन पर आधारित नाटक का मंचन किया गया। नाटक के माध्यम से समाज में कामचोरी और इसके कारण गरीबी का उल्लेख किया गया। चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय के वीसी सेवानिवृत मेजर जनरल डॉ. रणजीत सिंह कार्यक्रम के मुख्यातिथि रहे। रमेश कुमार सिवाहा द्वारा निर्देशित नाटक ने इस समस्या पर करारा प्रहार किया।
नाटक मनुष्य की स्थिति में गिरावट पर व्यंग करता है। नाटक की पात्र बुधिया प्रसव पीड़ा सक करहा रही थी और उसका पति और ससुर शराब का मजा लेते रहे। यहां तक कि बुधिया प्रसव पीड़ा से मर गई, लेकिन उसका पति घीसू और ससुर माधव नशे में चूर रहे। कामचोरी के कारण उनके पास बुधिया को देने के लिए कफन तक के पैसे नहीं थे।
लोगों ने उन्हें कफन के लिए पैसे भी दिए, लेकिन इस पैसे को भी उन्होंने शराब और ऐश में उड़ा दिया। इस मौके पर जिला रैड क्रॉस सचिव रणदीप श्योकंद, हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति के सचिव सोहन दास, सुभाष ढिगाणा, राजेश वशिष्ठ, सुनीता मलिक, डॉ. विवेक सिंगला, मंगत राम शास्त्राी, नरेन्द्र अत्री मौजूद रहे।
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नाटक एक गांव में काम करने वाले एक मजदूर पिता घीसू और उसके बेटे माघव के आस पास घूमती है। वे चुपचाप बैठे हुए है और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव पीड़ा से चिल्ला रही होती है। घीसू और माघव लाचारी से उसे देखते रहते है। वे कहते हैं,' दाई को भी नहीं बुला सकते। 60 रुपये लेगी और दवा दारु के लिए भी पैसे नहीं हैं ऐसे में जब दोनों गांव में किसी के मरने पर हो रहे भोज का पता चलता है तो वे बुधिया को भूल कर अपने खाने पर ही ध्यान देते हैं। जब उन्हें गांव में ही कोई काम मिलता है तो वे अधिक मेहनत का काम कहकर उसे छोड़ देते हैं। इससे लोग उन्हें काम देना भी बंद कर देते हैं।
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नाटक मनुष्य की स्थिति में गिरावट पर व्यंग करता है। नाटक की पात्र बुधिया प्रसव पीड़ा सक करहा रही थी और उसका पति और ससुर शराब का मजा लेते रहे। यहां तक कि बुधिया प्रसव पीड़ा से मर गई, लेकिन उसका पति घीसू और ससुर माधव नशे में चूर रहे। कामचोरी के कारण उनके पास बुधिया को देने के लिए कफन तक के पैसे नहीं थे।
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लोगों ने उन्हें कफन के लिए पैसे भी दिए, लेकिन इस पैसे को भी उन्होंने शराब और ऐश में उड़ा दिया। इस मौके पर जिला रैड क्रॉस सचिव रणदीप श्योकंद, हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति के सचिव सोहन दास, सुभाष ढिगाणा, राजेश वशिष्ठ, सुनीता मलिक, डॉ. विवेक सिंगला, मंगत राम शास्त्राी, नरेन्द्र अत्री मौजूद रहे।
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नाटक एक गांव में काम करने वाले एक मजदूर पिता घीसू और उसके बेटे माघव के आस पास घूमती है। वे चुपचाप बैठे हुए है और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव पीड़ा से चिल्ला रही होती है। घीसू और माघव लाचारी से उसे देखते रहते है। वे कहते हैं,' दाई को भी नहीं बुला सकते। 60 रुपये लेगी और दवा दारु के लिए भी पैसे नहीं हैं ऐसे में जब दोनों गांव में किसी के मरने पर हो रहे भोज का पता चलता है तो वे बुधिया को भूल कर अपने खाने पर ही ध्यान देते हैं। जब उन्हें गांव में ही कोई काम मिलता है तो वे अधिक मेहनत का काम कहकर उसे छोड़ देते हैं। इससे लोग उन्हें काम देना भी बंद कर देते हैं।