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लंपी वायरस चर्म रोग नहीं खतरनाक, अफवाहों पर ध्यान नहीं देकर बरतें सावधानी
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डॉ. बलवंत। संवाद।
- फोटो : Jind
जींद। प्रदेशभर में आजकल पशुओं में आ रही लंपी वायरस चर्म रोग को लेकर पशुपालक चिंतित नजर आ रहे हैं। जितना अधिक इस बीमारी का प्रचार किया जा रहा है, उतनी खतरनाक यह बीमारी नहीं है। लंपी वायरस से अधिक खतरनाक तो मुंह-खुर की बीमारी है, जो पशु को बिल्कुल बेजान कर देती है। यदि पशुपालक जरा सी सावधानी बरतें तो लंपी वायरस से आसानी से निपटा जा सकता है।
पशुपालन विभाग वरिष्ठ सर्जन डॉ. बलवंत ने बताया कि जिस प्रकार कोरोना वायरस ने लापरवाही बरतने वाले लोगों की जान ले ली, उसी प्रकार लंपी वायरस भी कुछ ऐसा ही है। कोरोना संक्रमण के दौरान भय के कारण अधिक लोगों की जान गई। लंपी वायरस के कारण पशु को केवल बुखार हो सकता है। इसके अलावा उसके शरीर पर फफोले हो सकते हैं। यदि कोई फफोला फूट जाए तो उसपर पट्टी करके उपचार किया जा सकता है। जब तक पशु के शरीर पर कोई फफोला नहीं फूटता है तो उसे केवल बुखार की दवाई देकर ही काम चलाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात पशुओं पर मच्छरदानी का प्रयोग करना जरूरी है। यदि पशु को चिचड़ लगे हैं, तो उनका उपचार करना जरूरी है। लंपी वायरस डांस मक्खी तथा चिचड़ों से फैलता है। जब चिचड़ एक संक्रमित पशु को काटते हैं तो यह वायरस चिचड़ में चला जाता है। जब यह चिचड़ किसी दूसरे पशु को काटता है तो यह वायरस दूसरे पशु में भी पहुंच जाता है। इसी प्रकार डांस मक्खी के कारण भी इसी प्रकार यह वायरस दूसरे पशुओं में फैलता है। यदि चिचड़ों व डांस मक्खी से पशु को बचाया जा सके तो फिर यह वायरस नहीं फैल सकता।
पशु के खून में एविल मिलाकर लगवाएं इंजेक्शन
यदि कोई पशु लंपी वायरस से संक्रमित है तो उसके शरीर से 15 एमएम खून निकाल लें। फिर इस खून में पांच एमएल एविल मिलाकर वापस पशु को लगा दें। इस बीमारी से बचाव का इससे अधिक कोई बढिय़ा उपचार नहीं है। इस बीमारी का सर्कल 15 से 20 दिन का है। बहुत से पशुओं में से यह वायरस गुजर भी जाएगा, लेकिन पता नहीं चलेगा। जितना अधिक पशुपालक चिंतित होगा, उतना ही पशु को नुकसान होगा, क्योंकि चिंता के कारण वह अपने पशुओं को तरह-तरह की दवाई देगा, जो उसके शरीर के लिए नुकसानदायक होगी।
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एंटीबायोटिक दवाई भी नुकसानदायक
यदि पशु को एंटीबायोटिक दवाइयां या इंजेक्शन लगाए जाएंगे तो यह पशु के लिए काफी नुकसानदायक साबित होगी। एंटीबायोटिक दवाइयां पशु के शरीर में बनने वाले बेक्टीरिया को प्रभावित करती हैं। पशु के पेट में भोजन पचाने के लिए बेक्टीरिया बहुत जरूरी है। एंटीबाइटिक दवाइयां बेक्टीरिया को खत्म करेंगी, जिससे पशु आहार को पूरी तरह से पचा नहीं पाएगा और धीरे-धीरे वह खाना छोड़ सकता है। इसलिए यदि पशु बीमारी हो जाए तो उसे केवल पशु चिकित्सक को ही दिखाएं। गांव-गांव घूमने वाले देसी वैद्य या छोलाछाप डॉक्टर से बचना चाहिए।
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पशुपालन विभाग वरिष्ठ सर्जन डॉ. बलवंत ने बताया कि जिस प्रकार कोरोना वायरस ने लापरवाही बरतने वाले लोगों की जान ले ली, उसी प्रकार लंपी वायरस भी कुछ ऐसा ही है। कोरोना संक्रमण के दौरान भय के कारण अधिक लोगों की जान गई। लंपी वायरस के कारण पशु को केवल बुखार हो सकता है। इसके अलावा उसके शरीर पर फफोले हो सकते हैं। यदि कोई फफोला फूट जाए तो उसपर पट्टी करके उपचार किया जा सकता है। जब तक पशु के शरीर पर कोई फफोला नहीं फूटता है तो उसे केवल बुखार की दवाई देकर ही काम चलाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात पशुओं पर मच्छरदानी का प्रयोग करना जरूरी है। यदि पशु को चिचड़ लगे हैं, तो उनका उपचार करना जरूरी है। लंपी वायरस डांस मक्खी तथा चिचड़ों से फैलता है। जब चिचड़ एक संक्रमित पशु को काटते हैं तो यह वायरस चिचड़ में चला जाता है। जब यह चिचड़ किसी दूसरे पशु को काटता है तो यह वायरस दूसरे पशु में भी पहुंच जाता है। इसी प्रकार डांस मक्खी के कारण भी इसी प्रकार यह वायरस दूसरे पशुओं में फैलता है। यदि चिचड़ों व डांस मक्खी से पशु को बचाया जा सके तो फिर यह वायरस नहीं फैल सकता।
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पशु के खून में एविल मिलाकर लगवाएं इंजेक्शन
यदि कोई पशु लंपी वायरस से संक्रमित है तो उसके शरीर से 15 एमएम खून निकाल लें। फिर इस खून में पांच एमएल एविल मिलाकर वापस पशु को लगा दें। इस बीमारी से बचाव का इससे अधिक कोई बढिय़ा उपचार नहीं है। इस बीमारी का सर्कल 15 से 20 दिन का है। बहुत से पशुओं में से यह वायरस गुजर भी जाएगा, लेकिन पता नहीं चलेगा। जितना अधिक पशुपालक चिंतित होगा, उतना ही पशु को नुकसान होगा, क्योंकि चिंता के कारण वह अपने पशुओं को तरह-तरह की दवाई देगा, जो उसके शरीर के लिए नुकसानदायक होगी।
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एंटीबायोटिक दवाई भी नुकसानदायक
यदि पशु को एंटीबायोटिक दवाइयां या इंजेक्शन लगाए जाएंगे तो यह पशु के लिए काफी नुकसानदायक साबित होगी। एंटीबायोटिक दवाइयां पशु के शरीर में बनने वाले बेक्टीरिया को प्रभावित करती हैं। पशु के पेट में भोजन पचाने के लिए बेक्टीरिया बहुत जरूरी है। एंटीबाइटिक दवाइयां बेक्टीरिया को खत्म करेंगी, जिससे पशु आहार को पूरी तरह से पचा नहीं पाएगा और धीरे-धीरे वह खाना छोड़ सकता है। इसलिए यदि पशु बीमारी हो जाए तो उसे केवल पशु चिकित्सक को ही दिखाएं। गांव-गांव घूमने वाले देसी वैद्य या छोलाछाप डॉक्टर से बचना चाहिए।