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बलवंत बार सुकेयर तकनीक से बिना चीर-फाड़ आसानी से जुड़ पाएगी पशुओं की हड्डी
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पशुओं की टूटी हड्डियों का इलाज करते डॉ. बलवंत सिंह। संवाद
- फोटो : Jind
जींद। पशु शल्य चिकित्सक डॉ. बलवंत सिंह ने अपने नाम से बार सुकेयर तकनीक को इजाद किया है। इस तकनीक से पशुओं की हड्डियां टूटने के बाद बिना चीर-फाड़ के दोबारा जोड़ा जा रहा है। इस नई तकनीक की मदद से हड्डी टूटने के बाद संक्रमण फैलने से होने वाली पशुओं की मौत पर भी अंकुश लगा है। डॉ. बलवंत सिंह अब तक नई तकनीक से 400 पशुओं की टूटी हड्डियों को जोड़ चुके हैं।
डॉ. बलवंत ने कहा कि पहले पशु की हड्डी टूटने पर इसे जोड़ने के लिए रॉड व पीन इत्यादि उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता था। इनके प्रयोग से पशु को संक्रमण होने का खतरा बना रहता था और पशु के ठीक होने के आसार भी कम ही रहते थे। इलाज के तुरंत बाद पशु खड़ा हो जाता है, जिससे रॉड व पीन वजन नहीं झेल पाती और पशु की हड्डी जुड़ नहीं पाती थी। अब नई तकनीक से पशुओं की हड्डियों को जोड़ा जाता है। इसमें बीबीएस (स्टील की रॉड) को स्केयर के रूप में इस्तेमाल करके टूटी हड्डी के चारों तरफ बांध दिया जाता है। इसमें यदि पशु के पैर में सूजन आ जाती है तो उसको हल्का बांधा जाता है। इसके बाद जब हड्डी जुड़ जाती है तो उसे खोल दिया जाता है। यह तकनीक बहुत ही कारगर साबित हो रही है।
डॉ. बलवंत ने बताया कि इस नवीनतम तकनीक पर हिसार के लाला लाजपत राय विश्वविद्यालय में रिसर्च करने पर भी विचार किया जा रहा है। इस तकनीक का इस्तेमाल चूहे से लेकर भारी भरकम हाथी तक के इलाज में किया जा सकता है। अब तक गाय, भैंस, मोर व अन्य पशु-पक्षियों के इलाज में इस तकनीक का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा चुका है। अब तक 400 पशु-पक्षियों का इलाज किया जा चुका है। 25 दिन में इस तकनीक के माध्यम से पशुओं की टूटी हड्डियां जुड़ जाती हैं।
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जींद पॉलीक्लीनिक के इंचार्ज हैं डॉ. बलवंत सिंह
डॉ. बलवंत सिंह पशु शल्य चिकित्सक हैं। फिलहाल वह जींद के पॉलीक्लीनिक के इंचार्ज हैं। गांव राजपुरा भैण निवासी डॉ. बलवंत सिंह कई वर्षों से यहां पर सेवाएं दे रहे हैं। पॉलीक्लीनिक में फिलहाल चार वीएलडीए व पशु शल्य चिकित्सक हैं। इन सभी को भी इस तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। चिकित्सक गोशालाओं में जाकर गायों का इलाज बलवंत बार सुकेयर तकनीक से ही कर रहे हैं।
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डॉ. बलवंत ने कहा कि पहले पशु की हड्डी टूटने पर इसे जोड़ने के लिए रॉड व पीन इत्यादि उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता था। इनके प्रयोग से पशु को संक्रमण होने का खतरा बना रहता था और पशु के ठीक होने के आसार भी कम ही रहते थे। इलाज के तुरंत बाद पशु खड़ा हो जाता है, जिससे रॉड व पीन वजन नहीं झेल पाती और पशु की हड्डी जुड़ नहीं पाती थी। अब नई तकनीक से पशुओं की हड्डियों को जोड़ा जाता है। इसमें बीबीएस (स्टील की रॉड) को स्केयर के रूप में इस्तेमाल करके टूटी हड्डी के चारों तरफ बांध दिया जाता है। इसमें यदि पशु के पैर में सूजन आ जाती है तो उसको हल्का बांधा जाता है। इसके बाद जब हड्डी जुड़ जाती है तो उसे खोल दिया जाता है। यह तकनीक बहुत ही कारगर साबित हो रही है।
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डॉ. बलवंत ने बताया कि इस नवीनतम तकनीक पर हिसार के लाला लाजपत राय विश्वविद्यालय में रिसर्च करने पर भी विचार किया जा रहा है। इस तकनीक का इस्तेमाल चूहे से लेकर भारी भरकम हाथी तक के इलाज में किया जा सकता है। अब तक गाय, भैंस, मोर व अन्य पशु-पक्षियों के इलाज में इस तकनीक का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा चुका है। अब तक 400 पशु-पक्षियों का इलाज किया जा चुका है। 25 दिन में इस तकनीक के माध्यम से पशुओं की टूटी हड्डियां जुड़ जाती हैं।
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जींद पॉलीक्लीनिक के इंचार्ज हैं डॉ. बलवंत सिंह
डॉ. बलवंत सिंह पशु शल्य चिकित्सक हैं। फिलहाल वह जींद के पॉलीक्लीनिक के इंचार्ज हैं। गांव राजपुरा भैण निवासी डॉ. बलवंत सिंह कई वर्षों से यहां पर सेवाएं दे रहे हैं। पॉलीक्लीनिक में फिलहाल चार वीएलडीए व पशु शल्य चिकित्सक हैं। इन सभी को भी इस तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। चिकित्सक गोशालाओं में जाकर गायों का इलाज बलवंत बार सुकेयर तकनीक से ही कर रहे हैं।