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डेरे का सच: संपन्न डेरा प्रेमियों को नहीं छोड़ने दी जाती थी सेवादारी

Fri, 15 Sep 2017 01:00 AM IST
Updated Fri, 15 Sep 2017 01:00 AM IST
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डेरे का सच: संपन्न डेरा प्रेमियों को नहीं छोड़ने दी जाती थी सेवादारी
डेरे का सच: संपन्न डेरा प्रेमियों को नहीं छोड़ने दी जाती थी सेवादारी
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अमर उजाला ब्यूरो
चरखी दादरी।
सिरसा डेरे में अनुयायियों के साथ उनकी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर भेदभाव किया जाता था। जिन अनुयायियों के पास प्रॉपर्टी या पैसा होता था, उनकी सेवादारी छोड़ने की इच्छा जाहिर करने के बावजूद डेरा नहीं छोड़ने दिया जाता था। संपन्न अनुयायियों के एक साल तक डेरे से दूरी बनाए जाने पर भी उन्हें सेवादार के पद से मुक्त नहीं किया जाता था। आर्थिक रूप से कमजोर अनुयायी अगर एक माह लगातार डेरे नहीं पहुंचता था तो उसका सेवादारी से नाम काट दिया जाता था। इतना ही नहीं आर्थिक रूप से मजबूत अनुयायी को एक माह में 20 दिन डेरे में रुकना ही पड़ता था जबकि 10 दिन अपने परिवार और कारोबार संभालने के लिए उन्हें घर जाने की छूट मिलती थी। अमर उजाला से बातचीत में यह खुलासा चरखी दादरी के गांव बलकरा के डेरा अनुयायी सोमबीर के बेटे प्रदीप ने किया है। प्रदीप का कहना है कि उसका पिता लगातार एक साल सिरसा डेरे में नहीं गया था। इसके बावजूद सेवादार पद से उनका नाम नहीं काटा गया। यहां तक की उसके पिता ने डेरा प्रमुख और कमेटी से सेवादारी छोड़ने की इच्छा जाहिर की थी लेकिन डेरा प्रमुख ने सोमबीर की इस इच्छा को पूरा करने से इनकार कर दिया।
राम रहीम और डेरा कमेटी की जबरन वसूली से तंग अनुयायी और उनके परिजन अब सिरसा डेरे के राज खोलने लगे हैं। मृतक अनुयायी सोमबीर के बेटे प्रदीप का कहना है कि डेरा प्रमुख अपने अनुयायियों को डेरे में रुकने के लिए भी बाध्य करता था। दस दिन घर रुकने की निर्धारित समयावधि में दोबारा डेरे न लौटने पर फोन कर अनुयायियों को डेरे आने के लिए बाध्य किया जाता था। प्रदीप ने बताया कि वह और उसके चारों भाई-बहन भी डेरे से जुड़े थे। प्रदीप ने बताया कि उसने और उसके चार छोटे भाई-बहनों ने उच्चतर शिक्षा डेरे से ही प्राप्त की है। अमर उजाला से बातचीत में प्रदीप ने जबरन परमार्थ कराने के बाद अनुयायियों को जबरन डेरे में रोके जाने का राज भी उजागर किया। प्रदीप ने बताया कि डेरा प्रमुख की महीने में 20 दिन डेरे में रुकने की शर्तें केवल खास अनुयायियों पर ही लागू होती थी। बकौल प्रदीप, उसके पिता सोमबीर ने कई दफा डेरे से दूरी बनाने का प्रयास किया लेकिन हर बार उन्हें जबरन डेरे बुला लिया जाता था। अगर उसके पिता डेरे से आए फोन को नहीं उठाते तो कुछ दिन बाद ही डेरा प्रमुख के करीबी अनुयायी उनके घर आ धमकते थे। मृतक अनुयायी की पत्नी चित्रा देवी ने बताया कि अनुयायियों की कमाई का ब्यौरा भी डेरा कमेटी द्वारा मांगा जाता था और सालाना कमाई का कुछ भाग उनसे जबरन परमार्थ करवाया जाता था।
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एक साल बाद करवाया परमार्थ
मृतक अनुयायी के बेटे प्रदीप ने बताया कि उसके पिता ने 2015 में डेरे से दूरी बना ली थी। वे लगातार करीब एक साल तक वो डेरे नहीं गए। प्रदीप ने बताया कि इसी साल कुछ माह पहले ही उसके पिता को डेरे आने के लिए बाध्य किया गया था। प्रदीप ने बताया कि दो-तीन माह से उसका पिता दोबारा डेरा जाने लगा था और इस थोड़ी-सी समयावधि में ही उसके पिता से करीब दस लाख रुपये का परमार्थ करवाया गया।
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एसआईटी ने शुरू की जांच
परिजनों द्वारा सोमबीर की मौत का जिम्मेदार डेरा प्रमुख को ठहराने के बाद एसपी सुनील दलाल ने तीन दिन पूर्व ही एक तीन सदस्यीय एसआईटी गठित की थी। इसकी कमान डीएसपी हेड क्वार्टर सुरेश हुड्डा को सौंपी गई है। डीएसपी सुरेश हुड्डा ने बताया कि टीम ने जांच शुरू कर दी है। उन्होंने बताया कि पुलिस मृतक अनुयायी के जमीनी रिकॉर्ड व बैंक अकाउंट की जांच कर रही है और जो भी तथ्य सामने आएंगे उसी के अनुरूप कार्रवाई अमल में लायी जाएगी।
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