फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Hisar News ›   The color of cotton angry with the fields

Hisar News: खेतों से रूठी कपास की रंगत

Fri, 05 Jun 2026 12:55 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार Updated Fri, 05 Jun 2026 12:55 AM IST
विज्ञापन
The color of cotton angry with the fields
अग्रोहा में कपास की फसल।
हिसार। हरियाणा में किसानों की पसंदीदा नकदी फसल मानी जाने वाली कपास गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। लगातार आर्थिक नुकसान, गुलाबी सुंडी का बढ़ता प्रकोप और बारिश से होने वाली तबाही के कारण किसानों का कपास की खेती से भरोसा उठता जा रहा है।
विज्ञापन

हालत यह है कि वर्ष 2019-20 में प्रदेश में कपास का रकबा 8.01 लाख एकड़ था जो 2025-26 में घटकर केवल 2.84 लाख एकड़ रह गया है जो पिछले सात वर्षों की तुलना में 65 फीसदी कम है। पिछले तीन वर्षों में ही कपास बिजाई का क्षेत्रफल लगभग 50 फीसदी रह गया है।
विज्ञापन

कपास की खेती में लगातार आ रही गिरावट ने कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग की चिंता बढ़ा दी है। किसान अब कपास की जगह धान, बाजरा और अन्य फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। प्रदेश में कपास की बिजाई का सीजन पूरा हो चुका है और इस बार भी रकबा पिछले आठ वर्षों के सबसे निचले स्तर पर दर्ज किया गया है। कपास का दायरा बढ़ाने के लिए कृषि विभाग ने इस वर्ष कई प्रयास किए। विभाग ने प्रमोशन फॉर कॉटन कल्टीवेशन इन हरियाणा विंग का गठन कर सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, दादरी, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ जैसे प्रमुख कपास उत्पादक जिलों में जागरूकता अभियान चलाए।
विज्ञापन
विज्ञापन

किसानों को सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिए दो हजार रुपये प्रति एकड़ तथा देसी कपास की खेती पर चार हजार रुपये प्रति एकड़ की सहायता भी दी जा रही है। इसके बावजूद किसान कपास की ओर लौटने को तैयार नहीं हैं।
पिछले तीन-चार वर्षों से कपास की खेती में किसानों को लगातार नुकसान हो रहा है। खासकर अगस्त-सितंबर में होने वाली बारिश फसल को सबसे अधिक प्रभावित करती है। वर्ष 2025 में बाढ़ जैसे हालात के कारण कई जिलों में कपास की फसल बर्बाद हो गई थी। इसके अलावा गुलाबी सुंडी का प्रकोप भी बड़ी समस्या है। यही कारण है कि कपास का रकबा लगातार घट रहा है।

- डॉ. आत्मा राम गोदारा, संयुक्त निदेशक (कपास), कृषि विभाग, हरियाणा।

-------------

प्रदेश में पिछले सात वर्षों का कपास रकबा (लाख एकड़ में)

2019-20 — 801.04

2020-21 — 739.60

2021-22 — 635.60

2022-23 — 574.61

2023-24 — 577.68

2024-25 — 398.46

2025-26 — 284.00

----------------------

40 हजार की लागत, आमदनी केवल 24 हजार

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) के कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनय महला द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार कपास की खेती में किसानों की प्रति एकड़ औसत लागत 40,024 रुपये रही जबकि कपास बिक्री से 24,081 रुपये और उप-उत्पादों से 801 रुपये की आय हुई। इस प्रकार किसानों को प्रति एकड़ औसतन 15,142 रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। रिपोर्ट में खेत की तैयारी, सिंचाई, बीज, उर्वरक, दवा और तुड़ाई सहित सभी खर्च शामिल किए गए हैं।


----------------------

2017 के बाद से लगातार हो रहा नुकसान

कृषि अर्थशास्त्र विभाग के सहायक वैज्ञानिक डॉ. विनय महला के अनुसार वर्ष 2017 के बाद से कपास उत्पादक किसानों को लगातार नुकसान हो रहा है। कीटों और रोगों के बढ़ते प्रकोप ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। यदि कपास की नई और अधिक प्रतिरोधी किस्में विकसित नहीं हुईं तो अगले तीन से पांच वर्षों में प्रदेश में कपास उत्पादक किसानों की संख्या और घट सकती है। जिलावार आंकड़ों के अनुसार फतेहाबाद में प्रति एकड़ लागत सबसे अधिक 48,721 रुपये रही और किसानों को 17,315 रुपये प्रति एकड़ का नुकसान हुआ। वहीं हिसार के किसानों को सबसे अधिक औसतन 17,515 रुपये प्रति एकड़ का नुकसान दर्ज किया गया। इसके अलावा महेंद्रगढ़ में 14,144 रुपये, चरखी दादरी में 15,276 रुपये, भिवानी में 14,852 रुपये, सिरसा में 11,250 रुपये और रेवाड़ी में 9,548 रुपये प्रति एकड़ का औसत नुकसान हुआ।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed