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Hisar News: डाबड़ा में मियावाकी तकनीक से तैयार हुआ ऑक्सीजन वन, 7500 पौधों से विकसित हुआ वन क्षेत्र

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 18 Sep 2026 11:36 PM IST
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Oxygen forest made with Miyawaki technique in Dabra, forest area developed from 7,500 plants
गांव डाबड़ा में विकसित किया गया वनक्षेत्र 
हिसार। कंकरीट से ऊब चुके लोगों के लिए गांव डाबड़ा में मियावाकी तकनीक से करीब 7500 पौधे लगाकर ऑक्सीजन वन क्षेत्र विकसित किया गया है। आने वाले समय में यह क्षेत्र लोगों के स्वास्थ्य और प्रकृति से जुड़ाव का नया केंद्र बनेगा।
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हजारों पौधों के बीच कुछ समय बिताने पर प्रकृति का अद्भुत अंदाज महसूस किया जा सकेगा। इसे स्कूली बच्चों के भ्रमण, बुजुर्गों की सैर और पिकनिक स्थल के तौर पर विकसित किया जाएगा। वन क्षेत्र के बीच तालाब भी रहेगा।
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जिला परिषद की ओर से जिले में ऑक्सीजन वन क्षेत्र विकसित करने के लिए विशेष अभियान चलाया गया। जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र ने इसे मूर्त रूप देने में अहम भूमिका निभाई। शहर से सटे डाबड़ा गांव की पंचायत की खाली पड़ी जमीन का सदुपयोग करने की योजना बनाई गई। यहां मियावाकी तकनीक से औषधीय, छायादार और फलदार पौधे लगाए गए हैं।
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इनमें नीम, पीपल, इमली, आंवला और अर्जुन सहित अन्य औषधीय व फलदार पौधे शामिल हैं। जिला परिषद इनकी देखभाल करेगी। समय पर खाद-पानी देने के साथ निगरानी की व्यवस्था भी की जाएगी। दो से तीन साल में पौधे बड़े होकर पेड़ों का रूप लेने लगेंगे। इसके बाद यह क्षेत्र छोटे जंगल का स्वरूप लेगा।
इस क्षेत्र के पास बड़ा तालाब और नहर भी है, जिससे इसका प्राकृतिक सौंदर्य बढ़ गया है। हरियाली और तालाब के बीच यहां रमणीक स्थल विकसित होगा। पास में प्राचीन मंदिर भी है। इससे लोग यहां पर्यटन और धार्मिक गतिविधियों का आनंद एक साथ ले सकेंगे। संडे की पिकनिक के लिए भी यह स्थान बेहतर विकल्प बनेगा।
गांव लाड़वा में अर्जुन वाटिका
जिला परिषद की ओर से गांव लाड़वा में अर्जुन वाटिका तैयार की गई है, जिसमें करीब 500 पौधे लगाए गए हैं। गांव के लोग यहां शुद्ध हवा के साथ अर्जुन की छाल भी प्राप्त कर सकेंगे। अर्जुन की छाल का आयुर्वेद में विशेष महत्व है। इसे ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने के साथ कई अन्य बीमारियों में भी लाभदायक माना जाता है।
गांव डाबड़ा में विकसित किए जा रहे वन क्षेत्र का उद्घाटन जल्द ही कराएंगे। इसके लिए हमने प्रदेश के पीडब्ल्यूडी मंत्री रणबीर गंगवा से समय मांगा है। उनकी ओर से सहमति मिलने के बाद कार्यक्रम शेड्यूल किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट प्रकृति को समर्पित किया गया है। लोगों के लिए भ्रमण का नया स्थल मिल सकेगा।

- डाॅ. सुभाष चंद्र, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जिला परिषद।
क्या है मियावाकी तकनीक
मियावाकी पद्धति के प्रणेता जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी हैं। इस पद्धति से कम समय में जंगलों को घना बनाया जा सकता है। यह कार्यविधि 1970 के दशक में विकसित की गई थी। इसका मूल उद्देश्य भूमि के छोटे से हिस्से में हरित आवरण को सघन बनाना था। इसमें पेड़ स्वयं अपना विकास करते हैं और तीन वर्ष के भीतर पूरी लंबाई तक बढ़ सकते हैं। मियावाकी पद्धति में उपयोग किए जाने वाले पौधे ज्यादातर आत्मनिर्भर होते हैं और उन्हें खाद व पानी देने जैसे नियमित रखरखाव की आवश्यकता कम होती है। स्थानीय वृक्षों का घना हरित आवरण क्षेत्र के धूल कणों को अवशोषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साथ ही, पौधे सतह के तापमान को नियंत्रित करने में भी मदद करते हैं। इन वनों में उपयोग किए जाने वाले सामान्य स्थानीय पौधों में अंजन, आंवला, बेल, अर्जुन और गुंज शामिल हैं।
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