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चिंताजनक: 'जलवायु परिवर्तन से बढ़ा 0.6 डिग्री तक तापमान, 9 प्रतिशत तक घटी फसलों की पैदावार'
Fri, 17 Feb 2023 10:26 PM IST
भूपेंद्र सिंह
अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
Published by: भूपेंद्र सिंह
Updated Fri, 17 Feb 2023 10:26 PM IST
सार
एचएयू के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य अतिथि व नीति आयोग के सदस्य ने चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन न केवल कृषि क्षेत्र को बल्कि, हर घर के बजट को प्रभावित कर रहा है। देश की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है।
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आरके बहल को सम्मानित करते विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बी आर कंबोज एवं अन्य।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
हरियाणा के हिसार स्थित चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) में जलवायु परिवर्तन के दौर में कृषि से खाद्य सुरक्षा और स्थिरता विषय पर शुक्रवार को तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। बतौर मुख्य अतिथि व नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद ने कहा कि बीते 100 साल में देश के औसत तापमान में करीब 0.6 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी रिकॉर्ड की गई है।
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तापमान बढ़ने, बारिश के दिनों की संख्या में कमी व घटते जलस्तर के कारण धान-गेहूं फसल चक्र की पैदावार में 4.5 से 9 प्रतिशत तक की कमी आई है। जलवायु परिवर्तन से हो रहे दुष्प्रभावों से निपटने के लिए न केवल पॉलिसी प्लानर बल्कि कृषकों व आम जनता को भी सतर्क रहने की जरूरत है।
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उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन न केवल कृषि क्षेत्र को बल्कि, हर घर के बजट को प्रभावित कर रहा है। देश की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है और उनके लिए जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव चिंतनीय हो सकते हैं। क्योंकि जलवायु परिवर्तन व कृषि एक दूसरे से जुड़े हैं। जहां एक ओर जलवायु परिवर्तन कृषि को प्रभावित कर रहा है, वहीं कृषि की प्रणालियां भी जलवायु को प्रभावित कर रही हैं।
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कृषि क्षेत्र में उपयुक्त फसल, किस्म का चुनाव व कृषि पद्धतियों का सही इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन से निपटने में बेहतर भूमिका निभा सकता हैं। कृषि क्षेत्र में नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहायक हो सकता है जैसे धान की पराली का प्रबंधन, मोटे अनाज की खेती पर जागरूकता जरूरी है।
संगोष्ठी में मौजूद वैज्ञानिक एवं छात्र।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
छोटे किसानों और पशुओं के चारे के लिए बनाना होगा बैंक : डॉ. सुंदरदम
सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि व नेशनल एग्रीकल्चरल हायर एजुकेशन प्रोजेक्ट (एनएएचईपी) के राष्ट्रीय कोआर्डिनेटर डॉ. पी. रामासुंदरम ने कहा कि हरियाणा का पूरे भारत में खाद्यान उत्पादन में दूसरा स्थान है। प्रदेश में 1.93 लाख छोटे व मध्यम किसान जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित हुए हैं। छोटी जोत वाले किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए खाद्यान्न एवं पोषण की सुरक्षा व स्थिरता को बनाए रखना जरूरी है। कृषि आधारित प्रबंधन तकनीक जैसे जीरो टिलेज, धान की सीधी बिजाई, जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील किस्मों को अपनाने, फसल विविधिकरण, पोषक तत्व प्रबंधन, लेजर लेवलिंग और सूक्ष्म सिंचाई के उपाय अपनाने होंगे। गुणवत्तापूर्ण बीज की व्यवस्था व पशुधन के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए चारा बैंकों की स्थापना जरूरी है।
कम लागत में कृषि का उत्पादन बढ़ाना होगा : प्रो. कांबोज
विश्वविद्यालय के कुलपति व सम्मेलन के संरक्षक प्रो. बीआर कांबोज ने कहा कि देश में 54.6 प्रतिशत भूमि कृषि से जुड़ी है। देश के कुल जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 19.9 प्रतिशत है। देश में कृषि-खाद्यान से जुड़ी हुई योजनाओं के सामने कम लागत में कृषि का उत्पादन बढ़ाना व युवाओं को कृषि व्यवसाय की तरफ आकर्षित करने की चुनौती है।
जलवायु परिवर्तन किसानों व वैज्ञानिकों के लिए एक चिंता का विषय बन गया है। मौसम में आने वाले अप्रत्याशित बदलाव जैसे आंधी, तूफान, सूखा, बाढ़, असमय तापमान का बढ़ना कृषि उत्पादन में प्रभाव डालता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए बढ़ते तापमान व सूखा के अनुकूल किस्में, मिट्टी की नमी का संरक्षण, पानी की उपलब्धता, रोग रहित किस्में, फसल विविधिकरण, मौसम का भविष्य आकंलन, टिकाऊ फसल उत्पादन प्रबंधन को अपनाने की आवश्यकता है।
डॉ. आरके बहल को सम्मानित किया
इस सम्मेलन में डॉ. एसके पाहुजा ने आए हुए अतिथियों का स्वागत किया। मंच पर उपस्थित जर्मनी से प्रो. एंड्रयू बॉर्नर, कनाडा से प्रो. रविंद्र छिब्बर ने भी व्याख्यान दिए। सम्मेलन में प्रस्तुत होने वाले शोध पत्रों की पुस्तिका, अनुसंधान पुस्तिका व ‘कृषि महाविद्यालय-एक नजर में का भी विमोचन किया गया। कृषि महाविद्यालय के रिटायर्ड डीन डॉ. आरके बहल को विदेशी वैज्ञानिकों ने सम्मानित किया। स्नातकोत्तर अधिष्ठाता डॉ. केडी शर्मा ने उपस्थित अतिथिगणों का धन्यवाद जताया।
अचानक बदले मौसम पर जताई चिंता
मुख्य अतिथि प्रो. रमेश चंद्र ने शुक्रवार की सुबह हुई धुंध व बादलवाही का जिक्र करते हुए कहा कि फरवरी के दूसरे सप्ताह में ऐसा मौसम चिंता बढ़ाता है। हरियाणा-पंजाब के मैदानी इलाके में फरवरी में ऐसा बदलाव चेतावनी है। सुबह सड़क पर दृश्यता काफी कम थी। ऐसे बदलाव ही मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित कर रहे हैं।
सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि व नेशनल एग्रीकल्चरल हायर एजुकेशन प्रोजेक्ट (एनएएचईपी) के राष्ट्रीय कोआर्डिनेटर डॉ. पी. रामासुंदरम ने कहा कि हरियाणा का पूरे भारत में खाद्यान उत्पादन में दूसरा स्थान है। प्रदेश में 1.93 लाख छोटे व मध्यम किसान जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित हुए हैं। छोटी जोत वाले किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए खाद्यान्न एवं पोषण की सुरक्षा व स्थिरता को बनाए रखना जरूरी है। कृषि आधारित प्रबंधन तकनीक जैसे जीरो टिलेज, धान की सीधी बिजाई, जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील किस्मों को अपनाने, फसल विविधिकरण, पोषक तत्व प्रबंधन, लेजर लेवलिंग और सूक्ष्म सिंचाई के उपाय अपनाने होंगे। गुणवत्तापूर्ण बीज की व्यवस्था व पशुधन के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए चारा बैंकों की स्थापना जरूरी है।
कम लागत में कृषि का उत्पादन बढ़ाना होगा : प्रो. कांबोज
विश्वविद्यालय के कुलपति व सम्मेलन के संरक्षक प्रो. बीआर कांबोज ने कहा कि देश में 54.6 प्रतिशत भूमि कृषि से जुड़ी है। देश के कुल जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 19.9 प्रतिशत है। देश में कृषि-खाद्यान से जुड़ी हुई योजनाओं के सामने कम लागत में कृषि का उत्पादन बढ़ाना व युवाओं को कृषि व्यवसाय की तरफ आकर्षित करने की चुनौती है।
जलवायु परिवर्तन किसानों व वैज्ञानिकों के लिए एक चिंता का विषय बन गया है। मौसम में आने वाले अप्रत्याशित बदलाव जैसे आंधी, तूफान, सूखा, बाढ़, असमय तापमान का बढ़ना कृषि उत्पादन में प्रभाव डालता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए बढ़ते तापमान व सूखा के अनुकूल किस्में, मिट्टी की नमी का संरक्षण, पानी की उपलब्धता, रोग रहित किस्में, फसल विविधिकरण, मौसम का भविष्य आकंलन, टिकाऊ फसल उत्पादन प्रबंधन को अपनाने की आवश्यकता है।
डॉ. आरके बहल को सम्मानित किया
इस सम्मेलन में डॉ. एसके पाहुजा ने आए हुए अतिथियों का स्वागत किया। मंच पर उपस्थित जर्मनी से प्रो. एंड्रयू बॉर्नर, कनाडा से प्रो. रविंद्र छिब्बर ने भी व्याख्यान दिए। सम्मेलन में प्रस्तुत होने वाले शोध पत्रों की पुस्तिका, अनुसंधान पुस्तिका व ‘कृषि महाविद्यालय-एक नजर में का भी विमोचन किया गया। कृषि महाविद्यालय के रिटायर्ड डीन डॉ. आरके बहल को विदेशी वैज्ञानिकों ने सम्मानित किया। स्नातकोत्तर अधिष्ठाता डॉ. केडी शर्मा ने उपस्थित अतिथिगणों का धन्यवाद जताया।
अचानक बदले मौसम पर जताई चिंता
मुख्य अतिथि प्रो. रमेश चंद्र ने शुक्रवार की सुबह हुई धुंध व बादलवाही का जिक्र करते हुए कहा कि फरवरी के दूसरे सप्ताह में ऐसा मौसम चिंता बढ़ाता है। हरियाणा-पंजाब के मैदानी इलाके में फरवरी में ऐसा बदलाव चेतावनी है। सुबह सड़क पर दृश्यता काफी कम थी। ऐसे बदलाव ही मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित कर रहे हैं।