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जंग ए आजादी: 1930 में चरखा दंगल में 200 महिलाओं ने हिस्सा लेकर किया था स्वदेशी का शंखनाद, ये है पूरी कहानी
Sun, 14 Aug 2022 08:00 AM IST
भूपेंद्र सिंह
उदयभान त्रिपाठी, अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
उदयभान त्रिपाठी, अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
Published by: भूपेंद्र सिंह
Updated Sun, 14 Aug 2022 08:00 AM IST
सार
जंग ए आजादी में हिसार का योगदान भी रहा है। वर्ष 1930 में हिसार के कटला रामलीला मैदान में चरखा दंगल हुआ था। वर्ष 1921 में महिलाओं ने सिरसा में खादी की प्रदर्शनी लगाई थी। गोद में छह दिन की बेटी लेकर लक्ष्मीदेवी ने पति को जेल तक छोड़ा था।
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कटला रामलीला मैदान में आयोजित चरखा दंगल की फाइल फोटो
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
आजादी की लड़ाई में महिलाओं ने भी पुरुषों के बराबर सहयोग किया। वर्ष 1921 में भिवानी में गांधीजी की सभा में करीब पांच हजार महिलाओं ने हिस्सा लिया। वर्ष 1930 में हिसार के कटला रामलीला मैदान में चरखा दंगल में 200 महिलाओं ने हिस्सा लिया। व्यक्तिगत सत्याग्रही बलवंत राय तायल की पत्नी तो छह दिन की बेटी को गोद में उठाए पति का हौसला बढ़ाने जेल तक साथ गई थीं। प्रस्तुत है आजादी की लड़ाई में हिसार की महिलाओं की भूमिका को बताती शृंखला की छठी कड़ी....। (जैसा कि इतिहासकार डॉ. महेंद्र सिंह ने बताया)
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रानी से लेकर आम महिला तक की भागीदारी
कैथल की रानी महताब कौर ने 1857 की क्रांति में हिस्सा लिया था। राज्य व पद समाप्त होेने पर रानी ने प्यौदा गांव में सामान्य जीवन बिताया। बादली के मोर्चे पर अंग्रेजी सेना से लड़ी एक अज्ञात महिला के विषय में अंबाला के डिप्टी कमिश्नर हडसन ने लिखा कि अगर इसे जीवित छोड़ा गया तो यह जान ऑफ आर्क (वीरांगना) बन जाएगी। रानिया के नवाब जाविता खान की पत्नी ने भी आजादी की लड़ाई में योगदान दिया था।
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कांग्रेस के गठन व गांधीजी के आगमन के बाद महिलाओं की सक्रियता और बढ़ गई। 22 से 24 अक्तूबर 1920 को भिवानी में हुए कांग्रेस के सम्मेलन के दौरान करीब 500 महिलाएं वहां पहुंचीं। इसके बाद 15 फरवरी 1921 को फिर भिवानी में ही कांग्रेस की एक सभा हुई, जिसमें महिलाओं की संख्या बढ़कर पांच हजार पहुंच गई। इस सभा में मंच से लेकर पंडाल तक की सारी व्यवस्था महिलाओं ने ही संभाल रखी थी। पहली बार यहां महिलाओं ने खादी वस्त्रों की प्रदर्शनी भी लगाई।
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पति व पुत्रवधू के साथ पहुंचीं थीं चांद बाई
हिसार के संपन्न परिवार से ताल्लुक रखने वाले श्यामलाल सत्याग्रही की पत्नी चांद बाई गांधीजी की अनुयायी थीं। भिवानी की सभा में श्यामलाल व चांदबाई के साथ पुत्रवधू तारावती भी थीं। वहां गांधीजी का भाषण सुनने के बाद इस परिवार ने अंग्रेजी वस्त्रों का परित्याग कर वहीं खादी धारण कर लिया और आजीवन चरखे से सूत कातकर उससे बना कपड़ा ही पहना। चांदबाई ने असहयोग आंदोलन के दौरान विदेशी वस्त्रों की होली जलवाई तथा 120 चरखे महिलाओं में वितरित किए।
इन्होंने ही कटला रामलीला मैदान में चरखा दंगल की शुरुआत कराई थी। वर्ष 1930 में 200 महिलाओं ने इस चरखा दंगल में हिस्सा लेकर लोगों को खादी के प्रति प्रेरित किया था। इसी कटला रामलीला मैदान में महिला सम्मेलन भी कराया गया, जिसे पंजाब की महिला नेता लज्जावती ने संबोधित किया था। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इस तरह के साहस का उदाहरण विरले ही मिलता है।
खादी सच्चाई व देशभक्ति का प्रमाण
स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से घबराई अंग्रेजी हुकूमत ने चांदबाई, कमला देवी, चूली देवी, मोहनी देवी, राधा देवी, भगवती देवी आदि को गिरफ्तार कर जेल भेजा। बताते हैं कि चांद बाई को जब जेल भेजा जा रहा था, उस वक्त जेलर ने कहा कि वे अपने आभूषण उतार दें। चांद बाई ने वहां खड़े एक खादी वस्त्रधारी को सारे आभूषण उतारकर दे दिए। उन्होंने कहा कि खादी सच्चाई व देशभक्ति का प्रमाण है और मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये गहने हमारे घर पहुंच जाएंगे। जेल से छूटने के बाद चांद बाई ने तिलक स्वराज फंड के लिए 600 रुपये व 120 चरखा भी जुटाए।
विदेशी वस्त्र देख दुल्हन ने किया शादी से इंकार
रेवाड़ी की एक दुल्हन ने तो केवल इसलिए शादी से इंकार कर दिया था कि दूल्हे ने विदेशी वस्त्र (पैंट-शर्ट) पहन रखे थे। इसके अलावा हिसार के व्यक्तिगत सत्याग्रही बलवंत राय तायल की गिरफ्तारी की खबर सुनकर उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई अपनी गोद में छह दिन की बेटी को लेकर भिवानी से ऊंट पर बैठकर हिसार पहुंच गईं। आंदोलनकारी पति को परिवार से अधिक देश की चिंता करने की नसीहत देते हुए खुद जेल गेट तक साथ गई थीं। वर्ष 1930 में जन्माष्टमी के अवसर पर अंबाला की रहने वाली महिला दूनी चंद व सूरजभान समेत 30 महिलाएं मंदिर के गेट पर बैठ गईं और केवल खादी वस्त्र धारण करने वालों को ही वहां पूजा करने दी।