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देश को खाद्य एवं पोषण प्रदान करना केवल पारंपरिक प्रजनन विधि से संभव नहीं- डॉ. केपी

Tue, 25 Jun 2019 01:48 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Tue, 25 Jun 2019 01:48 AM IST
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देश को खाद्य एवं पोषण प्रदान करना केवल पारंपरिक प्रजनन विधि से संभव नहीं- डॉ. केपी
हिसार। कृषि में अगली क्रांति जैव प्रौद्योगिकी/जीनोमिक उपकरणों के प्रभावी अनुप्रयोग से होगी। पारंपरिक और जैव प्रौद्योगिकी दोनों प्रकार के साधनों का उपयोग न केवल फसल उत्पादकता में सुधार के लिए किया जा सकता है, बल्कि फसल की प्रजातियों की पोषण, गुणवत्ता और औद्योगिक उपयोगिता के लिए भी किया जा सकता है। यह बात हरियाणा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (एचएयू) के वाइस चांसलर प्रो. केपी सिंह ने कही।
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वाइस चांसलर सोमवार को यूनिवर्सिटी के मॉलेकुलर बायोलॉजी, बायो टेक्नोलॉजी एंड बायो इंफरमैटिक्स विभाग की तरफ यूज ऑफ एडवांस्ड बायो टेक्नोलॉजिकल टेक्निक्स फॉर क्रॉप इंप्रूवमेंट विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। कार्यशाला का आयोजन मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्कीम फॉर प्रमोशन ऑफ एकेडमिक व रिसर्च कलेबोरेशन स्पार्कट्ट के तहत किया गया है। वाइस चांसलर ने कहा कि देश को खाद्य एवं पोषण प्रदान करना केवल पारंपरिक प्रजनन विधि से संभव नहीं है। जैव प्रौद्योगिकी के प्रयोग से फसलों के उत्पादन के लिए चुनौती उत्पन्न कर रहे जैविक व अजैविक दबावों से निपटा जा सकता है। उन्होंने जैव प्रौद्योगिकी के वर्तमान युग में कुशल मानव संसाधनों की आवश्यकता पर भी बल दिया और कहा कि इस दिशा में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्पार्कट्ट योजना कारगर सिद्ध होगी। इसमें शोधार्थी विद्यार्थियों को विश्व के शीर्ष संस्थानों के वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन मिल सकेगा।
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इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स के प्रोफेसर डॉ. ओपी धनखड़ ने कहा कि जब जनसंख्या में निरंतर वृद्धि जारी है और खेती में प्राकृतिक संसाधन भी घट रहे हैं, इस परिस्थिति में खाद्य सुरक्षा प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा यह केवल कृषि प्रणाली में नवप्रवर्तन से ही संभव हो सकता है। उन्होंने कृषि से विमुख हो रही युवा पीढ़ी पर चिंता जताई और कहा यदि यह जारी रहा तो इससे खाद्य सुरक्षा का बड़ा संकट पैदा हो जाएगा।
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अमेरिका की वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के फसल एवं मृदा विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं निदेशक डॉ. केएस गिल ने कहा कि गेहूं में फूल आने की अवस्था में 30 डिग्री सेल्सियस तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने से गेहूं की पैदावार तीन प्रतिशत तक घट जाती है। इसलिए गेहूं की ताप रोधी किस्में विकसित करने की आवश्यकता है। इस अवसर पर एचएयू के अनुसंधान निदेशक डॉ. एसके सहरावत, कार्यशाला संयोजिका डॉ. पुष्पा खरब, संयोजक सचिव डॉ. उपेंद्र कुमार आदि मौजूद रहे।
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