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मिड-डे मील : तीन माह से बजट नहीं, ऊपर से खीर-पूड़ी का लफड़ा
अमर उजाला ब्यूरो, फतेहाबाद
Updated Sat, 15 Oct 2016 12:12 AM IST
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मिड-डे मील
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सुरेंद्र असीजा। प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पहली से आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को परोसे जाने वाले मिड-डे मील के मीनू में खीर अनिवार्य करने की शर्त स्कूल मुखियाओं की जेब पर भारी पड़ती नजर आ रही है। सरकार ने इसे अनिवार्य तो कर दिया, लेकिन अन्य व्यंजनों की तुलना में इसको बनाने में लागत अधिक आ रही है। जबकि सरकार अभी तक प्रति बच्चा महज 4 रुपये 13 पैसे ही उपलब्ध करा रही है। इतने पैसों में छात्रों के लिए खीर बनाना संभव ही नहीं लग रहा है। अध्यापकों ने मिड-डे मील की राशि बढ़ाने की विभाग से कई बार गुहार लगाई, लेकिन अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि उनके पास इसकी पावर नहीं है, इस बारे में सरकार के स्तर पर ही कुछ हो सकता है। मिड-डे मील में खीर एक अक्तूबर से दी जानी थी लेकिन बढ़ी हुई लागत के चलते अधिकांश स्कूलों में अभी तक खीर नहीं परोसी जा सकी है।
प्रदेश में पहली से आठवीं तक के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए प्रेरित करने के लिए मिड-डे मील दिया जा रहा है। ताकि बच्चा खाने के अभाव में स्कूल से वंचित ना रहे। मिड-डे मील देने के पीछे मुख्य उद्देश्य था कि बच्चों में आयरन, पोषक तत्वों की कमी ना हो। इसके लिए बच्चों को मिड-डे मील में बच्चों को दलिया, पराठा, हरी सब्जी, दाल-घिया, पुलाव, खिचड़ी, और रोटी-सब्जी, कढ़ी-चावल, छोले-हलवा, सोया चूरा मूंगफली इत्यादि सभी प्रकार की सब्जियां और व्यंजन परोसे जा रहे थे।
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इस बीच सरकार ने पत्र जारी कर सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील में खीर परोसे जाने की बात कही। सप्ताह में तीन दिन में दूध से बनी चीजें बनानी अनिवार्य करने से ये समस्या और बढ़ गई है। सरकार प्रति बच्चा 4.13 रुपये स्कूल में बजट के रूप में देती है लेकिन बढ़ती महंगाई के कारण इसमें खीर बनाना व्यवहारिक नहीं लग रहा।
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प्रति सौ बच्चों के लिए खीर में प्रयुक्त होने वाली सामग्री की लागत
सामग्री मात्रा दाम
चावल 10 किलो सरकार द्वारा
दूध 6 किलो 240 रुपये
चीनी 02 किलो 90 रुपये
मूंगफली 03 किलो 360 रुपये
र्इंधन - 50 रुपये
कुल 740 रुपये
सरकार द्वारा सौ बच्चों के लिए 413 रुपये ही बजट राशि के रूप में दिया जाता है। इस प्रकार 327 रुपये प्रति सौ बच्चों पर अध्यापकों को घर से लगाना पड़ता है या फिर उसे मात्रा कम करनी पड़ती है। इसके साथ ही पूड़ा और हलवा में तेल की लागत ने बजट बढ़ा दिया है। यही कारण है कि एक अक्तूबर के बाद से अभी तक स्कूलों में खीर बनी ही नहीं।
तीन माह से नहीं आया है मिड-डे मील का बजट
खीर बनाने की अनिवार्यता के साथ साथ सरकारी स्कूलों में अध्यापकों को मिड-डे मील बनाने में नई मुसीबत का भी सामना करना पड़ रहा है। सरकारी स्कूलों में पिछले तीन माह से मिड-डे मील का बजट आया ही नहीं है। इसके चलते स्कूलों में मिड-डे मील बनाने वाले कुकों और वर्करों को मानदेय भी नहीं मिला है। अध्यापकों को मजबूरन दुकानों से उधार पर सामान लाना पड़ रहा है। इसके अलावा कई अध्यापकों के तबादले से भी मिड-डे मील के बजट पर असर पड़ा है।
फैक्ट फाइल
स्कूल स्कूलों की संख्या विद्यार्थियों की संख्या
पहली से पांचवी 388 लगभग 70 हजार
छठी से आठवीं 86 32805
कुल 474 1 लाख 2 हजार 8 सौ पांच
सरकार मिड-डे मिल के लिए राशि निर्धारित करती है। जो कि वस्तुओं की कीमत के अनुसार सही होती है। अध्यापकों को कहीं ना कहीं एडजस्टमेंट करनी होगी। मिड-डे मील में खीर बनानी जरूरी है। इसके अलावा बीईओ स्तर से स्कूलों से बजट डिमांड भेजते हैं। बिल आते ही ग्रांट जारी कर दी जाएगी
-दयानंद सिहाग, डिप्टी डीईओ, फतेहाबाद ।