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इंसेफेलाइटिस मरीज को अस्पताल ले जाते समय बरतें ये सावधानियां, जानिए क्या हैं इसके लक्षण

Thu, 10 Dec 2020 03:25 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Thu, 10 Dec 2020 03:25 PM IST
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Take precautions while taking encephalitis patient to hospital
इंसेफेलाइटिस। (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

इंसेफेलाइटिस के संभावित मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने में छोटी-छोटी सात सावधानियों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है। अगर इन सावधानियों पर ध्यान दिया जाए तो मरीज को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाया जा सकता है और वह स्वस्थ भी हो सकता है। यह कहना है मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. श्रीकांत तिवारी का।

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मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि संभावित इंसेफेलाइटिस रोगी को एंबुलेंस में ले जाते समय बाएं या दाएं करवट लिटा कर ले जाएं। यदि रोगी के मुंह से झाग निकल रहा हो तो साफ कपड़े से उसका मुंह साफ करते रहें। यदि रोगी को झटके आ रहे हैं तो उसके दांतों के बीच साफ कपड़े का गोला बना कर मुंह में रखें जिससे जीभ न कटे।
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यदि रोगी बेहोशी के हालत में है तो उसे जगाने की कोशिश न करें और ऑक्सीजन लगा कर ले जाएं। रोगी की आंखों पर पट्टी लगाकर तथा किसी अन्य ध्वनि यंत्र, म्यूजिक सिस्टम या मोबाइल फोन की रिंगटोन का उपयोग किए बिना ले जाएं। यदि रोगी पूरी तरह से होश में न हो तो डॉक्टर की सलाह के बिना कोई भी चीज मुंह से न दें। रोगी को हमेशा अच्छे रास्ते से ले जाएं ताकि उसे झटके न लगें।
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दिमागी बुखार के संभावित लक्षण

  • तेज बुखार एवं सिरदर्द
  • सांस की गति व धड़कन का तेज चलना
  • उल्टी होना
  • शरीर का ढीलापन
  • झटके आना
  • बेहोशी की स्थिति या मानसिक अवस्था में बदलाव


बच्चे को तेज बुखार आए तो रखें ध्यान

  • यदि बच्चे को तेज बुखार आ रहा है तो उसे पैरासिटामॉल के अलावा बिना चिकित्सक की सलाह के कोई दवा न दें।
  • यदि तेज बुखार बना रहे तो सादे पानी से शरीर को पोछते रहें जब तक बुखार कम न हो। बच्चे को बायें या दाएं करवट में ही लिटाएं।
  • यदि किसी बच्चे को तेज बुखार के साथ झटके आ रहे हों तो तुरंत गांव की आशा से संपर्क करना चाहिए ताकि वह तुरंत 108 या 102 एंबुलेंस को बुलाए और नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सा अधिकारी को पूर्व सूचना दे सके।


दिमागी बुखार यानी इंसेफेलाइटिस को जानिए
यह ज्यादातर एक से 15 साल तक के बच्चों में होता है। यह बरसात के मौसम में खासतौर से होता है और प्रदेश में इसका प्रकोप जुलाई से नवंबर के महीनों में ज्यादा होता है। यह धान के खेत में पैदा होने वाले मच्छर के काटने, जल पक्षी व सुअर के माध्यम से फैलने वाले विषाणुओं, संक्रमित एवं प्रदूषित पानी और गंदगी से तथा चूहों और घुन के काटने से होता है। इसका प्रसार छछूंदर के माध्यम से भी होता है। इस बीमारी के मरीज को समय से अस्पताल न पहुंचाया जाए तो वह दिव्यांग हो सकता है और उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

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