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150 एकड़ जमीन: डीएम, जीडीए वीसी, नगर आयुक्त समेत आठ को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
Sat, 01 Feb 2020 11:09 AM IST
विजय जैन
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
Published by: विजय जैन
Updated Sat, 01 Feb 2020 11:09 AM IST
सार
- जमीन वन विभाग को हैंडओवर करने के फैसले पर सभी से मांगा जवाब
- दो दशक पहले जीडीए ने उद्यमी और व्यवसायी को आवंटित की थी जमीन
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : social media
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विस्तार
गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) की तरफ से रामगढ़ताल परियोजना क्षेत्र में जालान कॉम्प्लेक्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक ओम प्रकाश जालान और भव्या कॉलोनाइजर्स के प्रबंध निदेशक अनिल त्रिपाठी को आवंटित 150 एकड़ जमीन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सचिव, डीएम गोरखपुर, जीडीए उपाध्यक्ष, नगर आयुक्त समेत आठ लोगों को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि जमीन किस तरह से वन विभाग को हैंडओवर करने की कार्रवाई शुरू की गई। 23 फरवरी 2020 तक सभी को जवाब देना होगा। 24 फरवरी को मामले में अगली सुनवाई होगी।
प्राधिकरण ने वर्ष 1997 में 150 एकड़ जमीन मेसर्स जालान कॉम्प्लेक्स प्राइवेट लिमिटेड और मेसर्स भव्या कॉलोनाइजर्स के नाम नीलाम की थी। उद्योगपति जालान ने 8 करोड़ 31 लाख रुपये और अनिल त्रिपाठी ने लगभग 5 करोड़ रुपये अदा किए थे। बाद में ब्याज का मामला फं सा जिसपर उद्योगपति और बिल्डर कोर्ट चले गए थे। हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट दोनों ही जगह जीडीए को इस मामले में राहत नहीं मिली। इसी बीच एनजीटी, नई दिल्ली की प्रमुख बेंच ने 29 अप्रैल 2019 को मीरा शुक्ला बनाम नगर निगम गोरखपुर प्रकरण की सुनवाई में इस जमीन को वन विभाग को ट्रांसफ र करने का निर्देश दिया ।
कोर्ट ने कहा था कि वेटलैंड को लेकर चिन्हित जमीन पर किसी भी तरह का निर्माण नहीं होना चाहिए। प्रदेश सरकार या जीडीए पर्यटकों के लिए इसे ग्रीन लैंड के तौर पर विकसित करे। इसके बाद जीडीए ने जमीन वन विभाग को ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू की थी।
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प्राधिकरण ने वर्ष 1997 में 150 एकड़ जमीन मेसर्स जालान कॉम्प्लेक्स प्राइवेट लिमिटेड और मेसर्स भव्या कॉलोनाइजर्स के नाम नीलाम की थी। उद्योगपति जालान ने 8 करोड़ 31 लाख रुपये और अनिल त्रिपाठी ने लगभग 5 करोड़ रुपये अदा किए थे। बाद में ब्याज का मामला फं सा जिसपर उद्योगपति और बिल्डर कोर्ट चले गए थे। हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट दोनों ही जगह जीडीए को इस मामले में राहत नहीं मिली। इसी बीच एनजीटी, नई दिल्ली की प्रमुख बेंच ने 29 अप्रैल 2019 को मीरा शुक्ला बनाम नगर निगम गोरखपुर प्रकरण की सुनवाई में इस जमीन को वन विभाग को ट्रांसफ र करने का निर्देश दिया ।
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कोर्ट ने कहा था कि वेटलैंड को लेकर चिन्हित जमीन पर किसी भी तरह का निर्माण नहीं होना चाहिए। प्रदेश सरकार या जीडीए पर्यटकों के लिए इसे ग्रीन लैंड के तौर पर विकसित करे। इसके बाद जीडीए ने जमीन वन विभाग को ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू की थी।
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एनजीटी के आदेश के खिलाफ व्यवसायी ने दाखिल की याचिका
एनजीटी के आदेश के खिलाफ मेसर्स भव्या कालोनाइजर्स की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की गई थी। आरोप लगाया गया कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी प्राधिकरण ने जमीन उनके नाम रजिस्ट्री नहीं कराई । अलबत्ता बिना किसी नोटिस और पक्ष सुने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जमीन ग्रीन लैंड के तौर पर विकसित करने का आदेश सुनाया जिसके बाद जमीन वन विभाग को हैंडओवर करने की कार्रवाई शुरू कर दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी 2020 को इस मामले में यूपी के सचिव, डीएम, जीडीए वीसी, नगर आयुक्त, गीडा सीईओ, यूपी पॉल्यूशन बोर्ड के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष और मीरा शुक्ला को नोटिस जारी कर 24 फरवरी तक जवाब मांगा है। उधर, इस मामले में अब उद्योगपति ओम प्रकाश जालान ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है। 150 एकड़ जमीन में से 100 एकड़ जमीन प्राधिकरण ने उनके नाम आवंटित की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी 2020 को इस मामले में यूपी के सचिव, डीएम, जीडीए वीसी, नगर आयुक्त, गीडा सीईओ, यूपी पॉल्यूशन बोर्ड के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष और मीरा शुक्ला को नोटिस जारी कर 24 फरवरी तक जवाब मांगा है। उधर, इस मामले में अब उद्योगपति ओम प्रकाश जालान ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है। 150 एकड़ जमीन में से 100 एकड़ जमीन प्राधिकरण ने उनके नाम आवंटित की थी।
वर्तमान में 535 करोड़ है जमीन की कीमत
रामगढ़ताल क्षेत्र में जिस 150 एकड़ जमीन को लेकर विवाद है, उसकी मौजूदा डीएम सर्किल रेट के हिसाब से कीमत 535 करोड़ है। 22 जनवरी को हुई जीडीए बोर्ड बैठक में एनजीटी के आदेश के क्रम में जमीन वन विभाग को हैंडओवर करने के लिए यह रकम शासन से मांगने पर सहमति भी बनी थी।
मामले में विजिलेंस जांच भी चल रही
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी यह बेशकीमती जमीन उद्योगपति के नाम बैनामा किए जाने के आदेश के बाद प्रमुख सचिव आवास ने पिछले साल ही विजिलेंस को मामले की जांच सौंपी थी। तत्कालीन जीडीए उपाध्यक्ष अमित बंसल ने शासन को एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि प्राधिकरण के पूर्व अधिकारियों ने लापरवाही की जिससे ब्याज के करीब चार सौ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
मामले में विजिलेंस जांच भी चल रही
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी यह बेशकीमती जमीन उद्योगपति के नाम बैनामा किए जाने के आदेश के बाद प्रमुख सचिव आवास ने पिछले साल ही विजिलेंस को मामले की जांच सौंपी थी। तत्कालीन जीडीए उपाध्यक्ष अमित बंसल ने शासन को एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि प्राधिकरण के पूर्व अधिकारियों ने लापरवाही की जिससे ब्याज के करीब चार सौ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद भी प्राधिकरण जमीन रजिस्ट्री नहीं कर रहा। एनजीटी ने भी बिना मुझे सुने एक पक्षीय आदेश कर दिया, मुझे नोटिस तक नहीं दी गई। सुप्रीम कोर्ट से आदेश होने के बाद भी प्राधिकरण और शासन-प्रशासन अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल कर मेरा उत्पीड़न कर रहा है। अगर उन्हें जमीन छिननी ही है तो क्यों न मेरी सारी संपत्ति छीनकर मुझे जान से मार दे रहे। मैं थक गया हूं दो दशक से लड़ते-लड़ते
- अनिल त्रिपाठी, एमडी भव्या कॉलोनाइजर्स
मामला संज्ञान में आया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जवाब तैयार किया जा रहा है। तय समय के भीतर जवाब दाखिल कर दिया जाएगा
- अनुज सिंह, उपाध्यक्ष, जीडीए
कोट 3- सरकारी एजेंसी ने गोरखपुर का विकास रोका है। पहले हाईकोर्ट, फिर सुप्रीमकोर्ट ने हमारे हक में फैसला दिया। इस मामले में जानबूझकर परेशान किया जा रहा है। जालान कॉम्प्लेक्स प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से भी याचिका दाखिल कर दी गई है।
- ओम प्रकाश जालान, प्रबंध निदेशक, जालान कॉम्प्लेक्स प्राइवेट लिमिटेड
- अनिल त्रिपाठी, एमडी भव्या कॉलोनाइजर्स
मामला संज्ञान में आया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जवाब तैयार किया जा रहा है। तय समय के भीतर जवाब दाखिल कर दिया जाएगा
- अनुज सिंह, उपाध्यक्ष, जीडीए
कोट 3- सरकारी एजेंसी ने गोरखपुर का विकास रोका है। पहले हाईकोर्ट, फिर सुप्रीमकोर्ट ने हमारे हक में फैसला दिया। इस मामले में जानबूझकर परेशान किया जा रहा है। जालान कॉम्प्लेक्स प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से भी याचिका दाखिल कर दी गई है।
- ओम प्रकाश जालान, प्रबंध निदेशक, जालान कॉम्प्लेक्स प्राइवेट लिमिटेड