सिजोफ्रेनिया दिवस: मानसिक दिक्कत होने पर लोग समझते हैं भूत-प्रेत का साया, झाड़-फूंक के चक्कर में करते हैं समय बर्बाद
मानसिक दिक्कत होने पर लोग समझते हैं भूत-प्रेत का साया, समय से इलाज मिले तो ठीक हो जाते हैं ज्यादातर मरीज।
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मानसिक दिक्कत होने पर ग्रामीण इलाकों, यहां तक कि शहरी क्षेत्र में भी कम पढ़े-लिखें लोग तांत्रिक और झाड़फूंक के चक्कर में इलाज का सही समय गवां देते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे सिजोफ्रेनिया बीमारी कहते हैं। समय से इलाज न मिलने की वजह से मानसिक स्थिति बिगड़ती जाती है। हालात ऐसे हो जाते हैं कि मरीज अनाप-शनाप हरकतें करने लगता है।
जिला अस्पताल और बीआरडी मेडिकल कॉलेज की मानसिक विभाग की ओपीडी में प्रतिदिन 100 में 125 मरीज इसी बीमारी आ रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे मरीजों को समय से इलाज मिलना बहुत जरूरी है। अगर समय पर इलाज हो जाए तो अधिकांश मरीज ठीक हो जाते हैं। लेकिन, इलाज में देरी की वजह से मरीज विक्षिप्त हो जाता है।
जिला अस्पताल के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित शाही ने बताया कि सिजोफ्रेनिया के मरीजों में कुछ विशेष तौर से दिखने वाले लक्षण कैटेटोनिक कहे जाते हैं। इसमें व्यक्ति ज्यादा चलता फिरता नहीं है और किसी भी निर्देश का पालन नहीं कर पाता है। ऐसा व्यक्ति अजीब सी आवाज निकालकर नकल उतारता है।
इस तरह के मरीजों की संख्या पिछले दो तीन सालों में बढ़ी है। हर दिन 20 से 25 मरीज इस बीमारी से पीड़ित मिल रहे हैं। इनमें कई ऐसे हैं, जो तंत्र-मंत्र के चक्कर में पड़कर ज्यादा वक्त गवां दिए हैं। इसकी वजह से उनके इलाज में समय लग रहा है। ऐसे मरीजों के पूरी तरह से ठीक होने की संभावना भी कम हो जाती है।
तनाव की वजह से होती है यह बीमारी
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. तपस कुमार अईच ने बताया कि तनाव की वजह से यह बीमारी होती है। सिजोफ्रेनिया वाले परिवार के अन्य सदस्यों को भी इस बीमारी का खतरा ज्यादा है। इसके अलावा वायरल संक्रमण की वजह से बच्चों में भी यह बीमारी हो जाती है। कुपोषण की वजह से बच्चों का मानसिक विकास नहीं होता है। इसकी वजह से भी यह बीमारी बच्चों में होती है। जन्म के बाद माता पिता की मौत से भी बच्चा इस बीमारी से ग्रसित हो जाता है।