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नेपाल में जलप्रलय: हिमालय में 2300 ग्लेशियर झीलों पर साझा निगरानी तंत्र नहीं, तबाही ने खोली तैयारियों की पोल

Mon, 31 Aug 2026 11:40 AM IST
Akash Dubey पुरुषोत्तम राय, अमर उजाला, गोरखपुर
पुरुषोत्तम राय, अमर उजाला, गोरखपुर Published by: Akash Dubey Updated Mon, 31 Aug 2026 11:40 AM IST
सार

नेपाल में फ्लैश फ्लड ने हिमालयी आपदा तैयारियों की कमजोरी उजागर की। ग्लेशियर झीलों के लिए साझा अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं। भारत, नेपाल, चीन मिलकर निगरानी तंत्र बनाएं।

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Nepal Floods No shared monitoring mechanism for 2300 glacial lakes in the Himalayas
नेपाल में जलप्रलय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमालय की ऊंचाइयों पर जमा पानी कब मौत का सैलाब बनकर मैदानों में उतर आए, इसका अंदाजा लगाने के लिए देशों की सीमाएं काफी नहीं हैं। नेपाल में हालिया विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने हिमालयी क्षेत्र की आपदा तैयारियों की बड़ी कमजोरी सामने ला दी है। पाकिस्तान से भूटान तक करीब 2300 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। इनमें से कई के टूटने पर अचानक बाढ़ का खतरा बना हुआ है। नेपाल में ही करीब 20 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील हैं। इसके बावजूद पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए साझा और प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं है।

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नेपाल सरकार के आपदा सलाहकार और त्रिभुवन विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग स्थित सेंटर फॉर डिजास्टर मैनेजमेंट स्टडीज के विशेषज्ञ डॉ. बसंत राज अधिकारी ने संवाद न्यूज एजेंसी से फोन पर बातचीत में कहा कि हिमालयी क्षेत्र की निगरानी किसी एक देश के बूते की बात नहीं है। भारत, नेपाल और चीन को मिलकर ग्लेशियर, ग्लेशियर झील, मौसम और नदियों की रियल टाइम निगरानी के लिए साझा तंत्र विकसित करना होगा। इस दिशा में नेपाल जल्द पहल करेगा।

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180 से 190 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आया मलबा
डॉ. अधिकारी के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह 8:37 बजे फ्लैश फ्लड शुरू हुआ। करीब नौ बजे चीन की ओर से भारी बाढ़ की सूचना एसएमएस के जरिये मिली। इसके बाद सेना और पुलिस ने माइकिंग कर लोगों को चेतावनी देने की कोशिश की लेकिन तब तक बाढ़ की रफ्तार इंसानी तैयारियों से कई गुना आगे निकल चुकी थी। 

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पहाड़ से मलबा करीब 180 से 190 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से नीचे आया। लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का पर्याप्त समय नहीं मिल सका। उन्होंने इसे अब तक की सबसे विनाशकारी फ्लैश फ्लड बताते हुए कहा कि इसकी भयावहता अकल्पनीय थी। आपदा के वास्तविक कारणों का अभी पता लगाया जा रहा है। फिलहाल पूरा ध्यान बचाव कार्य और लापता लोगों की तलाश पर है।

हिमालयी क्षेत्र में खतरा नया नहीं: डॉ. रमेश
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. रमेश राज पंत ने बताया कि त्रिशूली नदी में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगे हैं लेकिन इनकी संख्या कम होने के कारण बाढ़ की सूचना समय पर नहीं मिल सकी। इसके चलते बागमती प्रदेश के पांच जिलों में भारी तबाही हुई। रसुवा सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। करीब 2500 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। क्षेत्र के सभी पावर प्रोजेक्ट भी तबाह हो गए हैं। 

डॉ. रमेश राज के अनुसार, 1 जुलाई 2025 को भी फ्लैश फ्लड आया था, जिसमें 10 लोगों की मौत हुई थी और 25 लोग अब भी लापता हैं। यानी हिमालयी क्षेत्र में खतरे की चेतावनी नई नहीं है। पाकिस्तान से भूटान तक फैली हिंदूकुश-हिमालय पर्वत श्रृंखला में ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों के टूटने का खतरा लगातार बना हुआ है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दक्षिण एशिया के किसी भी देश के पास पूरे हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों की निगरानी की समुचित व्यवस्था नहीं है। फ्लैश फ्लड के बाद राहत और बचाव के साथ दूषित पानी से होने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। मलबे और तेज बहाव में लापता लोगों के शव बरामद करना भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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