Gorakhpur: नगर निगम में सांठगांठ कर भूमाफिया ने सरकारी जमीन पर जमा लिया कब्जा, अब कारनामों पर होती है लीपापोती
नगर आयुक्त गौरव सिंह सोगरवाल ने कहा कि नगर निगम की भूमि पर किए गए कब्जों को हटाया गया है। आगे भी यह कार्रवाई की जाती रहेगी। लैंड बैंक बनाकर सरकारी योजनाओं में इन जमीनों का प्रयोग किया जाएगा। नगर निगम की इन जमीनों पर कब्जा कैसे हुआ, इसकी भी जांच चल रही है।
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गोरखपुर नगर निगम की सरकारी जमीनों पर भूमाफिया का कब्जा है, यह बात सामने तो 12 जून 2023 को ही आ गई थी। तब पुलिस ने माफिया अजीत शाही के कब्जे पर बुलडोजर चलाने के लिए गैंगस्टर एक्ट के तहत जानकारी जुटाई थी और डीएम के आदेश पर कार्रवाई हुई।
सामने आया था कि जमीन पर माफिया ने 23 जनवरी 2007 में ही अपनी मां रामाजी सिंह और पत्नी मिथिलेश सिंह का नाम पर दर्ज करा लिया था। जांच शुरू हुई तो एक रिटायर्ड बाबू और तीन अन्य लोगों का नाम भी सामने आया, लेकिन उसे बचाने के लिए पूरा भ्रष्ट तंत्र ही लग गया।
लिहाजा, यह आज तक सामने नहीं आ सका कि खेल किसने और कैसे किया। या यूं कहे कि इसे सामने आने ही नहीं दिया जाता, क्योंकि इनके चेहरे के सामने आते ही कई और अफसर भी बेनकाब हो जाएंगे। अब नगर आयुक्त गौरव सिंह सोगरवाल ने सख्ती की है तो शहर के बीच में ही अवैध पार्किंग, नौसड़ के पास की जमीन पर कब्जा का सच सामने आ गया।
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नगर निगम की जमीनों पर कब्जा का खेल सबसे पहले 2012 में सामने आया था। तब पता चला कि इस पूरे खेल में कर्मचारियों का एक गिरोह काम करता है और उसमें से ही एक कर्मचारी ने नगर निगम की करोड़ों रुपयों की संपत्ति पर कब्जा जमा लिया है।
दुकान और मकान सब निगम की जमीन पर कब्जा कर बनाए जाने के बाद सख्ती की गई, लेकिन कर्मचारियों के विरोध के आगे नगर निगम प्रशासन बैकफुट पर आ गया था। विभाग के सूत्रों के मुताबिक इसके बाद ही धंधेबाज कर्मचारियों का मनोबल बढ़ गया।
यह वही गिरोह है, जो दूसरे के मकान पर नंबर चढ़ा देने, टैक्स जमा कर देने तक का खेल करता है। उस समय से शुरू हुआ सिलसिला आगे और तेजी से बढ़ा। अब इसकी पोल तब खुली जब पुलिस ने माफिया पर कार्रवाई शुरू की। अजीत शाही पर कार्रवाई के दौरान निगम की सच्चाई सामने आई।
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अब नगर आयुक्त ने सख्ती की तो पता चला कि कई जमीनों पर कब्जा है। पिछले तीन महीने में 21 एकड़ जमीन खाली कराई गई है। सख्ती का ही असर है कि कई और जमीनों को भी नगर निगम ने अब अपना बताना शुरू कर दिया है और उसके दस्तावेज बाहर आ गए हैं। लेकिन, यह भी सच है कि इन घुटे कर्मचारियों से उन जमीनों के दस्तावेज निकलवाना टेड़ी खीर है, जिसे माफिया अजीत शाही जैसे लोगों ने अपना या अपने सगे संबंधियों के नाम पर अंकित करवा दिया है।
पार्क में या फिर पेड़ के नीचे भवन में होता था सौदा
जानकार बताते हैं, अभी चार साल पहले तक यह काम तेजी से चला है। इसके लिए पुराने कर्मचारी अपने लोगों से कार्यालय में बातचीत नहीं करते थे। ऊपर के तल से बाबू नीचे आते थे और सामने पार्क के चबूतरे या फिर पेड़ के नीचे चाय की दुकान के पास के भवन में बैठकर सौदा तय करते थे। कोशिश यही होती थी कि इसकी भनक किसी को न लगने पाए। हुआ भी यही था, अब निगम के इस पुराने खेल का कितना सच सामने आएगा, यह आने वाले समय में ही तय हो पाएगा।
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दो भाइयों के बीच मकान के बंटवारे के विवाद को भी घुटे कर्मचारी विवादित बना देते थे। एक भाई से सेटिंग कर मकान का नंबर उसके नाम पर दर्ज कर दिया जाता था, जिसे वह न्यायालय में पेश करता था और जमीन का मामला उलझ जाता था। अब इसकी माॅनीटरिंग तेज हुई है तो इस पर थोड़ी रोक जरूर लगी है।
नगर आयुक्त गौरव सिंह सोगरवाल ने कहा कि नगर निगम की भूमि पर किए गए कब्जों को हटाया गया है। आगे भी यह कार्रवाई की जाती रहेगी। लैंड बैंक बनाकर सरकारी योजनाओं में इन जमीनों का प्रयोग किया जाएगा। नगर निगम की इन जमीनों पर कब्जा कैसे हुआ, इसकी भी जांच चल रही है। इसमें अगर विभागीय किसी कर्मचारी या अधिकारी की संलिप्तता मिली तो उसपर भी काईवाई की जाएगी।