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ट्रेन के फर्स्ट क्लास कोच में यात्रियों का था जलवा, सलाम करते थे हेड टीटीई
Fri, 29 Jan 2021 01:21 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 29 Jan 2021 01:21 PM IST
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फर्स्ट क्लास कोच। (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला।
आजादी के पहले करीब वर्ष 1900 के आसपास के समय ट्रेन में फर्स्ट क्लास में सफर करने वाले का अलग ही सम्मान होता था। फर्स्ट क्लास का इतना रुतबा था कि ट्रेन के रुकने पर हेड टीटीई आकर डिब्बे में सलाम करते थे।
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भोजनालय में इतना स्वादिष्ट खाना बनता था कि शहर से लोग डबल रोटी लेने ट्रेन तक जाया करते थे। यही नहीं बूट पालिश करने के लिए मोची और शेविंग के लिए नाई भी उपलब्ध होते थे। फर्स्ट क्लास कोच में अंग्रेज अफसर, जमींदार या कोई बड़ा आदमी ही सफर करता था।
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बता दें कि पूर्वोत्तर रेलवे में 1887 में ट्रेनों के अंदर सैलून लगने लगी थी। बेतिया महाराज (बेतिया बिहार में है) ने रेलवे से सैलून की मांग की थी। राजा की इच्छा के अनुसार सैलून के अंदर की डिजाइन तैयार की गई थी।
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- फोटो : अमर उजाला।
वे छह माह का किराया पांच हजार रुपये रेलवे को देते थे। राजा चाहते थे कि सैलून का रंग लाल हो, वे पीला रंग पंसद नहीं करते थे। जबकि सैलून का रंग पीला होता था। हालांकि रेलवे प्रशासन को यह स्वीकार नहीं था।
वहीं लेडीज कंपार्टमेंट में लाल रंग का कारपेट और कुसन दिया गया था। 1893 में राजा की मौत के बाद भी यह सुविधा बरकरार रहा। बाद में रेल प्रशासन ने सैलून की सुविधा बेतिया के भविष्य के राजा के लिए रख दिया गया। राज्य के ऑफिसियल कर्मचारियों के सैलून में प्रवेश पर रोक लगा दिया। इसके बाद यह कभी दोबारा शुरू नहीं हुआ।
वहीं लेडीज कंपार्टमेंट में लाल रंग का कारपेट और कुसन दिया गया था। 1893 में राजा की मौत के बाद भी यह सुविधा बरकरार रहा। बाद में रेल प्रशासन ने सैलून की सुविधा बेतिया के भविष्य के राजा के लिए रख दिया गया। राज्य के ऑफिसियल कर्मचारियों के सैलून में प्रवेश पर रोक लगा दिया। इसके बाद यह कभी दोबारा शुरू नहीं हुआ।