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Gorakhpur News: केबिन में ही दिखेगा सिग्नल, कोहरे में भी लेट नहीं होगी ट्रेन
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लखनऊ-गोरखपुर-छपरा रेल मार्ग पर कवच सिस्टम लगने से मिलेगी सुविधा
दो साल में कार्य पूरा करने का है लक्ष्य
ऑटो ब्लॉक सिग्नल सिस्टम से कवच लगाने का काम होगा आसान
गोरखपुर। कोहरे के चलते औसत गति आधी होने के बाद भी ट्रेनों के लेट होने की कहानी पूर्वोत्तर रेलवे में अब पुरानी हो जाएगी। यह परिवर्तन आएगा लखनऊ-गोरखपुर-छपरा रूट पर लग रहे कवच प्रणाली से। इस अत्याधुनिक सिस्टम में लोको पायलट (ट्रेन चालक) को अपने केबिन में ही सिग्नल दिखेगा, जिससे उसे ट्रेन की स्पीड कम नहीं करनी पड़ेगी। घने कोहरे में भी ट्रेनें अपने ट्रैक पर सामान्य गति से चलेंगी। दो साल में यह सिस्टम पूरी तरह से सक्रिय हो जाएगा।
कोहरे में ट्रेनों का संचलन भी कठिन हो जाता है। वजह यह कि सिग्नल ही दिखाई नहीं देता। लोको पायलट को सिग्नल देखने के लिए कई बार केबिन से बाहर आना पड़ता है। इससे हादसे की आशंका बनी रहती है। इसीलिए कोहरे में अधिकतम गति 75 किलोमीटर प्रतिघंटा निर्धारित कर दी जाती है। ट्रेनों के लेट होने से दूसरी ट्रेनों के संचालन में भी दिक्कत आती है। इसीलिए अभी भी हर साल 01 दिसंबर से 28 फरवरी के बीच पूर्वोत्तर रेलवे की 30 से अधिक ट्रेनों को कैंसिल करना पड़ता है। इसका असर बाकी अन्य ट्रेनों में सीट उपलब्धता पर पड़ता है। लेकिन ट्रेनों के बीच टक्कर रोकने के लिए बने कवच सिस्टम और क्षमता बढ़ाने के लिए लग रहे ऑटो ब्लॉक सिग्नल सिस्टम के पूरी तरह से सक्रिय होने पर यह समस्या स्वत: ही समाप्त हो जाएगी। क्योंकि कवच के सक्रिय होने पर अगले सिग्नल की स्थिति इंजन के डैश बोर्ड पर दिखेगी। इससे लोको पायलट को सिग्नल देखने के लिए केबिन से बाहर नहीं आना पड़ेगा। इसका फायदा यह होगा कि लोको पायलट सिग्नल देखकर ट्रेन को सामान्य गति से चला सकेगा।
ऑटो ब्लॉक सिग्नल सिस्टम का मिलता है फायदा
ट्रेनों के बीच टक्कर रोकने के लिए बने कवच सिस्टम के तीन भाग हैं। एक पार्ट आरएफआईडी (रेडियो फ्रिक्वैंसी आईडेंटिफिकेशन) जो रेल ट्रैक पर लगाया जाता है। दूसरा पार्ट एंटीना व टॉवर है जिसे रेलवे स्टेशन पर लगाया जाता है। तीसरा पार्ट इंजन में लगता है। तीनों एक दूसरे से कनेक्ट होते हैं तो सिग्नल की वास्तविक स्थिति समेत उस ट्रैक की अन्य गतिविधियां भी पता लगती रहती हैं। लखनऊ-गोरखपुर-छपरा रूट पर ऑटो ब्लॉक सिग्नल सिस्टम लग रहा है, जिसमें हर किलोमीटर पर सिग्नल लगे रहे हैं। कवच प्रणाली युक्त ट्रेन जब इस रूट पर गुजरेगी तो सिग्नल की स्थिति उस ट्रेन के इंजन में लगे बोर्ड पर दिखेगी। मतलब यह कि अगला सिग्नल रेड है या ग्रीन यह डैश बोर्ड पर ही दिखने लगेगा।
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पहले प्रमुख ट्रेनों में शुरू होगी सुविधा
कवच 4.0 प्रणाली एक स्वचालित ट्रेन प्रोटेक्शन तकनीक है। यह दो स्थिति में अपना काम खुद करता है। पहला एक ही पटरी पर दो ट्रेनों के आमने-सामने आने पर करीब 400 मीटर के फासले पर दोनों में अपने आप ब्रेक लग जाएगा। दूसरा पीछे से आ रही ट्रेन ने अगर सुरक्षित दूरी का उल्लंघन किया है तो कवच उसे भी रोकेगा। इसकी उपयोगिता को देखते हुए रेलवे ने वंदेभारत के नए बन रहे इंजनों में इसे इंस्टॉल करा दिया है। वहीं सबसे पहले प्रमुख एक्सप्रेस ट्रेनों में लगाया जाएगा। इसके बाद मेमू ट्रेनों में भी इसे इंस्टाल कराया जाएगा।
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दो साल में कार्य पूरा करने का है लक्ष्य
ऑटो ब्लॉक सिग्नल सिस्टम से कवच लगाने का काम होगा आसान
गोरखपुर। कोहरे के चलते औसत गति आधी होने के बाद भी ट्रेनों के लेट होने की कहानी पूर्वोत्तर रेलवे में अब पुरानी हो जाएगी। यह परिवर्तन आएगा लखनऊ-गोरखपुर-छपरा रूट पर लग रहे कवच प्रणाली से। इस अत्याधुनिक सिस्टम में लोको पायलट (ट्रेन चालक) को अपने केबिन में ही सिग्नल दिखेगा, जिससे उसे ट्रेन की स्पीड कम नहीं करनी पड़ेगी। घने कोहरे में भी ट्रेनें अपने ट्रैक पर सामान्य गति से चलेंगी। दो साल में यह सिस्टम पूरी तरह से सक्रिय हो जाएगा।
कोहरे में ट्रेनों का संचलन भी कठिन हो जाता है। वजह यह कि सिग्नल ही दिखाई नहीं देता। लोको पायलट को सिग्नल देखने के लिए कई बार केबिन से बाहर आना पड़ता है। इससे हादसे की आशंका बनी रहती है। इसीलिए कोहरे में अधिकतम गति 75 किलोमीटर प्रतिघंटा निर्धारित कर दी जाती है। ट्रेनों के लेट होने से दूसरी ट्रेनों के संचालन में भी दिक्कत आती है। इसीलिए अभी भी हर साल 01 दिसंबर से 28 फरवरी के बीच पूर्वोत्तर रेलवे की 30 से अधिक ट्रेनों को कैंसिल करना पड़ता है। इसका असर बाकी अन्य ट्रेनों में सीट उपलब्धता पर पड़ता है। लेकिन ट्रेनों के बीच टक्कर रोकने के लिए बने कवच सिस्टम और क्षमता बढ़ाने के लिए लग रहे ऑटो ब्लॉक सिग्नल सिस्टम के पूरी तरह से सक्रिय होने पर यह समस्या स्वत: ही समाप्त हो जाएगी। क्योंकि कवच के सक्रिय होने पर अगले सिग्नल की स्थिति इंजन के डैश बोर्ड पर दिखेगी। इससे लोको पायलट को सिग्नल देखने के लिए केबिन से बाहर नहीं आना पड़ेगा। इसका फायदा यह होगा कि लोको पायलट सिग्नल देखकर ट्रेन को सामान्य गति से चला सकेगा।
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ऑटो ब्लॉक सिग्नल सिस्टम का मिलता है फायदा
ट्रेनों के बीच टक्कर रोकने के लिए बने कवच सिस्टम के तीन भाग हैं। एक पार्ट आरएफआईडी (रेडियो फ्रिक्वैंसी आईडेंटिफिकेशन) जो रेल ट्रैक पर लगाया जाता है। दूसरा पार्ट एंटीना व टॉवर है जिसे रेलवे स्टेशन पर लगाया जाता है। तीसरा पार्ट इंजन में लगता है। तीनों एक दूसरे से कनेक्ट होते हैं तो सिग्नल की वास्तविक स्थिति समेत उस ट्रैक की अन्य गतिविधियां भी पता लगती रहती हैं। लखनऊ-गोरखपुर-छपरा रूट पर ऑटो ब्लॉक सिग्नल सिस्टम लग रहा है, जिसमें हर किलोमीटर पर सिग्नल लगे रहे हैं। कवच प्रणाली युक्त ट्रेन जब इस रूट पर गुजरेगी तो सिग्नल की स्थिति उस ट्रेन के इंजन में लगे बोर्ड पर दिखेगी। मतलब यह कि अगला सिग्नल रेड है या ग्रीन यह डैश बोर्ड पर ही दिखने लगेगा।
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पहले प्रमुख ट्रेनों में शुरू होगी सुविधा
कवच 4.0 प्रणाली एक स्वचालित ट्रेन प्रोटेक्शन तकनीक है। यह दो स्थिति में अपना काम खुद करता है। पहला एक ही पटरी पर दो ट्रेनों के आमने-सामने आने पर करीब 400 मीटर के फासले पर दोनों में अपने आप ब्रेक लग जाएगा। दूसरा पीछे से आ रही ट्रेन ने अगर सुरक्षित दूरी का उल्लंघन किया है तो कवच उसे भी रोकेगा। इसकी उपयोगिता को देखते हुए रेलवे ने वंदेभारत के नए बन रहे इंजनों में इसे इंस्टॉल करा दिया है। वहीं सबसे पहले प्रमुख एक्सप्रेस ट्रेनों में लगाया जाएगा। इसके बाद मेमू ट्रेनों में भी इसे इंस्टाल कराया जाएगा।