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गोरखपुर: अधिग्रहण के बाद भी जमीनों के रिकार्ड पर अपना नाम दर्ज न कराने की गलती अब सुधारेगा जीडीए
Fri, 16 Jul 2021 11:04 AM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 16 Jul 2021 11:04 AM IST
सार
बिक गए हैं कई भूखंड, जीडीए-तहसील की लापरवाही से फंस गए हैं सैकड़ों लोग। जमीन अपनी बताकर शास्त्रीपुरम के 15 से अधिक लोगों को नोटिस भेज चुका है प्राधिकरण।
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गोरखपुर विकास प्राधिकरण
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
गोरखपुर जिले में कई साल पूर्व अधिगृहीत की गई जमीनों में से कुछ के राजस्व अभिलेखों पर गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) अब भी अपना नाम नहीं दर्ज करा सका है। प्राधिकरण अब अभियान चलाकर इस गलती को सुधारेगा। दस्तावेजों पर नाम नहीं चढ़ने से वर्तमान में जीडीए के तमाम ऐसे भूखंडों को काश्तकार बेच भी चुके हैं। तो कई लोग ठगी का शिकार बनकर प्राधिकरण के चक्कर लगा रहे हैं।
गलती सुधारने के क्रम में जिन भूखंडों के अधिग्रहण के साथ ही मुआवजा, काश्तकार को दिया जा चुका है, उसका विवरण विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी (एसएलएओ) को उपलब्ध कराया जा रहा है। एसएलएओ की ओर से ही तहसील में जीडीए का नाम दर्ज कराया जाएगा। ऐसे ही मामले में शहर के लच्छीपुर स्थित शास्त्रीनगर के 15 से अधिक लोग परेशान हैं। करोड़ों की लागत से मकान बनवाने के बाद कुछ महीने पहले उन्हें जीडीए की तरफ से नोटिस मिला की जमीन जीडीए की है।
जीडीए का कहना था कि यह जमीन 1990 के आसपास अधिग्रहीत की जा चुकी है और मुआवजा भी दिया जा चुका है। जबकि यहां मकान बनवाकर रह रहे लोगों के अनुसार उन्होंने 2012-13 तक यहां के भूखंडों को काश्तकार से खरीदा था। तहसील में उस समय भी काश्तकार का ही नाम दर्ज था। जमीन की बाकायदा रजिस्ट्री हुई है। कुछ लोगों को बैंक से घर बनवाने के लिए लोन भी मिला था। इसी तरह के अन्य मामले भी हैं, जिसमें लोगों के घर बनाने के बाद जीडीए की नोटिस पहुंची। लच्छीपुर के अलावा मानबेला की करीब 12 एकड़ जमीन, खोराबार में भी 10 एकड़ से अधिक जमीन पर भी प्राधिकरण का नाम नहीं दर्ज हो सका है। इनमें से कई भूखंड, अधिग्रहण के बाद भी मूल काश्तकार बेच चुके हैं।
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गलती सुधारने के क्रम में जिन भूखंडों के अधिग्रहण के साथ ही मुआवजा, काश्तकार को दिया जा चुका है, उसका विवरण विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी (एसएलएओ) को उपलब्ध कराया जा रहा है। एसएलएओ की ओर से ही तहसील में जीडीए का नाम दर्ज कराया जाएगा। ऐसे ही मामले में शहर के लच्छीपुर स्थित शास्त्रीनगर के 15 से अधिक लोग परेशान हैं। करोड़ों की लागत से मकान बनवाने के बाद कुछ महीने पहले उन्हें जीडीए की तरफ से नोटिस मिला की जमीन जीडीए की है।
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जीडीए का कहना था कि यह जमीन 1990 के आसपास अधिग्रहीत की जा चुकी है और मुआवजा भी दिया जा चुका है। जबकि यहां मकान बनवाकर रह रहे लोगों के अनुसार उन्होंने 2012-13 तक यहां के भूखंडों को काश्तकार से खरीदा था। तहसील में उस समय भी काश्तकार का ही नाम दर्ज था। जमीन की बाकायदा रजिस्ट्री हुई है। कुछ लोगों को बैंक से घर बनवाने के लिए लोन भी मिला था। इसी तरह के अन्य मामले भी हैं, जिसमें लोगों के घर बनाने के बाद जीडीए की नोटिस पहुंची। लच्छीपुर के अलावा मानबेला की करीब 12 एकड़ जमीन, खोराबार में भी 10 एकड़ से अधिक जमीन पर भी प्राधिकरण का नाम नहीं दर्ज हो सका है। इनमें से कई भूखंड, अधिग्रहण के बाद भी मूल काश्तकार बेच चुके हैं।
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कमिश्नर की सख्ती के बाद हरकत में आया जीडीए
अधिग्रहण होने के बाद भी जमीन के अभिलेखों में जीडीए का नाम समय से दर्ज नहीं होने की वजह से तमाम लोग ठगे जा रहे हैं। ऐसे मामलों में प्राय: एक आम व्यक्ति जमीन या मकान खरीदने के लिए जब खतौनी निकलवाता है तो उसपर काश्तकार का ही नाम दर्ज रहने से वह भ्रमित हो जाता है। उन्हें परेशान होना पड़ता है। इस तरह की शिकायतें कमिश्नर रवि कुमार एनजी के पास भी पहुंची थी। उन्होंने इसे गंभीरता से लेते हुए जीडीए उपाध्यक्ष को जीडीए की हर जमीन पर नाम दर्ज कराने को कहा जिसके बाद अभियान चलाया जा रहा है।
एसएलओ कार्यालय के भरोसे बैठा रहा जीडीए
मुआवजा नहीं देने के पीछे जीडीए से लेकर एसएलओ दफ्तर और तहसील प्रशासन तक की गलती है। जमीन अधिग्रहण के समय काश्तकारों को मुआवजा देने के लिए जीडीए एसएलएओ कार्यालय को धन उपलब्ध करा देता है। एसएलएओ के यहां से परवाना भेजकर तहसील में काश्तकार का नाम काटकर जीडीए का नाम दर्ज करने को कहा जाता है। जितनी भी जमीन जीडीए ने अधिग्रहीत की थी, उसमें से ज्यादातर में एसएलएओ की ओर से परवाना भेजा गया था लेकिन तहसील में नाम नहीं दर्ज किया गया। मगर न तो एसएलओ और न ही जीडीए ने वर्षों तक यह जांचना जरूरी समझा कि जमीन के दस्तावेजों पर काश्तकार का नाम काटकर प्राधिकरण का नाम चढ़ा या नहीं।
जीडीए उपाध्यक्ष आशीष कुमार ने बताया कि जीडीए की तरफ से पूर्व में अधिगृहीत भूखंडों में से कुछ के राजस्व अभिलेखों पर प्राधिकरण का नाम नहीं चढ़ पाया है। अभियान चलाकर ऐसे भूखंडों के दस्तावेजों पर नाम चढ़वाए जा रहे हैं। कई भूखंडों के मामले में एसएलएओ कार्यालय को पत्र लिखा गया है। सभी भूखंडों पर नाम दर्ज होने तक यह प्रक्रिया जारी रहेगी।
एसएलओ कार्यालय के भरोसे बैठा रहा जीडीए
मुआवजा नहीं देने के पीछे जीडीए से लेकर एसएलओ दफ्तर और तहसील प्रशासन तक की गलती है। जमीन अधिग्रहण के समय काश्तकारों को मुआवजा देने के लिए जीडीए एसएलएओ कार्यालय को धन उपलब्ध करा देता है। एसएलएओ के यहां से परवाना भेजकर तहसील में काश्तकार का नाम काटकर जीडीए का नाम दर्ज करने को कहा जाता है। जितनी भी जमीन जीडीए ने अधिग्रहीत की थी, उसमें से ज्यादातर में एसएलएओ की ओर से परवाना भेजा गया था लेकिन तहसील में नाम नहीं दर्ज किया गया। मगर न तो एसएलओ और न ही जीडीए ने वर्षों तक यह जांचना जरूरी समझा कि जमीन के दस्तावेजों पर काश्तकार का नाम काटकर प्राधिकरण का नाम चढ़ा या नहीं।
जीडीए उपाध्यक्ष आशीष कुमार ने बताया कि जीडीए की तरफ से पूर्व में अधिगृहीत भूखंडों में से कुछ के राजस्व अभिलेखों पर प्राधिकरण का नाम नहीं चढ़ पाया है। अभियान चलाकर ऐसे भूखंडों के दस्तावेजों पर नाम चढ़वाए जा रहे हैं। कई भूखंडों के मामले में एसएलएओ कार्यालय को पत्र लिखा गया है। सभी भूखंडों पर नाम दर्ज होने तक यह प्रक्रिया जारी रहेगी।