Father's Day 2022: वृद्धाश्रम के बुजुर्गों की दास्तां, तकलीफों का शिकवा नहीं, बच्चों की फिक्र सताती है
आज फादर्स डे है। हर जगह बच्चे अपने पिता के साथ इस दिन को सेलिब्रेट कर रहे हैं। मगर उनका फादर्स डे कैसा होगा? जिनके बच्चों ने उन्हें वृद्धा आश्रम में रहने के लिए मजबूर कर दिया।
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पूरे विश्व में आज फादर्स डे मनाया जा रहा है। हर जगह बच्चे अपने पिता के साथ इस दिन को मना कर रहे हैं। मगर उनका फादर्स डे कैसा होगा? जिनके बच्चों ने उन्हें वृद्धा आश्रम में रहने के लिए मजबूर कर दिया। भरा पूरा परिवार होने के बाद भी कई बुजुर्ग वृद्धा आश्रम में अपनी जिंदगी काटने के लिए मजबूर है। फादर्स डे पर अमर उजाला ने उन पिताओं से बात की जिनके बच्चों ने उन्हें वृद्धाआश्रम में छोड़ दिया है। जब उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई तो मन विचलित हो उठा।
जिसकी उंगलियों को पकड़कर बचपन में चलना सीखा, आज उन्हीं को तमाम बच्चों ने अनजान सफर पर छोड़ दिया। हाल-चाल, सेहत की फिक्र तो दूर इन बच्चों ने तो पांच-दस साल में पलटकर उनकी सूरत तक नहीं देखी। इन बुजुर्गों को भी इस बात का उतना मलाल नहीं कि आखिरी पड़ाव पर जब उन्हें सहारे की जरूरत थी, बच्चों ने उनका साथ छोड़ दिया। उनकी निगाहें तो अभी भी अपने लाल की एक झलक पाने को ही तरस रही हैं।
ये दास्तां गोकुलधाम वृद्धाश्रम में रहने वाले कई बुजुर्ग पिता की है। इस आश्रम में 80 बुजुर्ग महिला-पुरुष हैं, जिसमें 51 पुरुष हैं। इनमें ज्यादातर की एक ही सबसे बड़ी चाह है कि वे अपने बच्चों की सूरत देख सकें। उनका कहना है कि लंबे समय से अकेले रहते-रहते अब उन्हें आदत सी पड़ गई है। गिला-शिकवा पर उन्हें कोई संवाद नहीं करना। सिर्फ एक ही चाहत है कि कोई एक बार उनके बच्चों की सूरत दिखा दे ताकि ये तसल्ली हो जाए कि वे ठीक हैं।
केस-1
सिद्धार्थनगर निवासी जय प्रकाश ने बताया कि भरा-पूरा परिवार है मेरा। पत्नी भी स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थीं। बेटा प्राइवेट नौकरी करता था। आठ महीने पहले मुझे क्यों वृद्धाश्रम छोड़ आया पता नहीं। पता करना भी नहीं है। बस एक ही प्रार्थना है कि बेटा-बहू और पत्नी जहां भी हों। कुशल रहे। बेटे का चेहरा देखने की इच्छा होती है।
केस-2
राम जानकी नगर निवासी कुंज बिहारी ने कहा करोड़ों की संपत्ति थी। बेटा बस चलवाता है। कभी कोई कमी नहीं महसूस हुई। जब तक ताकत थी खुद भी मेडिकल स्टोर का संचालन करता था। मगर जैसे ही ताकत गई, अपनों ने मुंह मोड़ लिया। घर वालों ने वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। अब किसी से कोई शिकायत नहीं रही। बेटे की चिंता रहती है।
केस - 3
बड़हलगंज निवासी गुलाब चंद ने बताया कि दो बेटा और एक बेटी है। सभी की शादी हो गई। सब्जी बेचकर जीवन यापन करता था। जितना बन पड़ता था मेहनत कर परिवार का पालन-पोषण करने में जुटा रहा। मगर जैसे ही उम्र, मेहनत में बाधा बनने लगी, सभी ने मुंह मोड़ लिया। शायद मैं बोझ बन गया। अब तो यह आश्रम ही मेरा परिवार है। एक ही चाह है कि बच्चे जहां रहें, खुश रहें।