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1998 के बाढ़ ने दिया जख्म: नदी में विलीन हो गया था घर, 23 साल से ऐसे जीवन बीता रहे ये 14 परिवार
Tue, 22 Jun 2021 05:47 PM IST
vivek shukla
सुरेंद्र वत्स, रुद्रपुर (देवरिया)।
सुरेंद्र वत्स, रुद्रपुर (देवरिया)।
Published by: vivek shukla
Updated Tue, 22 Jun 2021 05:47 PM IST
सार
दो दशक से बांध के किनारे रात काट रहा 14 विस्थापितों का परिवार, नदी में विलीन हो गया था पटवनिया का सचौली टोला, नहीं हुई बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास की व्यवस्था।
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deoria flood
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में राप्ती और गोर्रा नदी के संगम तट स्थित बेलुआरघाट पर बांध के किनारे फूस की झोपड़ी में रात काट रहे 14 परिवारों के विस्थापन की दर्दनाक कहानी सिहरन पैदा करने वाली है। उन्हें बाढ़ की विभीषिका से मिला जख्म नासूर बनता जा रहा है। वह 23 साल से तंगहाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं। नदी के कोप से आशियाना उजड़ने के 23 साल बीतने के बाद भी उनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं हुई।
एकौना थाना क्षेत्र के सचौली पटवनिया गांव का सचौली नाम वर्ष 1998 की प्रलयंकारी बाढ़ में मिट गया। सचौली टोले पर 14 परिवार मकान बनाकर आबाद थे। 98 में आए सैलाब से पूरा मजरा नदी में विलीन हो गया। नदी के संगम तट पर बसा सचौली टोले का नामोनिशान मिटने के बाद वहां रहने वाले परिवारों को दर-दर भटकना पड़ा।
बाढ़ राहत शिविर में साल भर बिताने के बाद भी उनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं हुई। थक हार कर सचौली गांव के बाढ़ पीड़ितों को नकइल गांव के बेलुआरघाट में बंधे के किनारे ठौर तलाशना पड़ा। यहां डहरौली नकइल बांध के किनारे फूस की झोपड़ी डालकर गुजर-बसर कर रहे बाढ़ पीड़ितों को विस्थापन के 23 साल बाद भी स्थायी ठिकाना नहीं मिला। उनकी ग्राम सभा बदलने के बाद न तो उन्हें आवासीय पट्टा मिला और न ही नकइल की नागरिकता मिली। वर्ष 98 की बाढ़ के विस्थापित आज भी सचौली पटवनिया के निवासी हैं, लेकिन उनका ठिकाना नकइल गांव के किनारे बंधा बना है।
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97 वर्ष के बुजुर्ग रामनक्षत्र ने कहा कि नदी के किनारे उजड़ने और बसने में जिंदगी तबाह हो रही है। यहां 14 परिवारों को नर्क भोगना पड़ रहा है। बाढ़ के जख्म से उबरने की कोशिश कामयाब नहीं हो पा रही है। मुफलिसी में जिंदगी काटना सचौली से उजड़े लोगों की नियती बन गई है।
कलावती, रजवंती, शेषनाथ, इमिरती, बनवारी, राजनाथ, वीरप्रताप, राणाप्रताप, अर्जुन, धनेश, रामनरेश, रविंदर, राजेश, मिठाई, बाबूलाल, रामराज, राधेश्याम और रामाश्रय आदि विस्थापितों ने सरकार से उनके पुनर्वास की मांग की है। इस बाबत एसडीएम संजीव कुमार उपाध्याय ने कहा कि सचौली पटवनिया के विस्थापितों की जांच कराकर नियमानुसार उनके पुनर्वास और सरकारी सहायता की व्यवस्था की जाएगी।
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एकौना थाना क्षेत्र के सचौली पटवनिया गांव का सचौली नाम वर्ष 1998 की प्रलयंकारी बाढ़ में मिट गया। सचौली टोले पर 14 परिवार मकान बनाकर आबाद थे। 98 में आए सैलाब से पूरा मजरा नदी में विलीन हो गया। नदी के संगम तट पर बसा सचौली टोले का नामोनिशान मिटने के बाद वहां रहने वाले परिवारों को दर-दर भटकना पड़ा।
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बाढ़ राहत शिविर में साल भर बिताने के बाद भी उनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं हुई। थक हार कर सचौली गांव के बाढ़ पीड़ितों को नकइल गांव के बेलुआरघाट में बंधे के किनारे ठौर तलाशना पड़ा। यहां डहरौली नकइल बांध के किनारे फूस की झोपड़ी डालकर गुजर-बसर कर रहे बाढ़ पीड़ितों को विस्थापन के 23 साल बाद भी स्थायी ठिकाना नहीं मिला। उनकी ग्राम सभा बदलने के बाद न तो उन्हें आवासीय पट्टा मिला और न ही नकइल की नागरिकता मिली। वर्ष 98 की बाढ़ के विस्थापित आज भी सचौली पटवनिया के निवासी हैं, लेकिन उनका ठिकाना नकइल गांव के किनारे बंधा बना है।
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97 वर्ष के बुजुर्ग रामनक्षत्र ने कहा कि नदी के किनारे उजड़ने और बसने में जिंदगी तबाह हो रही है। यहां 14 परिवारों को नर्क भोगना पड़ रहा है। बाढ़ के जख्म से उबरने की कोशिश कामयाब नहीं हो पा रही है। मुफलिसी में जिंदगी काटना सचौली से उजड़े लोगों की नियती बन गई है।
कलावती, रजवंती, शेषनाथ, इमिरती, बनवारी, राजनाथ, वीरप्रताप, राणाप्रताप, अर्जुन, धनेश, रामनरेश, रविंदर, राजेश, मिठाई, बाबूलाल, रामराज, राधेश्याम और रामाश्रय आदि विस्थापितों ने सरकार से उनके पुनर्वास की मांग की है। इस बाबत एसडीएम संजीव कुमार उपाध्याय ने कहा कि सचौली पटवनिया के विस्थापितों की जांच कराकर नियमानुसार उनके पुनर्वास और सरकारी सहायता की व्यवस्था की जाएगी।