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Exclusive: स्वामीनाथन से सीखीं बारीकियां, दोगुना हो गई 'कालानमक' की पैदावार

Sat, 30 Sep 2023 03:29 PM IST
vivek shukla टीपी, शाही, गोरखपुर।
टीपी, शाही, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 30 Sep 2023 03:29 PM IST
सार

डॉ. चौधरी ने बताया कि रिसर्च कर काला नमक की बावनी प्रजाति-101 को विकसित किया। उसे किसानों को दिया गया, उत्पादन तो बढ़ा पर किसान कहने लगे कि इसका रंग भूरा है। फिर नया रिसर्च किया और नई प्रजाति तैयार की। उसे नाम दिया गया काला नमक-102

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Dr Ramchet Chaudhary doubled rice yield with new variety
कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामचेत चौधरी - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

पूरी दुनिया में आज काला नामक चावल की महक गूंज रही है। लेकिन इसे नकदी फसल के रूप पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाने वाले कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामचेत चौधरी को नई प्रजाति की खोज करने की प्रेरणा हरित क्रांति के जनक डॉ. एमएस स्वामीनाथन से मिली। उनसे ही डॉ. चौधरी ने बारीकियां सीखीं और काला नमक की नई प्रजाति का ईजाद कर पैदावार दोगुनी कर दी।

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पहले काला नमक की पैदावार एक एकड़ में लगभग 10 क्विंटल होती थी, अब उतनी ही जमीन में 20 क्विंटल पैदावार होती है। इसका नतीजा यह है कि किसानों ने काला नमक की खेती को तवज्जो देना शुरू कर दिया और 80 हजार हेक्टेयर रक्बा में आज बुवाई होती है।
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डॉ. रामचेत चौधरी ने बताया कि डॉ. एमएस स्वामीनाथन से उनकी मुलाकात कंबोडिया में हुई थी। डॉ. एमएस स्वामीनाथन अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान मनीला, फिलिपिंस के डायरेक्टर के रूप में कार्यरत थे और उसी समय वह आईआरआरआई, कंबोडिया में डायरेक्टर के रूप में आ गए। उस दौरान कंबोडिया में चावल का उत्पादन बहुत कम होता था। लेकिन डॉ. स्वामीनाथन के प्रयास से कंबोडिया 10 साल में ही चावल के मामले में आत्मनिर्भर बन गया और निर्यातक देश भी बन गया। उन्होंने डॉ. स्वामीनाथन के साथ दो साल तक काम किया। उन्हें आईआरआई में पादप प्रजनक के पद पर तैनाती मिली थी।
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चौधरी ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ से 2006 से सेवानिवृत्त होने के बाद जब वह भारत आए तो सबसे पहले उन्होंने पीआरडीएफ संस्था का रजिस्ट्रेशन कराया। उसके बाद काला नमक धान पर पूर्णकालिक कार्य शुरू किया। सबसे पहले पूर्वांचल के विभिन्न गांवों से 2500 नमूने किसानों से एकत्र किए। अनुसंधान के लिए सभी नमूनों को अलग-अलग खेत में दो से तीन लाइन में रोपा गया। धान की कटाई के बाद सभी धानों का अलग-अलग सुगंध था।

उन्होंने बताया कि सभी की बालियों के निकलने का समय भी अलग था। एक धान का नमूना अच्छा लगा। उसका नाम दिया एन-3 और खलीलाबाद अनुसंधान केंद्र पर रिसर्च कर उसका बीज पैदा किया गया। अगले साल बुवाई के लिए किसानों को दिया गया। जब किसानों ने रोपाई की तो पहले जैसी सुगंध थी। लेकिन पैदावार एक एकड़ में 10 क्विंटल से कम था। डंठल बड़ा होने से वह गिर जा रहा है।

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तीन शोध के बाद मिला किरन कालानमक-बावनी

डॉ. चौधरी ने बताया कि रिसर्च कर काला नमक की बावनी प्रजाति-101 को विकसित किया। उसे किसानों को दिया गया, उत्पादन तो बढ़ा पर किसान कहने लगे कि इसका रंग भूरा है। फिर नया रिसर्च किया और नई प्रजाति तैयार की। उसे नाम दिया गया काला नमक-102 और इसका रिस्पांस बहुत बेहतर मिला। सैकड़ों किसानों को उसका बीज देकर उनकी राय जानी।

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किसानों ने कहा कि सब ठीक है। लेकिन जब राइस मिल में धान गया तो टूटन ज्यादा निकला। उसके बाद नई प्रजाति किरन विकसित की गई और नाम दिया गया किरन कालानमक-बावनी। इस समय यह काला नमक की सबसे बेहतर प्रजाति है। इसमें सुगंध बहुत बढि़या और चावल मुलायम होता है। एक हेक्टेयर में इसका उत्पादन 50 क्विंटल हो रहा है।

 
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