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ऑनलाइन क्लास करना पड़ रहा है भारी, मोबाइल फोन के अधिक इस्तेमाल से बच्चे हो रहे बीमार

Tue, 01 Sep 2020 11:51 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Tue, 01 Sep 2020 11:51 AM IST
सार

  • नोमोफोबिया के अलावा, नींद न आने और आंखों में सूखेपन की भी मिल रहीं शिकायतें
  • डॉक्टरों के मुताबिक, अभिभावकों को सजग रहने की जरूरत, काउंसिलिंग कराएं

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Children getting sick due to excessive use of mobile phones
online class - फोटो : पीटीआई

विस्तार

ऑनलाइन क्लास के लिए बच्चों के हाथ में मोबाइल फोन आया, तो इसके दुष्प्रभाव भी दिखने शुरू हो गए हैं। क्लास के खत्म होने के बाद भी उनका मोबाइल फोन से मोह नहीं छूट रहा है। यही वजह है कि नींद में भी उन्हें मोबाइल फोन पर संदेश आने का आभास हो रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह एक तरह की मानसिक समस्या  (नोमोफोबिया) है। अभिभावकों को सजग रहने की जरूरत है। काउंसिलिंग से इसपर काबू पाया जा सकता है।

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कोरोना महामारी के बीच किशोर और किशोरियों को छह से आठ घंटे मोबाइल फोन स्क्रीन पर ऑनलाइन पढ़ाई करनी पड़ रही है। सोशल साइट व अन्य गतिविधियों को लेकर इसके बाद भी बच्चे मोबाइल फोन से ही चिपके रहते हैं। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग में इस तरह की शिकायतें कई अभिभावकों ने की हैं। कई किशोरों की काउंसिलिंग भी कराई गई है। कई फोन पर ही डॉक्टरों से सलाह ले रहे हैं।
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ये हैं नोमोफोबिया के लक्षण
बीआरडी के मनोविज्ञान विभाग के एचओडी डॉ. तपस ने बताया कि किशोरों में नोमोफोबिया के लक्षण सबसे अधिक पाए जाते हैं। ऑनलाइन क्लास शुरू होने के बाद किशोरों में यह तेजी से बढ़ा है। बार-बार मोबाइल फोन के नोटिफिकेशन को चेक करना, किसी दूसरे का मोबाइल फोन बजने पर खुद का फोन चेक करना, नींद खुलते ही मोबाइल चेक करना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं। कई बच्चे अनिद्रा और आंखों के सूखेपन की भी शिकायत कर रहे हैं। उन्हें आंखों के डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी जा रही है। 

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इन तरीकों से हो सकता है बचाव

डॉ. तपस ने बताया कि ऑनलाइन क्लास के बाद हो सके तो बच्चों को तत्काल मोबाइल फोन से दूर कर दें। क्लास के बाद परिवार के लोग उनसे बात करें। बच्चों को सोशल साइट्स से दूर रहने की सलाह दें। उन्हें समझाएं। बताया कि ऐसी स्थिति में किसी दवा की जरूरत नहीं है। बेहतर काउंसिलिंग के जरिए उनकी इन आदतों को दूर किया जा सकता है।

उदाहरण के ये दो केस पढ़ें-
  • केस-1
रुस्तमपुर के रहने वाले प्रशांत जायसवाल ने बच्चे के ऑनलाइन क्लास के लिए उसे नया मोबाइल फोन खरीद कर दिया। क्लास खत्म होते ही बच्चा सोशल साइट पर व्यस्त हो जाता था। इसकी वजह से उसे नींद न आने की शिकायत होने लगी। डॉक्टरों ने काउंसिलिंग की और बताया कि बच्चा नोमोफोबिया का शिकार है।
  • केस-2
राजेंद्र नगर के रहने वाले शिक्षक संजय द्विवेदी का बेटा ऑनलाइन क्लास के बाद दोस्तों का एक व्हाट्स ग्रुप बनाकर चैटिंग करने लगा। बीच-बीच में वह जोर-जोर से हंसने भी लगता था। नींद खुलते ही वह पहले मैसेज को चेक करता है। परिजन डॉक्टर के पास ले गए। काउंसिलिंग के दौरान पता चला कि उसे नोमोफोबिया हुआ है। इसके बाद परिजन क्लास के बाद बच्चे का मोबाइल फोन अपने पास रख लेते हैं।    
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