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आंसुओं को दहेज उत्पीड़न का सबूत नहीं माना जा सकता : हाईकोर्ट
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- दहेज मृत्यु के मामले में हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में पति और ससुराल वालों को किया आरोपमुक्त
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में मृतका के पिता की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल यह तथ्य कि एक महिला को रोते हुए देखा गया, इसे दहेज उत्पीड़न का सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पति और उसके परिवार वालों को दहेज मृत्यु और क्रूरता के मामले में बरी कर दिया।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि मृतका के भाई और बहन के बयानों में उत्पीड़न या दहेज की मांग का कोई प्रारंभिक मामला सामने नहीं आया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि मृतका की बहन ने अपने बयान में कहा कि होली के अवसर पर उसने अपनी बहन को फोन किया था। उस समय वह रो रही थी, लेकिन केवल रोने का तथ्य अपने आप में दहेज उत्पीड़न का कोई मामला नहीं बनाता। मामला शशि की मृत्यु से संबंधित है, जिनकी शादी 5 दिसंबर 2010 को भगवान स्वरूप से हुई थी। शशि के पिता, गैंडा लाल, जो एक ऑटो-रिक्शा चालक हैं, ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी को पति और ससुराल वाले दहेज के लिए परेशान करते थे। उन्होंने दावा किया कि आरोपियों ने सोने का कंगन, मोटरसाइकिल और नकदी की मांग की थी। शशि की दूसरी बेटी के जन्म के बाद ये मांगें और तेज हो गईं। 31 मार्च 2014 को शशि की मृत्यु हो गई। 4 अप्रैल 2014 को संगम विहार थाने में एफआईआर दर्ज की गई। जांच के बाद, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने मेडिकल साक्ष्य के आधार पर आरोपियों को बरी कर दिया, जिसमें पाया गया कि शशि की मृत्यु निमोनिया से हुई थी, जो एक प्राकृतिक कारण था। बाद में, मजिस्ट्रेट ने भी आरोपों को अस्पष्ट और असंगत पाते हुए आरोपियों को बरी कर दिया। यह आदेश जिला और सत्र न्यायाधीश ने बरकरार रखा, जिसके बाद याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में मृतका के पिता की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल यह तथ्य कि एक महिला को रोते हुए देखा गया, इसे दहेज उत्पीड़न का सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पति और उसके परिवार वालों को दहेज मृत्यु और क्रूरता के मामले में बरी कर दिया।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि मृतका के भाई और बहन के बयानों में उत्पीड़न या दहेज की मांग का कोई प्रारंभिक मामला सामने नहीं आया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि मृतका की बहन ने अपने बयान में कहा कि होली के अवसर पर उसने अपनी बहन को फोन किया था। उस समय वह रो रही थी, लेकिन केवल रोने का तथ्य अपने आप में दहेज उत्पीड़न का कोई मामला नहीं बनाता। मामला शशि की मृत्यु से संबंधित है, जिनकी शादी 5 दिसंबर 2010 को भगवान स्वरूप से हुई थी। शशि के पिता, गैंडा लाल, जो एक ऑटो-रिक्शा चालक हैं, ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी को पति और ससुराल वाले दहेज के लिए परेशान करते थे। उन्होंने दावा किया कि आरोपियों ने सोने का कंगन, मोटरसाइकिल और नकदी की मांग की थी। शशि की दूसरी बेटी के जन्म के बाद ये मांगें और तेज हो गईं। 31 मार्च 2014 को शशि की मृत्यु हो गई। 4 अप्रैल 2014 को संगम विहार थाने में एफआईआर दर्ज की गई। जांच के बाद, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने मेडिकल साक्ष्य के आधार पर आरोपियों को बरी कर दिया, जिसमें पाया गया कि शशि की मृत्यु निमोनिया से हुई थी, जो एक प्राकृतिक कारण था। बाद में, मजिस्ट्रेट ने भी आरोपों को अस्पष्ट और असंगत पाते हुए आरोपियों को बरी कर दिया। यह आदेश जिला और सत्र न्यायाधीश ने बरकरार रखा, जिसके बाद याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई।
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