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Ghaziabad News: आधे से ज्यादा उम्मीदवारों पर भारी पड़ रहा नोटा
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गाजियाबाद। गाजियाबाद लोकसभा सीट पर उपरोक्त में से कोई नहीं यानी नोटा भी उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दे रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 13 में से नौ उम्मीदवारों को नोटा से कम वोट मिले। 2014 में 16 में से पांच उम्मीदवार ही नोटा से ज्यादा वोट हासिल कर सके। भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा और आम आदमी पार्टी को छोड़ दें तो न तो अन्य किसी दल का उम्मीदवार और न ही निर्दलीय नोटा से ज्यादा वोट ला सके हैं।
चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव में नोटा का विकल्प 2014 में दिया था। अगर किसी मतदाता को चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों में से कोई पसंद नहीं है तो वह इस विकल्प का इस्तेमाल कर सकता है। इससे यह भी पता चलता है कि कितने लोग एक भी उम्मीदवार को पसंद नहीं कर रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है। गाजियाबाद लोकसभा सीट पर 2014 में 6,205 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। 2019 के चुनाव में 7,497 ने नोटा का इस्तेमाल किया।
2014 के चुनाव में भाजपा के वीके सिंह, बसपा के मुकुल उपाध्याय, कांग्रेस के राज बब्बर, सपा से सुधन रावत और आम आदमी पार्टी की शाजिया इल्मी को छोड़कर अन्य सभी उम्मीदवारों को नोटा से कम वोट मिले थे। 2019 के चुनाव में नोटा से ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवारों में भाजपा के वीके सिंह, सपा के सुरेश बंसल और कांग्रेस की डाॅली शर्मा रहीं।
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नोटा से कम वोट पाने वाले उम्मीदवार
2019
अशोक शर्मा (2,454 वोट), दिव्य योग माया सारस्वत (929), नागेंद्र कुमार (719), मोहन लाल (1,153), राकेश सूरी (713), सलीम अहमद (807), सुनील नायर (3,949), सेवाराम कसाना (4,384), अमित शर्मा (2,439)।
(नोटा 7,497)
2014
नरेश गौतम (1,548 वोट), सुरेश पाल (1,591), केशव चौधरी (628), नितिन (624), रामफल शाक्य (1,094), रिंकू कुमार त्यागी (1,185), विनोद कुमार त्यागी (992), सलीम मलिक (1,486), साबिर (3,409) और संजीव कुमार (4,639)।
(नोटा 6,205)
चुनाव पर असर नहीं
भारत से पहले 13 देशों में नोटा का इस्तेमाल हो रहा था। इनमें कई देश में नोटा को सबसे अधिक वोट मिलने पर चुनाव रद्द हो जाने का प्रावधान है लेकिन, भारत में ऐसा नहीं है। चुनाव आयोग स्पष्ट कर चुका है कि नोटा के वोट सिर्फ गिने जाने के लिए हैं। इन्हें रद्द मतों की श्रेणी में रखा गया है। चुनाव का परिणाम नामांकन करने वाले उम्मीदवारों को मिले वोट से ही तय होता है। इसका अर्थ यह है कि अगर नोटा को सभी उम्मीदवारों से ज्यादा वोट मिल जाएं तो भी चुनाव पर इसका असर नहीं होगा।
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चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव में नोटा का विकल्प 2014 में दिया था। अगर किसी मतदाता को चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों में से कोई पसंद नहीं है तो वह इस विकल्प का इस्तेमाल कर सकता है। इससे यह भी पता चलता है कि कितने लोग एक भी उम्मीदवार को पसंद नहीं कर रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है। गाजियाबाद लोकसभा सीट पर 2014 में 6,205 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। 2019 के चुनाव में 7,497 ने नोटा का इस्तेमाल किया।
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2014 के चुनाव में भाजपा के वीके सिंह, बसपा के मुकुल उपाध्याय, कांग्रेस के राज बब्बर, सपा से सुधन रावत और आम आदमी पार्टी की शाजिया इल्मी को छोड़कर अन्य सभी उम्मीदवारों को नोटा से कम वोट मिले थे। 2019 के चुनाव में नोटा से ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवारों में भाजपा के वीके सिंह, सपा के सुरेश बंसल और कांग्रेस की डाॅली शर्मा रहीं।
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नोटा से कम वोट पाने वाले उम्मीदवार
2019
अशोक शर्मा (2,454 वोट), दिव्य योग माया सारस्वत (929), नागेंद्र कुमार (719), मोहन लाल (1,153), राकेश सूरी (713), सलीम अहमद (807), सुनील नायर (3,949), सेवाराम कसाना (4,384), अमित शर्मा (2,439)।
(नोटा 7,497)
2014
नरेश गौतम (1,548 वोट), सुरेश पाल (1,591), केशव चौधरी (628), नितिन (624), रामफल शाक्य (1,094), रिंकू कुमार त्यागी (1,185), विनोद कुमार त्यागी (992), सलीम मलिक (1,486), साबिर (3,409) और संजीव कुमार (4,639)।
(नोटा 6,205)
चुनाव पर असर नहीं
भारत से पहले 13 देशों में नोटा का इस्तेमाल हो रहा था। इनमें कई देश में नोटा को सबसे अधिक वोट मिलने पर चुनाव रद्द हो जाने का प्रावधान है लेकिन, भारत में ऐसा नहीं है। चुनाव आयोग स्पष्ट कर चुका है कि नोटा के वोट सिर्फ गिने जाने के लिए हैं। इन्हें रद्द मतों की श्रेणी में रखा गया है। चुनाव का परिणाम नामांकन करने वाले उम्मीदवारों को मिले वोट से ही तय होता है। इसका अर्थ यह है कि अगर नोटा को सभी उम्मीदवारों से ज्यादा वोट मिल जाएं तो भी चुनाव पर इसका असर नहीं होगा।