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Faridabad News: श्रद्धा और उत्साह से मनाया उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला
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परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और बच्चों की दीर्घायु की कामना करते हुए पूजा-अर्चना की
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। जिले में उत्तराखंड का पारंपरिक लोकपर्व हरेला श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। शहर में रहने वाले बड़ी संख्या में उत्तराखंड मूल के लोगों ने अपने घरों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से इस पर्व का आयोजन किया। सुख-दुख संघर्ष एवं सहायता टीम की ओर से भी हरेला पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और बच्चों की दीर्घायु की कामना करते हुए पूजा-अर्चना की गई।
टीम के अध्यक्ष प्रेम बिष्ट ने बताया कि हरेला उत्तराखंड का प्रमुख लोकपर्व है, जिसका अर्थ हरियाली और समृद्धि से है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है और सावन मास में मनाया जाता है। इसकी तैयारियां करीब दस दिन पहले शुरू हो जाती हैं। एक टोकरी में साफ मिट्टी भरकर उसमें गेहूं, जौ, धान, मक्का, उड़द, गहत और सरसों सहित पांच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। इनकी प्रतिदिन पूजा कर जल अर्पित किया जाता है।
उत्तराखंड के लोगों ने बताया कि श्रावण संक्रांति के दिन तैयार हरेला सबसे पहले क्षेत्रपाल देवता को अर्पित किया जाता है और अच्छी कृषि उपज की कामना की जाती है। इसके बाद परिवार के बड़े-बुजुर्ग बच्चों और अन्य सदस्यों के सिर व कान पर हरेला रखकर उन्हें सुख, समृद्धि और लंबी आयु का आशीर्वाद देते हैं। अंत में हरेला को घर के मुख्य द्वार पर लगाया जाता है, जिसे शुभ और मंगलकारी माना जाता है। प्रेम बिष्ट ने कहा कि हरेला केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण, हरियाली और पारिवारिक एकता का भी प्रतीक है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उत्तराखंड प्रवासियों ने भाग लेकर अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का संदेश दिया।
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फरीदाबाद। जिले में उत्तराखंड का पारंपरिक लोकपर्व हरेला श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। शहर में रहने वाले बड़ी संख्या में उत्तराखंड मूल के लोगों ने अपने घरों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से इस पर्व का आयोजन किया। सुख-दुख संघर्ष एवं सहायता टीम की ओर से भी हरेला पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और बच्चों की दीर्घायु की कामना करते हुए पूजा-अर्चना की गई।
टीम के अध्यक्ष प्रेम बिष्ट ने बताया कि हरेला उत्तराखंड का प्रमुख लोकपर्व है, जिसका अर्थ हरियाली और समृद्धि से है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है और सावन मास में मनाया जाता है। इसकी तैयारियां करीब दस दिन पहले शुरू हो जाती हैं। एक टोकरी में साफ मिट्टी भरकर उसमें गेहूं, जौ, धान, मक्का, उड़द, गहत और सरसों सहित पांच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। इनकी प्रतिदिन पूजा कर जल अर्पित किया जाता है।
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उत्तराखंड के लोगों ने बताया कि श्रावण संक्रांति के दिन तैयार हरेला सबसे पहले क्षेत्रपाल देवता को अर्पित किया जाता है और अच्छी कृषि उपज की कामना की जाती है। इसके बाद परिवार के बड़े-बुजुर्ग बच्चों और अन्य सदस्यों के सिर व कान पर हरेला रखकर उन्हें सुख, समृद्धि और लंबी आयु का आशीर्वाद देते हैं। अंत में हरेला को घर के मुख्य द्वार पर लगाया जाता है, जिसे शुभ और मंगलकारी माना जाता है। प्रेम बिष्ट ने कहा कि हरेला केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण, हरियाली और पारिवारिक एकता का भी प्रतीक है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उत्तराखंड प्रवासियों ने भाग लेकर अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का संदेश दिया।
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