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टेक्नोलॉजी के साथ मानवीय करुणा और सहानुभूति सीखें युवा : सुधा मूर्ति

Sat, 20 May 2023 12:09 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 20 May 2023 12:09 AM IST
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Youth should learn human compassion and empathy with technology: Sudha Murthy
चंडीगढ़। पंजाब यूनिवर्सिटी में लेखिका और समाजसेवी सुधा मूर्ति एसएस भटनागर ऑडिटोरियम में विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ शुक्रवार देर शाम रूबरू हुईं। एक छात्र के चैट जीपीटी और मानवीय रिश्तों के सवाल पर सुधा ने बताया कि चैट जीपीटी और टेक्नोलॉजी आपकी जिंदगी में किसी के खो जाने पर आपको आगे बढ़ने के रास्तों के जवाब और टिप्स दे सकती है, लेकिन वो आपको मानवीय अहसास नहीं दे सकती। टेक्नोलॉजी को स्वीकारो, लेकिन जिंदगी में संतुलन बनाकर रखो। टेक्नोलॉजी खाने की थाली में चावल की तरह है, लेकिन चावल के साथ आपको दाल-सब्जी, रायता, रोटी सब चाहिए। इसी तरह खासकर युवाओं को टेक्नोलॉजी के साथ मानवीय करुणा, सहानुभूति, बड़ों की इज्जत और दूसरों की मदद करना सीखना चाहिए। डीयूआई प्रो. रेणु विग उनके परिचय के दौरान उन्हें डॉ. सुधा के नाम से संबोधित कर रही थीं। इस दौरान सुधा मूर्ति ने कहा नाम के आगे डॉक्टर के लिए छात्र पांच से सात साल मेहनत करते हैं, मैंने ये नहीं कमाया है। मुझे पीयू की ओर से सम्मान दिया जा रहा है, मैं इसे स्वीकार करती हूं, लेकिन नाम के आगे मैं डॉक्टर बिना मेहनत के स्वीकार नहीं करती।
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पीयू की एक प्रोफेसर की ओर से घर और शिक्षण कार्य में बच्चों को संभालने पर पूछे गए सवाल पर सुधा ने बताया कि छात्र आपसे सीखते हैं। शिक्षक, अभिभावक रोल मॉडल हैं, इसलिए हम जैसा अपने बच्चों की परवरिश चाहते हैं, पहले खुद में वे गुण अपनाने चाहिए। शिक्षक कक्षा में छात्रों से हमेशा बातचीत करें, उन्हें जीवन मूल्य सीखाएं। बच्चों से सीखना सीखें, आजकल युवाओं के पास ज्ञान का भंडार है। उन्होंने बताया वे कक्षा में शिक्षण कार्य के दौरान पहले 15-20 कहानी सुनाती थीं और छात्रों से बात करती थीं। छात्रों से अपने बच्चों की तरह बात करती थीं, इसलिए वह उनकी पसंदीदा शिक्षिका बनीं। कक्षा में जाने से पहले अपने विषय पर कम से कम तीन से चार घंटे शोध करें, जिससे एक नयापन हो। बच्चों में अकादमिक होड़ और डिप्रेशन पर उन्होंने बताया कि यह अभिभावकों और हम समाज के सदस्यों की जिम्मेदारी हैं कि हम बच्चों पर अंकों और मेरिट का बोझ नहीं ढालें। मेरे पति उद्यमी हैं, इसका मतलब ये नहीं कि बच्चे भी यही पेशा अपनाएं। बच्चों को उनके सपनों के अनुसार उड़ने दो।
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ओपन हैंड के बैज को देख कहा- पीयू भी इसकी तरह खुल्लमखुल्ला
सुधा ने बातचीत के दौरान साड़ी पर लगे ओपनहैंड के बैज को दिखाते हुए दर्शकों को कहा कि पीयू का माहौल भी इसकी तरह खुल्लमखुल्ला है। उन्होंने अपने तय कार्यक्रम से अधिक समय दर्शकों के साथ बिताया और कहा उन्हें अच्छा लग रहा है, वे और बातचीत करना चाहती हैं। महिला मैकेनिकल इंजीनियर के सवाल पर जेआरडी टाटा को डिग्री खत्म होने के बाद लिखे पत्र के बारे में बताया कि पिछले महीने ही वे कंपनी गई थीं। वहां देखा कि लगभग 300 लड़कियां गाड़ी के निर्माण में कार्य कर रही थीं। उनमें एक लड़की उनके पास आकर बोली, मैम आपके महिलाओं के लिए इंजीनियरिंग में नौकरी नहीं होने के वर्षों पहले लिखे पत्र के कारण आज इतनी महिलाएं यहां हैं। हिम्मत के साथ पहला कदम आपने बढ़ाया और हमारे लिए रास्ते बने। सुधा ने बताया कि उन्हें उनके पिता ने सिखाया था कि महिलाएं पैदायशी बढ़िया मैनेजर होती हैं, महिलाओं को अपनी रुचि और लक्ष्य पहचानने की जरूरत है, ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहां महिलाएं काम नहीं कर सकतीं। समाजसेवा में आने के प्रश्न पर उन्होंने बताया कि जब वे 46 वर्ष की थीं, उस दौरान उनकी 15 वर्षीय बेटी अक्षता ने एक गरीब छात्र की पढ़ाई में मदद करने की मांग रखी थी और उसी दौरान सवाल पूछा कि मां आपका लक्ष्य क्या है। उस दौरान कॉलेज में पढ़ाती थी, लेकिन सवाल ने आठ दिन तक परेशान रखा और मैंने सोचा कि मेरा लक्ष्य क्या है। इसके बाद आठवें दिन मैंने नौकरी से इस्तीफा दिया और समाजसेवा को अपना लक्ष्य बनाया। इंजीनियरिंग करने के बाद लेखिका के सफर पर बताया कि जीवन के तर्जुबे और लोगों से मेल-मिलाप के अनुभव ही उनकी कहानियां होती हैं। विचार पहले आते हैं और बाद में भाषा में लेखनी का रूप लेते हैं।
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