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Chandigarh News: हरियाणा के 86 फीसदी बहुतकनीकी काॅलेजों में प्रिंसिपल नहीं
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-पांच साल से तकनीकी निदेशालय में अटकी सहायक प्रोफेसरों की पदोन्नति
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। हरियाणा में राजकीय शैक्षणिक काॅलेजों की तरह ही तकनीकी राजकीय काॅलेज भी प्रिंसिपल की बाट जोह रहे हैं। यहां आंकड़ा चौंकाने वाला है। प्रदेश के 86 फीसदी राजकीय तकनीकी काॅलेजों के पास प्रिंसिपल नहीं हैं। 14 फीसदी काॅलेजों में ही स्थायी प्रिंसिपल तैनात हैं। इनमें आधे प्रिंसिपल डेपुटेशन पर लिए गए हैं। काॅलेजों में प्रिंसिपल न होने से पांच साल से निदेशालय में विभागाध्यक्षों की पदोन्नति भी अटकी है। इसे लेकर कई बार एसोसिएशन भी मांग उठा चुकी है, लेकिन आज तक पदोन्नति नहीं हो पाई है।
हरियाणा में कुल कुल 27 राजकीय बहुतकनीकी काॅलेज हैं। मात्र 4 के पास ही स्थायी प्रिंसिपल हैं। इनमें 2 प्रिंसिपल डेपुटेशन पर हैं, जबकि 2 स्थायी हैं। 23 काॅलेजों में पद खाली पड़े हैं। कई सालों से पदोन्नति नहीं होने से काॅलेजों को मुखिया नहीं मिल पा रहे हैं। खास बात ये है कि तकनीकी काॅलेजों में प्रिंसिपल के पदों को सीधी भर्ती की बजाए पदोन्नति से भरा जाता है। मतलब इसके लिए हरियाणा लोक सेवा आयोग की ओर से भर्ती नहीं निकाली जाती है। काॅलेजों में लेक्चरर के बाद विभागाध्यक्ष और विभागाध्यक्ष के बाद सबसे वरिष्ठ लेक्चरर को प्रिंसिपल पद पर पदोन्नत किया जाता है। खास बात ये है कि पदोन्नति के बाद विभाग पर वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि पहले से ही विभागाध्यक्ष प्रिंसिपल स्केल में वेतन ले रहे हैं। केवल पद दिया जाना है। बावजूद इसके विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली के चलते पदोन्नति लटकी पड़ी हैं।
शिक्षा मंत्री बैठक दे चुके हैं निर्देश
पदोन्नति लटकने का यह मामला शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा के भी संज्ञान में आ चुका है। इसी सप्ताह उन्होंने लंबित पदोन्नति मामलों को लेकर तकनीकी निदेशालय के आला अधिकारियों की बैठक भी बुलाई थी। बैठक में तकनीकी निदेशालय के मामलों को लेकर फीडबैक लिया गया और समीक्षा की गई। शिक्षा मंत्री ने निर्देश दिए हैं कि किसी भी जायज पदोन्नति को न रोका जाए।
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बाक्स
प्रिंसिपल न होने से अटकते हैं जरूरी काम
बहुतकनीकी कालेजों में प्रिंसिपल नहीं होने के कई नुकसान हैं। एक तो अतिरिक्त चार्ज के तौर पर जिस भी विभागाध्यक्ष को यह जिम्मेदारी दी जाती है तो न तो दाखिलों के प्रति जवाबदेह है और न ही प्लेसमेंट को लेकर है। वह केवल काम चलाने के लिए जिम्मेदारी निभाता है। दूसरा, प्रिंसिपल नहीं होने के चलते संस्थान के कई जरूरी कार्य भी अटकते हैं।
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। हरियाणा में राजकीय शैक्षणिक काॅलेजों की तरह ही तकनीकी राजकीय काॅलेज भी प्रिंसिपल की बाट जोह रहे हैं। यहां आंकड़ा चौंकाने वाला है। प्रदेश के 86 फीसदी राजकीय तकनीकी काॅलेजों के पास प्रिंसिपल नहीं हैं। 14 फीसदी काॅलेजों में ही स्थायी प्रिंसिपल तैनात हैं। इनमें आधे प्रिंसिपल डेपुटेशन पर लिए गए हैं। काॅलेजों में प्रिंसिपल न होने से पांच साल से निदेशालय में विभागाध्यक्षों की पदोन्नति भी अटकी है। इसे लेकर कई बार एसोसिएशन भी मांग उठा चुकी है, लेकिन आज तक पदोन्नति नहीं हो पाई है।
हरियाणा में कुल कुल 27 राजकीय बहुतकनीकी काॅलेज हैं। मात्र 4 के पास ही स्थायी प्रिंसिपल हैं। इनमें 2 प्रिंसिपल डेपुटेशन पर हैं, जबकि 2 स्थायी हैं। 23 काॅलेजों में पद खाली पड़े हैं। कई सालों से पदोन्नति नहीं होने से काॅलेजों को मुखिया नहीं मिल पा रहे हैं। खास बात ये है कि तकनीकी काॅलेजों में प्रिंसिपल के पदों को सीधी भर्ती की बजाए पदोन्नति से भरा जाता है। मतलब इसके लिए हरियाणा लोक सेवा आयोग की ओर से भर्ती नहीं निकाली जाती है। काॅलेजों में लेक्चरर के बाद विभागाध्यक्ष और विभागाध्यक्ष के बाद सबसे वरिष्ठ लेक्चरर को प्रिंसिपल पद पर पदोन्नत किया जाता है। खास बात ये है कि पदोन्नति के बाद विभाग पर वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि पहले से ही विभागाध्यक्ष प्रिंसिपल स्केल में वेतन ले रहे हैं। केवल पद दिया जाना है। बावजूद इसके विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली के चलते पदोन्नति लटकी पड़ी हैं।
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शिक्षा मंत्री बैठक दे चुके हैं निर्देश
पदोन्नति लटकने का यह मामला शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा के भी संज्ञान में आ चुका है। इसी सप्ताह उन्होंने लंबित पदोन्नति मामलों को लेकर तकनीकी निदेशालय के आला अधिकारियों की बैठक भी बुलाई थी। बैठक में तकनीकी निदेशालय के मामलों को लेकर फीडबैक लिया गया और समीक्षा की गई। शिक्षा मंत्री ने निर्देश दिए हैं कि किसी भी जायज पदोन्नति को न रोका जाए।
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प्रिंसिपल न होने से अटकते हैं जरूरी काम
बहुतकनीकी कालेजों में प्रिंसिपल नहीं होने के कई नुकसान हैं। एक तो अतिरिक्त चार्ज के तौर पर जिस भी विभागाध्यक्ष को यह जिम्मेदारी दी जाती है तो न तो दाखिलों के प्रति जवाबदेह है और न ही प्लेसमेंट को लेकर है। वह केवल काम चलाने के लिए जिम्मेदारी निभाता है। दूसरा, प्रिंसिपल नहीं होने के चलते संस्थान के कई जरूरी कार्य भी अटकते हैं।