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मंच पर रानी दुर्गावती के संघर्ष की गाथा को देखकर दर्शकों की आंखें हुईं नम

Sat, 12 Nov 2022 09:00 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Sat, 12 Nov 2022 09:00 AM IST
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Seeing the story of Rani Durgavati's struggle on the stage, the eyes of the audience became moist.
पंजाब कला भवन में नाटक का मंचन करते कलाकार। - फोटो : CHANDIGARH
चंडीगढ़। पंजाब कला भवन के सभागार के मंच पर शुक्रवार की शाम रानी दुर्गावती के संघर्ष की गाथा को देखकर दर्शकों की आंखें नम हो गईं। मौका था 17वें विंटर नेशनल थियेटर फेस्टिवल के 11वें दिन नाटक जागर के तहत विविध आयोजनों का। अभिनय करती महिलाओं ने रानी दुर्गावती की राजा अकबर से संघर्ष की कहानी को जीवंत करने का सफल प्रयास किया। इसमें कलाकारों की प्रस्तुति ने दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।
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इसमें दिखाया गया कि पति की मृत्यु के बाद रानी दुर्गावती स्वयं ही राजपाट संभालती हैं। उस दौरान राजा अकबर से जंग छिड़ जाने पर बहादुरी से युद्ध करती हैं और वीरगति को प्राप्त होती है। मंच पर हो रहे युद्ध के अभिनय ने दर्शकों के सामने युद्ध की विभीषक को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। इस दौरान बेजोड़ अभिनय के साथ नृत्य, लोक गीत व जागर में की गई प्रस्तुति ने अंत तक सभी को नाटक के साथ बांधे रखा। 11 कलाकारों व 4 संगीतकारों ने मिल उनके संघर्ष को पुनर्जीवित किया।
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इसी क्रम में अगली कड़ी के रूप में समकालीन, परंपरा तथा लोक कलाओं के विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें रंगमंच के विशेषज्ञों ने मौजूदा समय में थिएटर को लोक कला से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस बात पर अमल करते हुए जागर संगीत नाटक की प्रदर्शनी हुई। जागर महाराष्ट्र की लोक कला है जिसे शादियों में एक संस्कार के रूप में किया जाता है। जागर में भगवान का आह्वान करते हुए नृत्य आराधना की जाती है। इसके साथ ही पंजाब लोक व मार्शल आर्ट का मनमोहित प्रदर्शन देखने को मिला।
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सेमिनार के सभापति डॉ. शैलेश शर्मा ने बताया कि किस तरह से आज त्योहारों का बाजारीकरण हो रहा है। उनका कहना है कि लोक कला प्रकृति से जुड़ी है। इसमें व्यक्ति अपनी खुशी को कला द्वारा जाहिर करता है। लोक कलाएं जीवन में सहजता प्रदान करती हैं इसलिए जरूरी है कि हम अपनी परंपराओं, लोक कलाओं को अपने जीवन में लाएं। प्रो. अजय मलकानी ने कहा आज सिनेमा, टीवी, मीडिया रंगमंच पर हावी है। रंगमंच को जीवित रखने के लिए रंगमंच को स्थानीय लोक कलाओं के साथ जोड़ा जाए जिससे उसकी विशेषता बरकरार रहे। ऐसा करने से रंगमंच आम लोगों तक पहुंचेगा और इसमें नई चीजें करने की संभावना बढे़ंगी।
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