{"_id":"5d7b34ea8ebc3e93be633554","slug":"mental-disorder-treatment-in-pgi-chandigarh-its-not-like-bollywood-movies-electric-shock","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"फिल्मों में जैसा इलेक्ट्रिक शॉक देते हैं, वैसा असल जिंदगी में नहीं दिया जाता, सच जानने को खबर पढ़ें","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
फिल्मों में जैसा इलेक्ट्रिक शॉक देते हैं, वैसा असल जिंदगी में नहीं दिया जाता, सच जानने को खबर पढ़ें
Fri, 13 Sep 2019 12:11 PM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Fri, 13 Sep 2019 12:11 PM IST
विज्ञापन
मनोरोगी का इलाज
- फोटो : फाइल फोटो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फिल्मों में अकसर मनोरोगी को इलेक्ट्रिक शॉक देते दिखाया जाता है, लेकिन असल जिंदगी में वैसा नहीं किया जाता। फिल्मों में पागलखाने के सीन में अकसर दिखाया जाता है कि एक व्यक्ति जो मनोरोगी है, वह किसी के काबू में नहीं आता। बाद में कुछ कर्मचारी पकड़कर उसे एक कमरे में ले जाते हैं और उसे करेंट (इलेक्ट्रानिक शॉक) देते हैं। इसके बाद कुछ ही सेकेंड में वह व्यक्ति शांत होकर सो जाता है। यह सीन पूरी तरह फिल्मी होता है।
हकीकत में ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता। पीजीआई के मनोचिकित्सक डिपार्टमेंट के डॉक्टरों का कहना है कि इस सीन को देखने के बाद अक्सर मरीज इस थेरेपी को लेने से मना कर देते हैं। उन्हें लगता है कि उन्हें भी फिल्मों की तरह करेंट का शॉक देकर सुला दिया जाएगा। मेडिकल भाषा में इसे इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी (ईसीटी) कहते हैं। इसमें बैटरी से कम करेंट का इस्तेमाल कुछ सेकेंड के लिए किया जाता है।
फिल्मी सीन में व्यक्ति को कई लोग पकड़कर रखते हैं और उसे शॉक देते हैं, जबकि असल में एनेस्थीसिया की एक टीम होती है, जो मरीज को पहले बेहोश करती है और फिर दिमाग में इलेक्ट्रोड लगाकर कुछ सेकेंड के लिए करेंट का शॉक देती हैं। इससे दिमाग संतुलित होता है और व्यक्ति को आराम मिलता है। इसका इस्तेमाल गंभीर डिप्रेशन और बायपोलर डिसआर्डर में किया जाता है। पीजीआई में यह तकनीक पिछले साल आई थी और अब तक 280 मरीजों को लाभ पहुंच चुका है।
विज्ञापन
विज्ञापन
हकीकत में ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता। पीजीआई के मनोचिकित्सक डिपार्टमेंट के डॉक्टरों का कहना है कि इस सीन को देखने के बाद अक्सर मरीज इस थेरेपी को लेने से मना कर देते हैं। उन्हें लगता है कि उन्हें भी फिल्मों की तरह करेंट का शॉक देकर सुला दिया जाएगा। मेडिकल भाषा में इसे इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी (ईसीटी) कहते हैं। इसमें बैटरी से कम करेंट का इस्तेमाल कुछ सेकेंड के लिए किया जाता है।
विज्ञापन
फिल्मी सीन में व्यक्ति को कई लोग पकड़कर रखते हैं और उसे शॉक देते हैं, जबकि असल में एनेस्थीसिया की एक टीम होती है, जो मरीज को पहले बेहोश करती है और फिर दिमाग में इलेक्ट्रोड लगाकर कुछ सेकेंड के लिए करेंट का शॉक देती हैं। इससे दिमाग संतुलित होता है और व्यक्ति को आराम मिलता है। इसका इस्तेमाल गंभीर डिप्रेशन और बायपोलर डिसआर्डर में किया जाता है। पीजीआई में यह तकनीक पिछले साल आई थी और अब तक 280 मरीजों को लाभ पहुंच चुका है।
विज्ञापन
पीजीआई के डॉक्टरों के मुताबिक, दिमाग को संतुलित करने के लिए कई और तकनीक हैं, जो हाल ही में पीजीआई में आई हैं। इनमें रीपीटीटिव ट्रांसक्रानाइल मेग्नेटिक स्टिम्यलैशन (आरटीएमएस) व ट्रांसक्राइनाइल डायरेक्टर करेंट स्टिम्यलैशन (टीडीसीएस) भी शामिल हैं। डिपार्टमेंट के एचओडी प्रोफेसर एसके मट्टू ने बताया कि आरटीएमएस से ब्रेन को संतुलित किया जाता है।
इसमें चुंबकीय किरणें निकलती हैं। इसमें पेशेंट को कोई तकलीफ नहीं होती। इस विधि का इस्तेमाल करने के बाद पेशेंट अपने आप घर जा सकता है। इसके तहत अब तक 50 से ज्यादा मरीजों का इलाज किया जा चुका है। जबकि टीडीसीएस से करेंट निकलता है। इसमें इतना कम करेंट होता है कि पेशेंट को कुछ भी महसूस नहीं होता है। इस तकनीक को पिछले महीने ही शुरू किया गया है।
कई बार पत्र लिखा है कि ये सीन न फिल्मों में दिखाएं
पीजीआई के डॉक्टरों ने बताया कि ये सीन मरीजों के बीच गलतफहमी पैदा करते हैं। जब मरीजों से इन तकनीक के बारे में बताते हैं तो वे डर जाते हैं और फिल्मों में दिखाए गए सीन को दोहराने लगते हैं। फिर उन्हें समझाया जाता है और इलाज के लिए राजी होते हैं। इस बारे में कई बार मनोचिकित्सक की एसोसिएशन ने प्रोडक्शन हाउस व मीडिया को पत्र लिखा है कि वे इस तरह के सीन न दिखाएं।
इसमें चुंबकीय किरणें निकलती हैं। इसमें पेशेंट को कोई तकलीफ नहीं होती। इस विधि का इस्तेमाल करने के बाद पेशेंट अपने आप घर जा सकता है। इसके तहत अब तक 50 से ज्यादा मरीजों का इलाज किया जा चुका है। जबकि टीडीसीएस से करेंट निकलता है। इसमें इतना कम करेंट होता है कि पेशेंट को कुछ भी महसूस नहीं होता है। इस तकनीक को पिछले महीने ही शुरू किया गया है।
कई बार पत्र लिखा है कि ये सीन न फिल्मों में दिखाएं
पीजीआई के डॉक्टरों ने बताया कि ये सीन मरीजों के बीच गलतफहमी पैदा करते हैं। जब मरीजों से इन तकनीक के बारे में बताते हैं तो वे डर जाते हैं और फिल्मों में दिखाए गए सीन को दोहराने लगते हैं। फिर उन्हें समझाया जाता है और इलाज के लिए राजी होते हैं। इस बारे में कई बार मनोचिकित्सक की एसोसिएशन ने प्रोडक्शन हाउस व मीडिया को पत्र लिखा है कि वे इस तरह के सीन न दिखाएं।
कब होता है तकनीक का इस्तेमाल
जब डिप्रेशन, पेन डिसऑर्डर और वहम की बीमारी में दवाइयां व थेरेपी काम करना बंद कर देती हैं तो इन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। स्टडीज बताती हैं कि इन बीमारियों से मरीज को 80 फीसदी राहत मिलती है। कुछ समय पहले तक यह तकनीक सिर्फ दिल्ली के अस्पतालों में मिलती थी, मगर अब ये सुविधाएं पीजीआई के मनोचिकित्सक डिपार्टमेंट में शुरू हो गई हैं। इसका लोग फायदा उठा रहे हैं और उन्हें राहत भी मिल रही है।
56वें फाउंडेशन पर नेशनल सीएमई
56वें फाउंडेशन के अवसर पर 15 व 16 सितंबर को नेशनल सीएमई का आयोजन किया जा रहा है। इस मौके पर ब्रेन स्टिम्यलैशन एंड इलेक्ट्रोकन्वलुसिव थैरेपी पर नेशनल सीएमई होगा और 16 सितंबर को दूसरा एनएन विंग ओरेशन का आयोजन होगा। इसे मनोचिकित्सक के पूर्व एचओडी प्रोफेसर कुल्हारा संबोधित करेंगे।
जब डिप्रेशन, पेन डिसऑर्डर और वहम की बीमारी में दवाइयां व थेरेपी काम करना बंद कर देती हैं तो इन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। स्टडीज बताती हैं कि इन बीमारियों से मरीज को 80 फीसदी राहत मिलती है। कुछ समय पहले तक यह तकनीक सिर्फ दिल्ली के अस्पतालों में मिलती थी, मगर अब ये सुविधाएं पीजीआई के मनोचिकित्सक डिपार्टमेंट में शुरू हो गई हैं। इसका लोग फायदा उठा रहे हैं और उन्हें राहत भी मिल रही है।
56वें फाउंडेशन पर नेशनल सीएमई
56वें फाउंडेशन के अवसर पर 15 व 16 सितंबर को नेशनल सीएमई का आयोजन किया जा रहा है। इस मौके पर ब्रेन स्टिम्यलैशन एंड इलेक्ट्रोकन्वलुसिव थैरेपी पर नेशनल सीएमई होगा और 16 सितंबर को दूसरा एनएन विंग ओरेशन का आयोजन होगा। इसे मनोचिकित्सक के पूर्व एचओडी प्रोफेसर कुल्हारा संबोधित करेंगे।