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एक रामलीला ऐसी, जहां लाहौर की परंपरा

Tue, 30 Sep 2014 01:59 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Tue, 30 Sep 2014 01:59 PM IST
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lahore rules apply in chandigarh ramleela

चंडीगढ़ में एक रामलीला सबसे अलग है। यहां आज भी लाहौर की पुरानी परंपरा के मुताबिक रामलीला होती है।

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सेक्टर-14 पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस की रामलीला शहर की अन्य रामलीला से काफी अलग है। 1935 में लाहौर में अजुर्ना एम्चयोर ड्रामेटिक क्लब की स्थापना उस समय पाकि स्तान में मोहन लाला और लाला तारा चंद द्वारा की गई।

इतने बरसों बाद कलाकार तो बदले लेकिन रामलीला का लाहौरी रूप आज तक कायम है। रामलीला मंच का सफर लाहौर से सोलन(1960-61) होते हुए पीयू तक पहुंचा है।

40 साल से भी अधिक समय से पीयू रामलीला से जुड़े यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ ओपन लर्निग स्कूल(यूसूोल) लाइब्रेरी में कार्यरत सुशील कुमार पुरी ने बताया कि रामलीला की स्क्रिप्ट उर्दू में थी, जिसे बाद में हिंदी में अनुवाद किया गया। लेकिन शहर में अकेली ऐसा रामलीला मंच है जहां पर रामलीला के पात्र उर्दू लफ्जों का प्रयोग करते हैं। रामलीला का पूरी देखरेख का जिम्मा बरवाला निवासी बेकुंट नाथ भंडारी संभालते हैं।
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सिर्फ ढोलकी और बाजा  
पीयू की रामलीला ने पुरानी परंपरा को जिंदा रखा है। नॉन टीचिंग प्रधान दीपक कौशिक ने बताया कि लाहौर से अब तक रामलीला में सिर्फ ढोलकी और बाजे का प्रयोग होता है। फिल्मी धुनों का प्रयोग नहीं किया जाता।  
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कर्मचारी ही पात्र
कई पीयू कर्मचारी 35 से 40 सालों से रामलीला में अभिनय कर रहे हैं। महीने भर पहले रिहर्सल शुरू हो जाती है। सुनील शर्मा 34 साल से रावण और दशरथ का रोल निभा रहे हैं। वीसी दफ्तर में सुपरिटेंडेंट राजन शर्मा 35 साल से राम का रोल कर रहे हैं। सुशील कुमार पुरी ने बताया कि करीब 30 साल तक उन्होंने शंकर और अहिरावण का किरदार निभाया अब सिर्फ स्टेज संचालन और चंदे की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। हर साल रामलीला और रावण दहन की तैयारियों पर 2 लाख से अधिक खर्च आता है। पीयू के कर्मचारी और प्रोफेसर इसमें पूरा सहयोग देते हैं।

 
सीता हरण का भावुक सीन
सोमवार को पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस में रामलीला मंचन के तहत सीता हरण का सीन दिखाया गया। मंच पर रावण और सीता संवाद भी काफी बेहतर रहा। पीयू में रामलीला प्रतिदिन 9.30 से 11.30 बजे तक होती है। 

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