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कोरोनाः डिस्चार्ज हुए मरीज बोले- हमारे लिए अपनी जान दांव पर लगाई...डॉक्टर नहीं ईश्वर हैं वो
Tue, 19 May 2020 10:28 AM IST
खुशबू गोयल
वीणा तिवारी, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Tue, 19 May 2020 10:28 AM IST
सार
- कोरोना को मात देकर घर लौटे बापूधाम के तीन मरीज
- कहा, डॉक्टरों ओर स्टाफ का व्यवहार अपनों जैसा ही
- बीमारी की गिरफ्त में आए मरीजों से जोड़ा मानवता का रिश्ता
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ठीक होकर घर लौटे कोरोना मरीज
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कोरोना महामारी के इस दौर में जब हर कोई खुद को संक्रमण से बचाने के लिए घर में कैद है, तब डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ एक सच्चे योद्धा के रूप में संक्रमित मरीजों का जीवन बचाने का दिन-रात प्रयास कर रहे हैं। उन्हें न तो अपने खाने की चिंता है ना सोने की। इतना ही नहीं उन्होंने देश को कोरोना मुक्त करने के लिए अपने परिवार तक से दूरी बना ली है।
यह भी पढ़ें: Corona Commando: गरीबों की भूख मिटाने के लिए तुड़वा दी एफडी, अब रोज तैयार हो रहा लंगर
उनके लिए इस समय उनका अस्पताल, वहां के सहयोगी और मरीज ही परिवार बन चुके हैं। पीजीआई के कोरोना डेडिकेटेड हॉस्पिटल में काम कर रहे डॉक्टर और स्टाफ इसका बेहतर उदाहरण बन चुके हैं। वहां तैनात डॉक्टर और अन्य स्टाफ मरीजों से उनके परिजनों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। उनके प्यार, अपनापन और इलाज की मिली घुट्टी का ही नतीजा है जो वे ठीक होकर घर को लौट रहे हैं।
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सोमवार को पीजीआई से डिस्चार्ज हुए बापूधाम निवासी तीन मरीजों ने अमर उजाला से अपने अनुभव साझा किए और कहा कि इस जानलेवा संकट की घड़ी में पीजीआई के डॉक्टर उनके लिए धरती पर साक्षात्कार भगवान का रूप साबित हुए हैं।
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सोमवार को पीजीआई से डिस्चार्ज हुए बापूधाम निवासी तीन मरीजों ने अमर उजाला से अपने अनुभव साझा किए और कहा कि इस जानलेवा संकट की घड़ी में पीजीआई के डॉक्टर उनके लिए धरती पर साक्षात्कार भगवान का रूप साबित हुए हैं।
कोरोना के मरीजों को ठीक करने का तरीका है नायाब
कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके बापूधाम निवासी 38 वर्षीय इंदर सिंह ने बताया कि उन्हें 27 अप्रैल को कोरोना की पुष्टि के बाद पीजीआई में भर्ती किया गया था। उनके साथ उनकी भतीजी नेहा भी कोरोना डेडीकेटेड हॉस्पिटल में थी। नेहा में 30 अप्रैल को कोरोना की पुष्टि हुई थी। उसके बाद से वो दोनों एक ही अस्पताल में अलग-अलग जगह पर भर्ती रहे।
इंदर और नेहा ने बताया कि इलाज के दौरान गुजारा गया एक-एक दिन खास अनुभव वाला रहा। उनके दिमाग में अस्पताल, डॉक्टर और सरकारी इलाज को लेकर जो छवि बनी हुई थी वह पूरी तरह से गलत साबित हुई है। पीजीआई में उन्हें एक घर जैसा माहौल मिला। डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, सफाई कर्मचारी सभी का व्यवहार इतना मधुर था कि एक पल के लिए भी यह अनुभव नहीं हुआ कि हम घर से दूर किसी जानलेवा बीमारी का इलाज कराने अस्पताल में भर्ती हैं।
यह भी पढ़ें: Corona Commando नर्सिंग ऑफिसर रोके बोले- कोरोना मरीज भी अपने हैं, सेवा करके सुकून मिला
नेहा ने डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की काउंसलिंग के तरीके की तारीफ की और कहा कि उनके समझाने का अंदाज बिल्कुल ही अलग है। वह बातों-बातों में तनाव को कैसे छूमंतर कर देते हैं पता ही नहीं चलता। सीनियर डॉक्टर से तो हमें अपने बच्चों की तरह प्यार मिला। भर्ती रहने के दौरान एक बात ठीक से समझ में आई कि डॉक्टर के हाथ में ही वह जादू की छड़ी है जो एक मरीज को मौत के मुंह से बाहर ला सकती है।
इंदर और नेहा ने बताया कि इलाज के दौरान गुजारा गया एक-एक दिन खास अनुभव वाला रहा। उनके दिमाग में अस्पताल, डॉक्टर और सरकारी इलाज को लेकर जो छवि बनी हुई थी वह पूरी तरह से गलत साबित हुई है। पीजीआई में उन्हें एक घर जैसा माहौल मिला। डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, सफाई कर्मचारी सभी का व्यवहार इतना मधुर था कि एक पल के लिए भी यह अनुभव नहीं हुआ कि हम घर से दूर किसी जानलेवा बीमारी का इलाज कराने अस्पताल में भर्ती हैं।
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एक पल को परिवार की कमी महसूस नहीं हुई
पीजीआई से डिस्चार्ज होने वाले बापूधाम निवासी 40 वर्षीय बच्चू राम ने भर्ती रहने के दौरान हुए अनुभव को साझा करते हुए बताया कि परिवार से दूर रहकर भी उन्हें एक पल के लिए परिवार की कमी महसूस नहीं हुई। उन्हें 2 मई को पीजीआई में भर्ती किया गया था।
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अस्पताल में सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक और बीच-बीच में हमारा हालचाल लेने तक की जिम्मेदारी पीजीआई के डॉक्टरों और स्टाफ पर थी। उन्होंने इस दौरान अपनी ड्यूटी करने के साथ ही हमसे एक प्यार का रिश्ता भी बनाया। सुबह डॉक्टर आने पर सबसे पहले हमारी तबीयत के बारे में पूछते और फिर पूछते कि चाय पी की नहीं, नाश्ते में क्या खाया, कोई समस्या तो नहीं है, परिजनों से बात हुई कि नहीं।
उनकी यह सारी बातें सुनकर ऐसा लगता था जैसे मेरे परिवारवाले मेरे आसपास हैं। दवा देने का समय, प्रत्येक मरीज की गतिविधि पर बारीक नजर रखना, व्यवहार में शामिल प्यार और अपनापन अब तक के जीवन का सबसे खास अनुभव रहा।
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अस्पताल में सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक और बीच-बीच में हमारा हालचाल लेने तक की जिम्मेदारी पीजीआई के डॉक्टरों और स्टाफ पर थी। उन्होंने इस दौरान अपनी ड्यूटी करने के साथ ही हमसे एक प्यार का रिश्ता भी बनाया। सुबह डॉक्टर आने पर सबसे पहले हमारी तबीयत के बारे में पूछते और फिर पूछते कि चाय पी की नहीं, नाश्ते में क्या खाया, कोई समस्या तो नहीं है, परिजनों से बात हुई कि नहीं।
उनकी यह सारी बातें सुनकर ऐसा लगता था जैसे मेरे परिवारवाले मेरे आसपास हैं। दवा देने का समय, प्रत्येक मरीज की गतिविधि पर बारीक नजर रखना, व्यवहार में शामिल प्यार और अपनापन अब तक के जीवन का सबसे खास अनुभव रहा।