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कागजों में सिमटा विकास: चंडीगढ़ में मेट्रो, फिल्म और एजुकेशन सिटी परियोजनाएं वर्षों से अधूरी.. खास रिपोर्ट

Mon, 28 Jul 2025 12:23 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो Updated Mon, 28 Jul 2025 12:23 AM IST
सार

शहरवासियों का कहना है कि 20 साल से अधिकारी शहर में बड़े-प्रोजेक्ट्स से शहर की तस्वीर बदलने का सपना दिखा रहे हैं लेकिन धरातल पर आज तक कुछ नजर नहीं आया। अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट में पेश है चंडीगढ़ के उन अटके हुए प्रोजेक्ट्स की तस्वीर जो आज भी सिर्फ फाइलों में जिंदा हैं।

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Big development plans in Chandigarh remain confined to papers only
चंडीगढ़ का ट्रिब्यून चाैक - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश के सबसे व्यवस्थित शहरों में शुमार चंडीगढ़ की तस्वीर अब उतनी चमकदार नहीं रह गई है। पिछले दो दशक में कई ऐसे बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए गए जो आज तक अधूरे हैं। वजह...कहीं नौकरशाही की सुस्ती तो कहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने सिरे नहीं चढ़ने दिया।
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मेट्रो प्रोजेक्ट: 16 साल से पटरियों पर ही अटका

2009 में शुरू की गई मेट्रो परियोजना चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला को जोड़ने वाली थी। हालांकि, भाजपा सांसद किरण खेर समेत कई नेताओं के विरोध और प्रशासनिक उलझनों के चलते यह कभी आगे नहीं बढ़ पाई। जून 2024 में राइट्स (रेल इंडिया टेक्निकल एंड इकोनॉमिक सर्विसेज) ने इसे आर्थिक रूप से व्यावहारिक बताया लेकिन 25,000 करोड़ की अनुमानित लागत के चलते इसका भविष्य अभी भी अधर में है।
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यदि सभी मंजूरियां समय पर मिलती हैं तो 2027 में काम शुरू हो सकता है और 2032 तक फेज-1 पूरा होने की उम्मीद है। इसमें से 16.5 किमी हिस्सा चंडीगढ़ के हेरिटेज सेक्टरों से होकर भूमिगत जाएगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन बंसल का कहना है कि 2014 के बाद इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यदि इसे तब गंभीरता से लिया जाता तो आज यह जमीन पर दिखती।
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एजुकेशन सिटी: 19 साल से सपना अधूरा

वर्ष 2006 में सारंगपुर के पास 150 एकड़ में एजुकेशन सिटी बसाने का ख्वाब दिखाया गया था ताकि चंडीगढ़ को शैक्षणिक उत्कृष्टता का केंद्र बनाया जा सके लेकिन अब तक केवल एक संस्थान ही शुरू हो पाया है। 2009 में आईआईटी रोपड़ और आईआईएम अमृतसर जैसे संस्थानों से बातचीत हुई लेकिन कड़े नियमों और प्रशासनिक सुस्ती के चलते सबने हाथ पीछे खींच लिए। इस साल कुछ महीने पहले शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने यूजीसी के साथ बैठक की और चार मॉडल पर काम जारी है। प्रशासन अब आईआईटी-आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से दोबारा बातचीत करने के साथ-साथ विदेशी यूनिवर्सिटी कैंपस को भी आमंत्रित करने की योजना बना रहा है।

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आउटर रिंगः काम नहीं, सिर्फ बैठकें और प्रेजेंटेशन चल रहीं

चंडीगढ़ के चारों तरफ बनने वाले रिंग रोड प्रोजेक्ट पर वर्ष 2013 में काम शुरू हुआ लेकिन आधा 2025 बीत चुका है अब तक प्रोजेक्ट लटका हुआ है। पंजाब की तरफ से काम में देरी की जा रही है। जिसकी वजह से सीधे निकलने वाले ट्रैफिक को भी बेवजह शहर के बीच जाम में फंसकर समय बर्बाद करना पड़ता है। शहर के लोगों को भी परेशान होना पड़ता है। अगर ये बन जाता तो काफी राहत मिलती। आउटर रिंग रोड के लिए 20 सितंबर 2019 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई 29वीं नॉर्दर्न जोनल काउंसिल बैठक में भी चर्चा की गई थी।

इंडस्ट्रियल एरिया फेज-3: चार दशक बाद भी अधूरा

वर्ष 1970 के दशक में सोचा गया इंडस्ट्रियल एरिया फेज-3 आज भी बस एक सपना ही है। 150 एकड़ में फैला यह इलाका 2003 में अधिगृहीत हुआ था लेकिन अब तक केवल तीन प्लॉट्स ही अलॉट हो सके हैं। मुख्य वजह जोनिंग की कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव और लीज होल्ड नीतियों की जटिलता है। चेंबर ऑफ चंडीगढ़ इंडस्ट्रीज के उपाध्यक्ष नवीन मंगलानी का कहना है कि जब तक लीज होल्ड पॉलिसी को खत्म कर प्लॉट्स को फ्री होल्ड नहीं किया जाएगा तब तक एमएसएमई सेक्टर की प्रगति संभव नहीं है।

फिल्म सिटी: एक सपना जो कभी हकीकत नहीं बना

वर्ष 2007 में सारंगपुर में 32 एकड़ में फिल्म सिटी बसाने की घोषणा हुई थी। पार्श्वनाथ कंपनी को प्रोजेक्ट मिला था जिसने 191 करोड़ की बोली में से 47.75 करोड़ एडवांस भी दिया लेकिन यूटी प्रशासन ने तय समय में नक्शा और अतिक्रमण-मुक्त जमीन नहीं दी। नतीजतन, प्रोजेक्ट रद्द हो गया और कंपनी की राशि भी जब्त कर ली गई। मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन को दोषी मानते हुए पार्श्वनाथ को 118 करोड़ मुआवजा देने का आदेश दिया। फिल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि यह बनता तो पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के युवाओं के लिए रोजगार के मौके होते लेकिन अफसरशाही की लापरवाही ने सब चौपट कर दिया।

ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर: 5 साल में लागत 137 से 240 करोड़ पहुंची

परियोजना को केंद्र सरकार ने 2016 में मंजूरी दी थी। मार्च 2019 में शिलान्यास भी हो गया। नवंबर 2019 में सड़क किनारे पेड़ों की कटाई पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की रोक के चलते यह प्रोजेक्ट ठप हो गया था। मई 2024 में रोक हट गई। कई महीने तो सिर्फ रिवाइज्ड एस्टीमेट तैयार करने में लग गए। इस साल जनवरी में प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते केंद्र सरकार हुए पूछा था कि रिवाइज्ड एस्टीमेट का प्रस्ताव अब तक क्यों नहीं भेजा गया जिसके बाद मार्च में करीब 243 करोड़ केंद्र सरकार को मंजूरी के लिए भेजा था। शुक्रवार को बैठक में मंत्रालय के अधिकारियों ने 240 करोड़ के बजट को हामी भर दी। हालांकि, इस बीच खर्च 137 करोड़ से 240 करोड़ पहुंच गया है।
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