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जलियांवाला नरसंहारः शहीद का दर्जा क्या देगी सरकार, मारे गए लोगों के नाम तक तो पता नहीं हैं

Sat, 13 Apr 2019 11:20 AM IST
खुशबू गोयल अशोक नीर, अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब)
अशोक नीर, अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब) Published by: खुशबू गोयल Updated Sat, 13 Apr 2019 11:20 AM IST
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100 years of t Jallianwala Bagh massacre, Family Fighting for Martyre Status to Whom Died
जलियांवाला बाग हत्याकांड - फोटो : PTI
जलियांवाला बाग नरसंहार को सौ साल हो चुके हैं, लेकिन अभी तक उस हत्याकांड में मरने वालों को शहीद का दर्जा नहीं मिला है। पढ़ें, इंसाफ के लिए भटक रहे मृतकों के परिजनों का दर्द बयां करती ये विशेष रिपोर्ट।
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जलियांवाला बाग हत्याकांड
देश की आजादी के लिए जान देने वाले जलियांवाला बाग के शहीदों के परिजनों को एक शताब्दी बीत जाने के बावजूद भी इंसाफ नहीं मिला है। देश की आजादी के बाद 55 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस की सरकारों ने जलियांवाला बाग के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना कर दी। शहीदों की एक यादगार का निर्माण कर दिया, लेकिन यहां शहीदी का जाम पीने वाले सपूतों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई।

 
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जलियांवाला बाग हत्याकांड
आजादी के बाद शहीदों के परिजन लगातार जानकारी हासिल करने के लिए सरकारी विभागों के दरवाजे खटखटाते रहे। लेकिन सरकार आज तक इस बात की जानकारी भी नहीं जुटा पाई कि शहीदों के नाम क्या हैं। ऐसे में शहीदों के परिजनों का कहना है कि जिन्हें नाम तक नहीं पता, वे शहीद का दर्जा क्या देंगे। जरनल डायर की गोलियों से शहीद हुए लाला रामजस मल्ल खन्ना के पोते मनीष खन्ना कुछ बता रहे हैं।
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जलियांवाला बाग हत्याकांड
मनीष ने बताया कि 13 अप्रैल 2019 को जलियांवाला बाग नरसंहार को 100 साल हो गए, पर लालाजी का परिवार आज भी उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिलाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। सिर्फ लालाजी ही नहीं, बल्कि कई क्रांतिवीरों को शहीद का दर्जा नहीं मिल पाया है। जलियांवाला बाग में हर साल प्रशासन श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन करता है, लेकिन इसमें हिस्सा लेने के लिए अब तक उन्हें निमंत्रण नहीं मिला।
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जलियांवाला बाग
इतिहासकार अमनदीप बल के अनुसार, 13 अप्रैल 1919 के नरसंहार से पहले ही गुरुनगरी के लोगों और ब्रिटिश हुकूमत के बीच जबरदस्त तनाव बना हुआ था। रॉलेट एक्ट के विरोध में गुरुनगरी के लोग छह अप्रैल से ही विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। नौ अप्रैल को रामनवमी के पर्व पर पहली बार हिंदू-मुस्लिम समुदाय ने एक साथ झांकियां निकली। ब्रिटिश हुकूमत से यह सहन नहीं हुआ।
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