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त्यौहार की तिथियों को लेकर इसलिए हर बार उलझन रहती है

किरण राय

त्यौहारों और व्रत उत्सवों को लेकर इन दिनों अजीब सी भ्रम की स्थिति बढ़ती जा रही है। उदाहरण के लिए पिछले दिनों जन्माष्टमी दो दिन मनाई गई। नवरात्रि नौ दिन की होती है, लेकिन तिथियों के उदय अस्त के मान से कभी आठ तो कभी दस दिन की नवरात्रि मनाई जाती है।

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पितृपक्ष अमूमन सोलह दिन का होता है, और इस तरह पूर्णिमा तथा अमावस्या के साथ पक्ष की बाकी चौदह तिथियां भी आ जाती हैं, लेकिन इस बार कहीं पूर्णिमा तो कहीं प्रतिपदा तिथि का लोप है।

दीपावली का पूजा समय तो लोग अलग अलग तय करते ही हैं, अब अमावस को लेकर तीसरे-चौथे साल विवाद की स्थितियां बनती है। असमजंस की स्थितियां पंचांगों/तिथि पत्रों के कारण ही उत्पन्न नहीं होतीं।

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स्थिति यह है कि अब पांडित्य और अधिकार की कोई कसौटी नही रही। इसके अभाव में विवाद उठाना तो स्वभाविक ही है, पर मुद्दे पर ही टिके रहना मुश्किल।
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